- अरुण पुरी
वे भारत की उत्सवी स्टार्ट-अप दुनिया के दो महानायक थे. जब उनके मूल्यांकन ऊंचाइयां छू रहे थे तो हर कोई उनकी तरफ तारीफ भरी निगाह से देखता था. लेकिन फिर अचानक औंधे मुंह गिरने लगे. एडटेक के बड़े नाम बायजूज के सह-संस्थापक बायजू रवींद्रन को खास तौर पर ज्यादा तीखी गिरावट देखनी पड़ी.
2022 में 22 अरब डॉलर (1.8 लाख करोड़ रु.) के चकित कर देने वाले मूल्यांकन से गिरकर जनवरी 2024 के अंत में बायजूज का मूल्यांकन महज 22 करोड़ डालर (1,824 करोड़ रु.) पर सिमट गया. यह 99 फीसद की गिरावट थी. इसी तरह डिजिटल भुगतान सेवा पेटीएम की पितृ कंपनी वन97 कम्युनिकेशंस का मूल्यांकन 2021 में शेयर बाजारों में सूचीबद्धता के समय 1.1 लाख करोड़ रुपए था. यह अब गिरकर महज एक चौथाई रह गया है.
पेटीएम के शेयरों की कीमतें भी 2021 में 1,564 रुपए से लुढ़ककर 6 मार्च को 393 रुपए रह गई. ऐसा तब हुआ जब भारतीय रिजर्व बैंक ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और उसे अपने पेमेंट्स बैंक को बंद करने को कहा. इसके संस्थापक विजय शर्मा ने भी बायजू की तरह कस्बाई भारत से अपनी जिंदगी की शुरुआत की थी. साधारण परिवार वाले इन दोनों शख्सों ने अपने स्टार्ट-अप शुरू किए जो भारत की नई अर्थव्यवस्था के शानदार प्रतीक बन गए.
दोनों के अपने-अपने डोमेन, डिजिटल भुगतान और डिजिटल शिक्षा से करोड़ों ग्राहक जुड़े थे लेकिन भीतर से दोनों कंपनियों को एक ही कीड़ा खोखला कर रहा था. आप इसे अभिमान कह सकते हैं जिसमें कुछ लोग सख्त नियत प्रक्रिया को बिसरा देते हैं और फिर नियमों में फंसकर हार जाते हैं. प्रतिभाशाली लोगों में यह विशेषता होती है, लेकिन व्यापार में यह बिना किसी अचरज के घातक साबित होती है. लिहाजा दोनों के लिए एक जैसे पटाक्षेप का इंतजार था, टूटे सपनों के साथ अपयश.
उनकी यश की ऊंचाइयों कैसे बढ़ीं? फिर बीच हवा में ही क्या गड़बड़ हो गई? इस सप्ताह की आवरण कथा में मुंबई में मैनेजिंग एडिटर एमजी अरुण, बेंगलूरु में एसोसिएट एडिटर अजय सुकुमारन और दिल्ली में सीनियर एसोसिएट एडिटर सोनम खेत्रपाल ने बिजनेस विश्लेषण के साथ-साथ उतार-चढ़ाव भरी इन व्यक्तित्वों की दिलचस्प कहानी का जायजा लिया है.
दोनों गैर महानगरीय कस्बों में पले-बढ़े, दोनों के मां-बाप में से कोई न कोई सरकारी स्कूल में शिक्षक था. बायजू उत्तर केरल में कन्नूर के उपनगर अझिकोड में और शर्मा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और हरदुआगंज में. दोनों ने ही छोटे शहरों की सीमाओं को लांघने की महत्वाकांक्षा पाली.
जिस जीवन की उनकी इच्छा थी, उसके लिए उन्हें पर्याप्त अंग्रेजी भी नहीं आती थी. बोलने-बतियाने वाले शर्मा ने हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़ाई के बाद दिल्ली के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बी.टेक करने के दौरान रॉक गीतों से अपना शब्द भंडार बढ़ाया. शर्मीले लेकिन खेल प्रेमी बायजू ने अपनी इंजीनियरिंग डिग्री की पढ़ाई के दौरान रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री सुनकर सीखा.
यहीं से दोनों की कहानी अलग हो जाती है, जो बाद में जाकर फिर जुड़ जाती है. शर्मा ने डिजिटल क्षेत्र में जल्द दस्तक दी. उन्होंने कंपनियों को कंटेट मैनेजमेंट सिस्टम बेचना शुरू किया, जिसे 1999 में उन्होंने 10 लाख डॉलर में एक अमेरिकी कंपनी को बेच दिया. 2000 तक उन्होंने वन97 कम्युनिकेशंस शुरू कर दी जो फोन डायरेक्टरी में सर्च इंजन के रूप में शुरू हुई लेकिन बाद में डिजिटल वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में फली-फूली.
इसी में पेटीएम, जो पे थ्रू मोबाइल का संक्षिप्त नाम था, 2010 में शुरू किया. बायजू ने ज्यादा दुनिया देखी. परीक्षा देने वाले दोस्तों को अनौपचारिक तौर पर उस समय पढ़ाया जब 2006 में जहाजों की मरम्मत के लिए दुनिया भर में घूमने के बाद वे बेंगलूरु में आराम करने आते थे. गणित पढ़ाने में वे इतने अच्छे थे कि मांग लगातार बढ़ती गई और एक व्यवसाय नजर आने लगा.
भौतिक क्लासों, जिनके लिए ऑडिटोरियम भर जाता था, से लेकर वीडियो के जरिए लाखों लोगों से संवाद करने वाले बायजू के लिए अगला तार्किक कदम इंतजार कर रहा था. उन्होंने 2011 में अपनी होल्डिंग कंपनी थिंक ऐंड लर्न (टी ऐंड एल) प्राइवेट लिमिटेड शुरू की और 2015 में अपना ऑनलाइन शैक्षिक सामग्री इंजन शुरू किया.
इन दोनों के कारोबारों को अचानक और अप्रत्याशित घटनाओं ने भी कई गुना बढ़ा दिया. नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के साथ कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ जोर के कारण पेटीएम को फायदा हुआ, जिसने वॉलेट और फास्टैग सेवाओं में महारत हासिल कर ली थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "आजाद भारत के वित्तीय इतिहास में सबसे निडर फैसला लेने के लिए’" धन्यवाद देने वाले पूरे पन्ने के विज्ञापनों ने बिना किसी नुकसान के उनका काम ही किया. वहीं चार साल बाद महामारी आई तो शिक्षा के लिए डिजिटल होना जरूरी हो गया. इस बार बागडोर बायजू के हाथ में थी और 12 करोड़ छात्र उनके साथ थे. दोनों के कारोबारों में बहुत संभावनाएं थीं और इतनी बुरी तरह उनके औंधे मुंह गिरने का कोई कारण नहीं था.
मगर क्रिकेट के जुनूनी बायजू जल्दबाजी में स्ट्रोक मारने लगे. उन्होंने फंडिंग के कई दौर में जो 4.8 अरब डॉलर जुटाए, उनमें से बहुत सारे आकाश एजुकेशनल सर्विसेज और व्हाइटहैट जूनियर जैसी महंगी खरीद में उड़ा दिए. वे बॉल और बैट के बीच काफी अंतर रख रहे थे, जैसे 2021 और 2023 के बीच 16 महीने से अधिक तक मुख्य वित्तीय अधिकारी का नहीं होना.
यह वही समय था जब थिंक ऐंड लर्न के 2021-22 के ऑडिट स्टेटमेंट्स में एक साल की देर हुई और इस दौरान उसकी देनदारी छह गुना बढ़कर 17,678 करोड़ रुपए हो गईं. जुलाई 2023 में जब कोविड-19 के फायदे खत्म हो गए और डॉलर वापस अमेरिका जा रहा था तो तीन निवेशकों ने बोर्ड से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि "कार्यकारी नेतृत्व ने रणनीतिक, परिचालन, कानूनी और कंपनी प्रशासन से संबंधित सिफारिशों और सलाहों की लगातार अनदेखी की है."
फरवरी में कुछ निवेशकों ने एक असाधारण आम बैठक बुलाई और कंपनी के नियंत्रण से संस्थापक तक को हटाने के लिए मतदान किया. बायजू के कर्मचारियों की संख्या 55,000 से घटकर 15,000 रह गई है और वह उनको वेतन तक का भुगतान नहीं कर पा रही है.
इस बीच शर्मा को आरबीआई ने घेरा है. उसने पेटीएम की नियामकीय गड़बड़ियों को लेकर लगातार सवाल उठाया है, जिसमें डिजिटल वॉलेट लेनदेन की खराब निगरानी भी शामिल है. अक्टूबर 2023 में जब आरबीआई ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक के खातों की बाहर से ऑडिट कराई तो उसने केवाईसी नियमों में 'लगातार उल्लंघन' पाया. उनमें धोखाधड़ी की आशंका थी. उसके बाद उसने शर्मा को जोरदार झटका देते हुए उनसे पेटीएम फास्टैग और पेमेंट्स बैंक का कामकाज बंद करने को कहा.
शर्मा और बायजू दोनों ने फिर से संवरने का वादा किया है लेकिन उनकी कहानी हमारे दौर की एक सतर्कता भरी कहानी है. डिजिटल भारत के दो पोस्टर बॉय का पतन बताता है कि जहां स्टार्ट-अप बड़ा सपना सोच सकते हैं, वहीं उन्हें अच्छे कंपनी प्रशासन से भी जुड़ा रहना होना होगा अन्यथा वे अनियंत्रित पूंजीवाद का शिकार हो जाएंगे.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

