- अरुण पुरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहुत महत्वाकांक्षी और चुनौतीपूर्ण लक्ष्य तय करने की आदत है. अब जब आम चुनाव के नतीजे महज दो महीनों से कुछ ही ज्यादा वक्त दूर हैं, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए 370 सीटों और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए अभूतपूर्व 'चार सौ पार' यानी 400 से ज्यादा सीटों के लक्ष्य का ऐलान किया है. उनका यह शंखनाद देश भर में गूंज रहा है.
यह 2019 में भाजपा और एनडीए को मिली क्रमश: 303 और 352 सीटों से बहुत बड़ी छलांग है, जिसे कुछ लोग महज कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कवायद करार देंगे. इसका विपक्ष और मतदाता सहित चौतरफा मनोवैज्ञानिक असर तो हुआ ही है.
इस अंक की हमारी आवरण कथा इस मुद्दे की गहरी पड़ताल करती है कि कभी-कभार ही घटने वाला यह हैरतअंगेज आंकड़ा हासिल किया जा सकता है या नहीं. इस लक्ष्य पर पहुंचने के लिए भाजपा को भारत के 97.8 करोड़ मतदाताओं में से करीब 50 फीसद के वोट हासिल करने होंगे.
नारों और बयानबाजी से आगे भाजपा ने पांच प्रमुख क्षेत्रों पर अपना पैना ध्यान केंद्रित किया है. पहले को एक आदर्श वाक्य में बयान किया जा सकता है जो है 'किले को थामे रखो', इसका मतलब है पहले से अपने दबदबे वाले भौगोलिक क्षेत्रों पर पकड़ मजबूत रखना और रत्ती भर भी ढिलाई न आने देना. पूरी हिंदी पट्टी से पश्चिमी भारत तक कुल 314 सीटों वाले 13 राज्यों का सिलसिला है, जहां 2019 में भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ 296 सीटें बुहार ली थीं और विपक्ष के लिए महज 31 छोड़ी थीं.
आकार के क्रम से ये राज्य हैं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश. इरादा यह है कि समर्थन के इस मिनी महाद्वीप में हर मुमकिन जगह फायदों को अधिकतम पर पहुंचाएं और नुकसान की छोटी से छोटी संभावना को उखाड़ फेंकें.
पिछले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा का दबदबा था, पर फिर भी 16 सीटें ऐसी थीं जो उसने नहीं जीतीं और जहां उसके बढ़ने की गुंजाइश है. यह उस तरह का राज्य भी है जहां उसके दोहरे प्रलोभन राम और रोटी का अनुकूल असर है. जोखिम के लिहाज से उसे महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार पर नजर रखनी होगी. मगर वे अवसर भी हैं, क्योंकि महाराष्ट्र और बिहार में वह पहली बार बड़े भागीदार के रूप में चुनाव में उतर रही है. 2024 का चुनाव भाजपा के लिए इन राज्यों में पार्टी के तौर गहराई से स्थापित करने का मौका भी है. इत्तेफाक नहीं कि यही वे राज्य हैं जहां भाजपा को लंबे समय से रणनीतिक जोर देते देखा गया है.
इसी से जुड़ी दूसरी प्रमुख रणनीति है विपक्ष को धराशायी करना. यह कई तरीकों से किया जा रहा है, जो सभी एहतियात से नियोजित और निर्ममता से तामील हैं. यह जुआ सबसे नाटकीय ढंग से महाराष्ट्र में खेला गया, जहां पुरानी सहयोगी शिवसेना भाजपा को बियाबान में छोड़कर चली गई थी. पहले सेना को तोड़ा गया और एक साल बाद शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को.
दूसरी पटकथा की तहें किसी जादूगर की तरकीब की तरह बिहार में खुलीं, जहां विपक्षी एकता के पटकथाकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही जनवरी में पाला बदल लिया. लुभाओ, दलबदल करवाओ, केंद्रीय एजेंसियों की धमकी दो और इस तरह भाजपा विपक्ष को हमेशा और लगातार भ्रमित और बदहाल रखती है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरीखे हठी नेता सलाखों के पीछे कैद में अपने दिन गिनते देखे जा रहे हैं.
इरादा हर जगह एक ही है, इंडिया (आईएनडीआईए) गुट के वोटों को एकजुट न होने देना. इस नाटक को दूसरे ढंग से समझें तो यह और अच्छी तरह समझ में आता है. 2019 में भाजपा ने अपनी 303 सीटों में से 224 सीटें 50 फीसद से ज्यादा वोट पाकर जीती थीं. यह भाजपा के गढ़ का मूल क्षेत्र है. इसका मतलब है कि विपक्ष व्यावहारिक तौर पर इनके बारे में सपने देखना बंद कर सकता है. अगर वह यहां सेंध लगाना चाहता है तो उसे 5-10 फीसद वोटों का जबरदस्त उलटफेर करना होगा. चुनावी अफसानों का हासिल इसके हक में दिखाई नहीं देता.
फिर 319 सीटें रह जाती हैं जहां भाजपा अडिग और अविचल नहीं रही है और उसके रणनीतिक कामों की फेहरिस्त में इन इलाकों में आक्रामक ढंग से जोर लगाना है. कुल मिलाकर, 2019 में एनडीए की वोट हिस्सेदारी 45 फीसद थी और यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) महज 26 फीसद वोट पा सका था. अब जब यूपीए ने किंचित जीर्ण-शीर्ण इंडिया गुट में अपना विस्तार कर लिया है, उसे खेल में आने के लिए अपने वोटों को एक साथ लाना और अपनी वोट हिस्सेदारी को कुल जमा करीब 44 फीसद पर पहुंचाना होगा. विपक्ष के मोर्चों पर भाजपा की निशानेवार गोलाबारी ठीक इसी संभावना को रोकने के लिए है.
भाजपा के तीसरे रणनीतिक फोकस की नजरें दूर तक शिकार पर टिकी हैं. इसे कोरोमंडल चुनौती कहिए. पूरब में पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण के ज्यादातर राज्यों तक समूचा मेहराब या तो उसके नए जोते गए खेत हैं या पूरी तरह अछूते इलाके. यहां वह लंबे वक्त से अपने भौगोलिक पदचिह्नों का विस्तार करना चाहती रही है, जिसे पूरी तरह फलीभूत होने में कुछ वक्त लग सकता है.
बंगाल, जहां 2019 में उसे 42 में से 18 सीटें मिली थीं, अकेला राज्य है जहां उसके नंबर 2 पार्टी के रूप में बढ़ने की संजीदा संभावनाएं हैं. मगर ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश सरीखे राज्यों से छोटा-सा हासिल भी अंतत: उसकी सीटों की गिनती बढ़ाएगा और दूसरी जगहों पर किसी संभावित नुकसान के खिलाफ रक्षा में मदद करेगा.
यही नहीं, उस तरह के गठजोड़, जैसा आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी के साथ हुआ है, उसकी सोहबत में सहयोगी दलों को बढ़ने में मदद करता है. इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दक्षिण के ताबड़तोड़ दौरों को और जोड़ लें तो आपको पता चलेगा कि भाजपा को वहां चुनावी संभावनाएं नजर आ रही हैं. 400 पार का लक्ष्य हासिल करना है तो हर सीट मायने रखती है.
भाजपा के तोपखाने की चौथी तोप भी कोई अलग-थलग हथियार नहीं है. यह है हिंदुत्व की विचारधारा पर उसका जोर. पार्टी के लंबे वक्त से संजोए गए कई लक्ष्य पूरे कर दिए गए तो कई और पक रहे हैं. अनुच्छेद 370, राम मंदिर का भव्य उद्घाटन, काशी की ज्ञानवापी मस्जिद में कानूनी फच्चर, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और उत्तराखंड से समान आचार संहिता का पहला मसौदा सभी की उसके मूल मतदाताओं में अपील है. साथ ही, नीतीश को अपने पाले में ले आने का मतलब है जाति जनगणना के उस नारे को भोंथरा कर देना जिसे इंडिया धार दे रहा था.
आखिरी पर उतना ही अहम, मोदी खुद. सब कुछ कहने और सुनने के बाद वे अब भी भाजपा के निर्णायक तुरुप के पत्ते की तरह चुनावी दृश्य पर छाए हैं. यही वजह है कि 2024 को राष्ट्रपति शैली के चुनाव अभियान में बदलना उन्हें माफिक पड़ता है. 4 जून को हमें पता चलेगा कि भारत के कितने जनसाधारण भाजपा की 400 से ज्यादा की तलाश का उसके मनमाफिक जवाब देकर मोदी की मेहराब के तले आते हैं.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

