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समुद्री द्वीप कच्चातिवु के सहारे तमिलनाडु में राजनीतिक जमीन तलाश रही है बीजेपी?

वास्तव में, भारतीय जनता पार्टी का मकसद कच्चातिवु को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना है, और इसके जरिए खासकर विपक्षी इंडिया गठबंधन के सहयोगियों द्रमुक और कांग्रेस पर निशाना साध उन्हें मुश्किल में डालना है

कच्चातिवु द्वीप पर सेंट एंथनी का चर्च
कच्चातिवु द्वीप पर सेंट एंथनी का चर्च
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2024

अभी तकरीबन महीने भर पहले 23-24 फरवरी को ही तो कच्चातिवु द्वीप में 4,000 से अधिक भारतीयों ने सालाना सेंट एंथनी उत्सव में हिस्सा लिया था और लगभग उतनी ही संख्या में श्रीलंकाई श्रद्धालु भी उपस्थित थे. मछुआरों के पूज्य संत के भोज के लिए श्रीलंकावासियों ने भोजन, पीने का पानी और साफ-सफाई की सुविधाएं मुहैया कराईं. मगर, अचानक आम चुनाव के पहले भारत के शीर्ष नेताओं की ओर से इस द्वीप को लेकर उठाए विवाद से शायद वे सभी हैरान रह गए होंगे.

भारत और श्रीलंका के बीच 1974 के समुद्री समझौते पर तत्कालीन प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और सिरिमा आर.डी. भंडारनायके ने दस्तखत किए थे. उसके मुताबिक, दोनों देशों के बीच समुद्री सीमा को पाक जलडमरूमध्य से एडम ब्रिज, कच्चातिवु तक सीमांकित किया गया.

कच्चातिवु 1.9 वर्ग किलोमीटर का निर्जन और बंजर द्वीप है, जो तमिलनाडु के रामेश्वरम के भारतीय तट से लगभग 14 समुद्री मील और उत्तरी श्रीलंका से 10.5 समुद्री मील की दूरी पर स्थित पाक जलडमरूमध्य में लंका की समुद्री सीमा में आता है.

समझौते के तहत, भारतीयों को सेंट एंथनी दिवस पर कच्चातिवु के चर्च में जाने की अनुमति है. उस द्वीप पर श्रीलंकाई संप्रभुता को मान्यता देने के बाद 1976 के समझौते में श्रीलंका ने कन्याकुमारी के पास जैव विविधता से समृद्ध समुद्र के 10,000 वर्ग किमी क्षेत्र वाले वाज बैंक पर भारतीय संप्रभुता को मान्यता दी थी.

भाजपा के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलै ने हाल में तमिल भावनाओं को भड़काकर चुनावी मुद्दा तैयार करने के लिए यह आरोप उछाला कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने कच्चातिवु को श्रीलंका को सौंप दिया. तो, फौरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 31 मार्च को इस मुद्दे को उठा दिया.

एक्स पर उन्होंने यह भी लिखा कि इससे द्रमुक का दोहरा चरित्र भी खुल गया है. वे यह इशारा कर रहे थे कि कच्चातिवु को जब कथित तौर पर सौंपा गया, तब द्रमुक के नेता एम. करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे. लेकिन बाद में, मौजूदा मुख्यममंत्री एम.के. स्टालिन सहित द्रमुक नेताओं ने हाल के वर्षों में द्वीप को लेकर चिंता व्यक्त की है.

अप्रैल की 1 तारीख को विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इस विवाद में कूद पड़े. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी दोनों ने कच्चातिवु को 'छोटा द्वीप' और 'छोटी चट्टान' करार दिया था और वे इस पर दावा छोड़ने के लिए तैयार थे. उन्होंने यह भी कहा कि द्रमुक ने इस मुद्दे पर इंदिरा गांधी के साथ 'मिलीभगत' की थी.

उन्होंने कहा कि श्रीलंका ने पिछले 20 वर्षों में 6,184 भारतीय मछुआरों को हिरासत में लिया है. जाहिर है, भाजपा कच्चातिवु को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, ताकि 'इंडिया' ब्लॉक के साझीदारों द्रमुक और कांग्रेस को घेरा जा सके, क्योंकि 1974 का समझौता उनके शासन के दौरान हुआ था.

हालांकि, कांग्रेस ने एक्स पर ही तुरंत जवाब दिया. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा, "कोई आला दर्जे का मूर्ख ही यह यकीन कर सकता है कि जिस दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा दिए, 1971 में दक्षिण एशिया के भौगोलिक मानचित्र को फिर बदल दिया और बांग्लादेश का निर्माण करवाया, उन्होंने कच्चातीवु द्वीप को किसी दबाव या मजबूरी में श्रीलंका को सौंप दिया था."

जयराम रमेश ने ब्यौरेवार खंडन करके प्रधानमंत्री मोदी को याद दिलाया कि 1974 में ही भंडारनायके-इंदिरा गांधी समझौते के तहत ही श्रीलंका से 6,00,000 तमिलों को भारत वापस लाया जा सका था. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, "उस एक कदम से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तब तक देशविहीन माने जा रहे छह लाख लोगों के लिए मानवाधिकार और सम्मान को सुरक्षित किया था."

वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि यह सच है कि भारतीय मछुआरों को हिरासत में लिया गया, भारत ने भी कई लंकाई मछुआरों को हिरासत में लिया है. उन्होंने लिखा, "हर सरकार ने श्रीलंका के साथ बातचीत की है और हमारे मछुआरों को मुक्त कराया है. यह तब-तब हुआ जब जयशंकर विदेश सेवा के अधिकारी थे और जब वे विदेश सचिव थे और अब जब वे विदेश मंत्री हैं. जब वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो क्या मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में नहीं लिया था...जब मोदी 2014 से सत्ता में थे तो क्या श्रीलंका ने मछुआरों को हिरासत में नहीं लिया था?" 

साल 1974 के समझौते के तहत भारतीय मछुआरे कच्चातिवु में अपना जाल सुखा सकते हैं. लेकिन द्वीप के पास मछली पकड़ने की इजाजत नहीं है. यही तमिलनाडु में एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है. श्रीलंकाई नौसेना के अपने समुद्री जल में 'अवैध गतिविधि' के लिए भारतीय मछुआरों को पकड़ने, उनके ट्रॉलर जब्त करने का मुद्दा तमिलनाडु में बेहद भावनात्मक और भारत-श्रीलंका रिश्तों में समस्या बना हुआ है.

इसी साल लगभग 150 मछुआरों को हिरासत में लिया गया है. भारतीय तमिल मछुआरे अक्सर सदियों पुरानी प्रथाओं के मुताबिक समुद्री सीमा पार कर जाते हैं, जिस पर उन्हें अपना अधिकार लगता है. यह भी सही है कि भारत की ओर के समुद्र में मछलियां घट गई हैं और श्रीलंका की ओर के समुद्र में मछलियों की भरमार है.

इस तरह उन इलाकों में भारतीय मछुआरों का जाफना के श्रीलंकाई तमिल जमकर विरोध करते हैं, जो बाकी मामलों में अपने समुदाय के भारतीय लोगों से एकजुटता चाहते हैं. ऐसे में, तमिलनाडु के नेता अक्सर कच्चातिवु का मुद्दा उठाते रहते हैं और गरीब मछुआरों के प्रति हमदर्दी जताते रहे हैं.

दरअसल, तमिलनाडु के लोग इस द्वीप को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं. साल 2008 में, तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने पुराने दस्तावेजों का हवाला दिया और दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (आईएमबीएल) की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. साल 2013 में, तमिलनाडु विधानसभा ने कच्चातिवु को पुन: हासिल करने की मांग के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था.

केंद्र ने संसद में दिए जवाबों, सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामों और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जवाबों में लगातार यह रुख कायम रखा है कि समुद्री समझौते में कच्चातिवु को कभी भी श्रीलंका को 'सौंपा' या 'दिया' नहीं गया. इसे फिर हासिल करना असंभव था, और लंकाई अधिकारियों की भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार करने की कार्रवाइयां सिर्फ इस द्वीप से संबंधित नहीं हैं.

कच्चातिवु द्वीप का जन्म ज्वालामुखीय गतिविधि से हुआ था, और यह झींगा मछली पकड़ने का एक समृद्ध क्षेत्र है. प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में इस पर श्रीलंका के जाफना साम्राज्य का नियंत्रण था, लेकिन 17वीं शताब्दी तक इसका नियंत्रण रामनाथपुरम स्थित रामनाद जमींदारी के पास चला गया और ब्रिटिश राज के दौरान मद्रास प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आ गया. हालांकि, ब्रिटिश भारत और सीलोन दोनों ने द्वीप पर अपने क्षेत्रीय अधिकार का दावा करना जारी रखा.

साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद, जब पाकिस्तान अपने जंगी जहाजों में ईंधन भरने के लिए लंकाई बंदरगाहों का इस्तेमाल करता था, तत्कालीन श्रीलंकाई प्रधानमंत्री भंडारनायके ने नई दिल्ली के साथ सभी लंबित समुद्री सीमा विवादों को हल करने की पहल की.

श्रीलंका में पांव जमाने की चीन की चाल को रोकने के लिए भारत ने भी इस ओर रुख किया. समुद्री सुरक्षा के एक प्रमुख अधिकारी का कहना है, "भंडारनायके को बीजिंग की ओर हाथ बढ़ाने से रोकने के लिए, भारत सरकार कच्चातिवु द्वीप देने पर सहमत हो गई और साथ ही साथ वाज बैंक समझौते की दिशा में काम करना शुरू कर दिया."

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने एक्स पर लिखा कि इंदिरा गांधी और भंडारनायके के बीच व्यक्तिगत समीकरण ने 1974 के भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते में निर्णायक भूमिका निभाई. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में भारत के कदम को श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय संबंधों को ध्यान में रखकर देखना चाहिए.

यह सही है कि श्रीलंका के साथ 1976 के समझौते से भारत को अपने प्राकृतिक गैस भंडार और मछली-समृद्ध समुद्री इलाके के साथ वाज बैंक पर विशेष अधिकार मिल गया था. वह अधिकार पहले समझौते के संतोषजनक निबटारे की वजह से हासिल हुआ.

एक अन्य भारतीय अधिकारी का कहना है, "मन्नार की खाड़ी में वेस्ट वाज बैंक तक पहुंच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत उससे कोलंबो बंदरगाह की गतिविधियों पर नजर रख सकता है."

रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) वाले दौर में, जब श्रीलंकाई नौसेना जाफना की नाकाबंदी में व्यस्त थी, भारतीय मछुआरों ने लंकाई समुद्री इलाके में बेरोकटोक मछली पकड़ने का मजा लिया.

साल 2009 में एलटीटीई संकट खत्म हो जाने के बाद, श्रीलंका ने भारतीय मछुआरों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया और उन्हें नियमित रूप से गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. साल 2023 में, लंकाई इलाके में कथित रूप से अवैध मछली पकड़ने के आरोप में 240 भारतीय मछुआरों को 35 ट्रॉलरों के साथ गिरफ्तार किया गया था.

भारतीय तट रक्षक बल के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक कृपा शंकर नौटियाल का कहना है, "भारत और श्रीलंका के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के परिसीमन के लिए समझौता होने के बावजूद, दोनों देशों के मछुआरे अब भी उसका उल्लंघन करते हैं. उसके परिणामस्वरूप भारतीय तट रक्षक और श्रीलंकाई नौसेना, दोनों ही ओर से उनकी नौकाओं की धर-पकड़ होती रहती है. सौभाग्य से, उन नौकाओं की वापसी में तेजी लाने के लिए दोनों देशों के बीच एक तंत्र मौजूद है."

ऐसे में, सयाने राजनयिक मौजूदा विवाद को एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और लोगों की भावनाओं को भड़काने की महज सियासी चालबाजी मानकर इसे खारिज कर देते हैं.

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