ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने 13 मई से चार चरणों में होने वाले चुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी. राज्य की 147 सदस्यीय विधानसभा के लिए 72 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई और यह भी पक्का हो गया कि पटनायक हिंजिली से छठवीं बार चुनाव मैदान में उतरेंगे. साथ ही 21 लोकसभा सीटों में से 15 पर नामों का भी ऐलान कर दिया गया. राज्य चुनाव में 13 नए चेहरे उतारे हैं, चार लोकसभा प्रत्याशियों पर फिर से भरोसा जताया है. नए लोकसभा प्रत्याशियों में पार्टी के महासचिव (संगठन) प्रणब प्रकाश दास को केंद्रीय शिक्षा मंत्री और राज्यसभा सांसद धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ संबलपुर से उतारा गया है.
सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला आसान नहीं था और गंभीर विचार-विमर्श के बाद हुआ. पटनायक पार्टी के जनप्रतिनिधियों के साथ काफी बैठकें कर रहे हैं ताकि मतदाता का मूड भांपा जा सके.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पटनायक की तरफ से सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे की तारीफ किए जाने के बाद दोनों ही दलों ने एक-दूसरे के करीब आने की कोशिशें कीं. हालांकि, आलोचक पहले से ही इस गठबंधन को असंभावित मान रहे थे. मोदी ने तो पटनायक को अपना मित्र तक बताया क्योंकि पटनायक की पार्टी ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को फिर राज्यसभा भेजने के लिए राज्य में भाजपा को समर्थन दिया था. हालांकि, 22 मार्च को भाजपा की राज्य इकाई के प्रमुख मनमोहन सामल ने सोशल नेटवर्किंग साइट एक्स पर घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में' लोकसभा की सभी 21 सीटों और विधानसभा की 147 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी. करीब चार घंटे बाद दास ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "बीजद ओडिशा के लोगों के समर्थन से सभी 147 विधानसभा और सभी 21 लोकसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारेगी और नवीन पटनायक के नेतृत्व में तीन-चौथाई से अधिक सीटों पर जीत हासिल करेगी." इन बयानों के साथ ही ओडिशा के हालिया सियासी इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक सस्पेंस खत्म हो गया.
सामल ने अपनी पोस्ट में ओडिशा की अस्मिता को भाजपा का प्रमुख चुनावी मुद्दा बताया, क्योंकि उनकी पार्टी पटनायक के करीबी सहयोगी और सरकार की 5टी (बदलाव संबंधी पहल) और नबीन ओडिशा के अध्यक्ष, वी.के. पांडियन को घेरने की रणनीति बना रही है. तमिलनाडु में जन्मे पूर्व नौकरशाह पांडियन सरकार के साथ-साथ पार्टी में भी खासा दखल रखते हैं. सूत्रों का कहना है कि बीजद की तरफ से बड़े पैमाने पर विकास कार्य कराए जाने के बावजूद जनता के एक वर्ग में असंतोष की लहर है जो कि किसी गैर-ओडिया को सत्ता में नहीं देखना चाहता. भाजपा से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, "हमारा मानना है कि राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए हमारे साथ गठबंधन का विचार पांडियन का ही था."
सूत्रों के मुताबिक, गठबंधन न हो पाने की मुख्य वजह यह थी कि भाजपा चुनाव बाद नई सरकार में शामिल होने की मांग कर रही थी. लेकिन बीजद नेतृत्व को यह बात रास नहीं आई क्योंकि उन्हें अकेले ही सबसे बड़ा बहुमत हासिल कर लेने का पूरा भरोसा है. शुरुआती बातचीत के बाद तय किया गया कि बीजद 107 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी और 40 सीटें भाजपा के लिए छोड़ेगी. वहीं, लोकसभा की बात करें तो बीजद भाजपा के लिए 11 सीटें छोड़ने को तैयार हो गई थी.
दूसरी ओर, भाजपा सूत्रों का दावा है कि बीजद उन्हें 40 विधानसभा सीटें देना चाहती थी लेकिन पार्टी के आंतरिक सर्वे बताते हैं कि वह इससे काफी ज्यादा सीटों पर जीत हासिल कर सकती है. मौजूदा समय में बीजद के 109 की तुलना में भाजपा के पास 23 विधायक हैं. 2019 में भाजपा ने जहां आठ लोकसभा सीटें जीतीं थी, वहीं बीजद ने 12 सीटों पर कब्जा जमाया था. 24 मार्च को भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए 18 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी. तमाम लोगों की राय है कि इस 'अस्वाभाविक गठबंधन' से पटनायक की धर्मनिरपेक्ष साख खराब हो सकती थी. ओडिशा की आबादी में करीब 94 फीसद हिंदू होने के बावजूद राज्य सरकार की बदलाव संबंधी पहलों में सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों के पुनर्विकास पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है. बीजद के राज्यसभा सांसद मुजीबुल्ला खान ने कहा, ''हम पहले से ज्यादा सीटें जीतेंगे. विकास हमारा प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा.''
- अर्कमय दत्ता मजुमदार

