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क्या वाकई ग्रामीण और शहरी भारत के बीच आर्थिक खाई कम होने लगी है?

अब ग्रामीण भारत में भी खाद्य वस्तुओं के मुकाबले गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च अधिक है और जहां अनाजों पर खर्च घटा है तो वहीं फल-सब्जियों लोग ज्यादा खर्च कर रहे हैं

शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण भारत में सामान और सेवाओं पर खर्च तेज गति से बढ़ा है
शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण भारत में सामान और सेवाओं पर खर्च तेज गति से बढ़ा है
अपडेटेड 12 मार्च , 2024

इस और अगले वित्त वर्ष में करीब 7 फीसद की अनुमानित विकास दर के बावजूद अर्थशास्त्री अक्सर ग्रामीण आय और उपभोग में सुस्ती का हवाला देते हुए उसे समृद्धि में बाधक बताते हैं. लेकिन 24 फरवरी को केंद्र की ओर से जारी किए गए नए आंकड़े इस मोर्चे पर थोड़ी खुशी दिखाते हैं. 

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) ने करीब 11 साल बाद हुआ पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण (सीईएस) जारी किया है. इसमें बताया गया है कि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण भारत में सामान और सेवाओं पर खर्च तेज गति से बढ़ा है.

इसे प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय (एमपीसीई) के रूप में प्रदर्शित किया गया है. यह खर्च ग्रामीण इलाकों में 62 फीसद बढ़कर 2022-23 में 3,773 रुपए हो गया जो 2011-21 में 1,430 रुपए था. शहरी केंद्रों में यह 2,630 रुपए से बढ़कर 6,459 रुपए पर पहुंच गया.

इस सर्वेक्षण में देशभर के 8,723 गांवों और 6,115 शहरी ब्लॉक के परिवारों को शामिल किया गया. यह सर्वेक्षण भारतीयों के उपभोग और खर्च के तौर-तरीकों, उनके जीवन स्तर और खुशहाली को समझने में उपयोगी है. इसी तरह का सर्वेक्षण 2017-18 में किया गया था पर उसके नतीजे केंद्र ने जुटाए गए आंकड़ों की गुणवत्ता के मसले का हवाला देते हुए खारिज कर दिए थे. 

ताजा रिपोर्ट में एक और उत्साहजनक बात यह है कि ग्रामीण भारत में गैर-खाद्य खर्च (54 फीसद) खाद्य खर्च (46 फीसद) की तुलना में अधिक है. खाद्य पर कम खर्च का एक साफ मतलब यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति अब उपभोक्ता सामान, परिधान या अन्य पसंद के उत्पादों पर ज्यादा खर्च करने का इच्छुक और समर्थ है. 

भारतीय स्टेट बैंक में समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष का कहना है, "मोटे तौर पर इसके ज्यादातर कारण सरकार की वे पहल हैं जो उसने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, ग्रामीण बुनियादी ढांचे का निर्माण, किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण आजीविका में अच्छा खासा सुधार करने के रूप में की हैं." बैंक ऑफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस इसे 'स्वाभाविक' विकास बताते हैं. वे कहते हैं, "एक बार जब हमारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं तो हम अन्य वस्तुओं पर खर्च करने लगते हैं. इसके अलावा अगर खाद्यान्न मुफ्त है तो दूसरे सामान पर खर्च के लिए अधिक राशि मिल जाती है."

इसकी जो भी व्याख्या की जाए, लेकिन सत्तारूढ़ दल के लिए इससे अच्छा कोई और समय नहीं हो सकता था क्योंकि यह रिपोर्ट लोकसभा चुनाव से ठीक कुछ ही हफ्ते पहले आई है. यह नीति आयोग की उस बात की भी पुष्टि करती है जिसने हाल ही में दावा किया था कि पिछले नौ साल में 24 करोड़ 82 लाख भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर आ गए हैं.

घोष के मुताबिक, "2018-19 के बाद ग्रामीण गरीबी में 440 आधार अंक ( 4.4 फीसद अंक) की अच्छी खासी गिरावट आई है और शहरी गरीबी महामारी के बाद 170 आधार अंक (1.7 फीसद अंक) घटी है." वे कहते हैं कि इससे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्ति के लिए शुरू की गई सरकारी योजनाओं के अच्छे असर की 'पुष्टि' होती है. 

तो भारतीय उपभोक्ताओं की पसंद आखिर कैसे बदल रही है? ग्रामीण और शहरी भारत, दोनों की खाने-पीने की आदतों में बदलाव आ रहा है. अनाज और दलहन की खपत घट रही है और दूध की बढ़ रही है. इसी तरह दोनों ही अनाज की तुलना में फल और सब्जियों पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं - इस सबसे संकेत मिलता है कि लोग अधिक पोषक खाद्य की ओर जा रहे हैं हालांकि प्रोसेस्ड फूड के लिए प्राथमिकता भी बढ़ रही है. 

इतनी समानताओं के बावजूद अंतर भी बरकरार है. शहरी भारतीयों के मुकाबले गांव में रहने वाले लोग अनाज पर अपने एमपीसीई का ज्यादा खर्च करते हैं (5 की तुलना में 3 फीसद), दलहन पर यह खर्च (2 की तुलना में 1.39 फीसद), दूध और दूध उत्पादों पर ( 8.3 की तुलना में 7.2 फीसद), सब्जियों पर (5.4 की तुलना में 3.8 फीसद) और अंडे, मछली तथा मांस पर (4.9 की तुलना में 3.7 फीसद) है.

हालांकि ग्रामीण लोग आमतौर पर खाद्य के बजाए गैर-खाद्य सामान पर अधिक खर्च करते हैं. जब बात टिकाऊ सामान की हो तो उनके खर्च का हिस्सा शहरी उपभोक्ताओं की तुलना में कम है. लेकिन परिधान, बिस्तर और जूते-चप्पल जैसी जरूरतों पर अधिक है. 

इसका यह मतलब है कि आर्थिक असमानता भले ही घटी हो, इसके बावजूद शहरों और कस्बों ही नहीं, गांवों के भीतर भी गैर-बराबरी बरकरार है. भारत की ग्रामीण आबादी के सबसे निचले पांच फीसद तबके के पास औसत एमपीसीई का 1,373 रुपए ही है जो शीर्ष पांच फीसद आबादी (10,501 रु.) से 87 फीसद कम है. शहरी इलाकों में भी यह अंतर 90 फीसद तक है - नीचे के पांच फीसद के लिए 2,001 रुपए जबकि ऊपर के पांच फीसद के लिए 20,824 रुपए. 

इस बीच पहली बार कृषि परिवारों का औसत एमपीसीई (3,702 रु.) ग्रामीण परिवारों के कुल औसत (3,773 रु.) से नीचे गिर गया है. और, इससे कृषि क्षेत्र में लगातार दबाव का पता चलता है. अब जबकि किसान आंदोलन की धमक बरकरार है, ऐसे में विपक्ष लोकसभा चुनाव से पहले सरकार को घेरने के लिए यह मुद्दा उठा सकता है.

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