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अबूधाबी में आयोजित हुए डबल्यूटीओ के एमसी13 में दिखा भारत का दबदबा

व्यापार नियम कई वैश्विक बाधाओं के कारण और जटिल हो गए थे. नई दिल्ली का ज्यादातर रुख घरेलू जटिलताओं से संचालित था

1 मार्च को आबू धाबी में आयोजित हुए डब्ल्यूटीओ के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल
1 मार्च को आबू धाबी में आयोजित हुए डब्ल्यूटीओ के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल
अपडेटेड 21 मार्च , 2024

अबूधाबी में विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) के 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी13) में विचार विमर्श के लिए शामिल होने में भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को भले ही दो दिन की देर हो गई हो लेकिन जैसे ही वे पहुंचे, उनकी मौजूदगी का एहसास हुआ.

भारत ने दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर चीन के लाए गए इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन डेवलपमेंट (आईएफडी) एग्रीमेंट को रोका जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर गैर व्यापार की संभावित बाधाएं खड़ी कर देता. प्रशांत देशों के समूह को फिश सब्सिडी पर साथ लिया और गहरे समुद्र में हो रही अनियमित और सब्सिडाइज्ड मछली पकड़ने पर पश्चिमी देशों को किनारे किया. भारत ने अपने और विकासशील देशों के हितों पर जोर दिया. 

यह पहले ही साफ था कि 26 फरवरी से 2 मार्च के बीच हुए इस दौर की बातचीत में नतीजा निकलने की उम्मीद नहीं है. फिर भी 164 सदस्य देशों के इस निकाय पर व्यापार नियमों पर सहमति हासिल करने का दबाव था.

व्यापार नियम कई वैश्विक बाधाओं के कारण और जटिल हो गए थे. नई दिल्ली का ज्यादातर रुख घरेलू जटिलताओं से संचालित था. लेकिन भारत ने आर्थिक और राजनयिक तौर पर देश के बढ़ते दबदबे को भी पेश किया. महत्वपूर्ण मसलों और उनके नतीजों पर एक नजर: 

निवेश सुगमता 
> मसला: कोई 123 देशों की सहमति वाले आईएफडी एग्रीमेंट का लक्ष्य निवेश माहौल सुधारना और एफडीआई प्रोत्साहित करना है. 

> भारत का रुख: जलवायु, लिंग, श्रम और निरंतरता जैसे गैर व्यापारिक मसलों के इस समझौते का हिस्सा होने पर भारत का मानना है कि इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान होगा जबकि ये मसले डब्ल्यूटीओ के मसौदे से बाहर हैं और उन पर चर्चा करने का कोई आदेश नहीं है. 

> नतीजा: नई दिल्ली ने जब प्रिटोरिया के साथ मिलकर साझा चिंताएं उठाईं तो इस पर फैसला टल गया. 

कृषि पर समझौता 
> मसला: एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर (एओए) में घरेलू उत्पादकों की कृषि सब्सिडी घटाने पर जोर दिया गया है और यह देश के कृषि जीडीपी का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए. 2013 के बाली सम्मेलन में (एमसी9) भारत ने अस्थायी प्रावधान मान लिया था जिसमें यह शर्त थी कि किसी भी विकासशील देश को सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रम से कानूनी तौर पर नहीं रोका जा सकेगा भले ही सब्सिडी सीमा से अधिक हो. बाद में भारत ने कुछ और देशों को साथ लिया और समझौता करने के लिए अधिक रियायतों की मांग की. 

> भारत का रुख: भारत इसका स्थायी समाधान चाहता है. एमसी10 के बाद से ही वह किसानों के समर्थन और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीमा से अधिक सब्सिडी के लिए दबाव डाल रहा है. वह सब्सिडी पर पश्चिमी देशों के गणना के तरीके का भी विरोध करता है. 

> नतीजा: कोई समझौता नहीं हुआ क्योंकि भारत ने अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर पश्चिमी दबाव को नाकाम कर दिया. 
 
फिशरीज सब्सिडी
> मसला: एमसी12 में अंगीकार किए गए फिशरीज सब्सिडीज समझौते को नुकसानदेह सब्सिडियों पर प्रतिबंध लगाकर महासागर निरंतरता की दिशा में बड़े कदम के रूप में देखा गया. 71 सदस्य देशों द्वारा मंजूर इस समझौते के लिए 39 और देशों की मंजूरी की जरूरत है जिससे कि इसे लागू करने के लिए 110 देशों की आवश्यक स्वीकृति मिल जाए. 

> भारत का रुख: भारत चाहता है कि समझौते में गहरे समुद्र में गैर कानूनी फिशिंग पर नियंत्रण और बड़े ट्रॉलर्स को दी जा रही सब्सिडी को भी शामिल किया जाए. 

> नतीजा: भारत और प्रशांत देशों के विरोध के बाद फैसला टाल दिया गया. 

इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन 
> मसला: 1998 से इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क लगाने पर रोक है. डिजिटल उत्पादों और गैर भौतिक ई-उत्पादों के ऑनलाइन आयात को इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन कहते हैं. 

> भारत का रुख: आरएसएस समर्थित स्वदेशी जागरण मंच सहित भारत के कई घरेलू लॉबी समूह गोयल के मंत्रालय पर लगातार दबाव डाल रहे थे कि ई-ट्रांसमिशन पर टैक्स के लिए सार्वभौम अधिकार हासिल किए जाएं. भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने रोक बढ़ाने के दबाव का विरोध किया. 

> नतीजा: इसे खत्म करने की तारीख पर सहमति बनी. यह रोक 31 मार्च, 2026 या एमसी14, जो भी पहले हो, तक लागू रहेगी.

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