scorecardresearch

हरित नोआ: मोटरसाइकिलिंग की दुनिया की सबसे बड़ी स्पर्धा को जीतने वाला देसी राइडर

दुनिया में मोटरसाइकिल की सबसे कठिन रैली डकार जीतने वाले पहले भारतीय हरित नोआ जानते हैं कि खुद को शांत और विनम्र कैसे रखा जाए

हरित नोआ
तस्वीर - क्रिस्टिआनो बार्नी
अपडेटेड 8 मार्च , 2024

पहले थोड़ी हल्की-फुल्की बातें. जब वे 16 बरस के थे, उनके माता-पिता ने क्रिसमस के तोहफे में उन्हें एक सेकंडहैंड मोटरसाइकिल खरीदकर दी थी.

केरल के पलक्कड जिले के अपने गृहनगर शोरानूर में धान के खेतों में उसे चलाना सीखते वक्त उस धूल भरे रास्ते पर रेस की प्रैक्टिस करती सवारों की एक टोली ने उनके किशोर मन पर गहरी छाप छोड़ी.

हफ्ते भर बाद ही हरित नोआ अपनी पहली रेस में हिस्सा ले रहे थे. उसमें अच्छी शुरुआत के बाद वे सबसे आखिरी रहे. पर फिर भी कहानी में मोड़ तो आ ही चुका था.

एक विजेता की बनावट

दरअसल, नोआ रेस के दौरान अपनी टाइमिंग या रोजाना की अपनी पोजिशन पर नजर नहीं रखते. अपनी 30वीं सालगिरह के दो दिन बाद शोरानूर से इंडिया टुडे के साथ बात करते हुए वे कहते हैं, "मेरे मेंटल ट्रेनर और मेरा मानना है कि मेरे लिए वह सब न जानना ही हमारे लिए अच्छा है.

डकार इतनी लंबी रेस है और उसमें इतनी सारी चीजें हैं कि गड़बड़ हो सकती है. अंतिम नतीजा कई सारी चीजों पर निर्भर करता है. कुछ पर आपका नियंत्रण हो सकता है, कुछ पर नहीं. मैं तो बस राइडिंग के अगले किलोमीटर पर फोकस करने की कोशिश करता हूं. उसका रास्ता मुझे जहां भी ले जाता है, वहीं पहुंचने का हकदार रहता हूं. मुझे उससे खुश होना चाहिए."

नोआ कम से कम शब्दों में सपाट-सी आवाज में बोलते हैं. उन्होंने सभी सवालों के जवाब बिना किसी उतार-चढ़ाव के दिए. वे इतने निश्चिंत और आश्वस्त मालूम देते थे कि लगता था उन्हें पता ही नहीं, उन्होंने क्या हासिल कर लिया है. उस देश में जहां दुनिया का सबसे बड़ा दुपहिया उद्योग है, उन्होंने मोटरसाइकिलिंग की दुनिया की सबसे बड़ी स्पर्धा को जीतकर दिखाया है; उस खेल में जिसे खुदकुशी की हद तक बेपरवाह होकर जोशो-खरोश से भरे दीवानों का अधिकार क्षेत्र माना जाता है.

टीवीएस मोटर कंपनी में प्रीमियम बिजनेस के हेड विमल सुंबली कहते हैं, "हरित एक जिम्मेदार शख्स और बेहद जिम्मेदार राइडर हैं." टीवीएस ने नोआ को उस वक्त भर्ती किया था जब वे 18 साल के थे और 2011 में पहले ही प्रयास में नेशनल सुपरक्रॉस चैंपियनशिप जीत चुके थे. सुंबली यह भी जोड़ते हैं, "रेसिंग दिमागी दमखम का खेल है, इसका वास्ता जोशो-खरोश से उतना नहीं. हरित अनोखी प्रतिभा हैं. वे ऊर्जावान और जिज्ञासु हैं, कड़ा रियाज करते हैं. उनके कंधों पर एक अदद शांत और ध्यानस्थ दिमाग है."

नोआ अब तक पांच बार नेशनल सुपरक्रॉस खिताब जीत चुके हैं. उन्होंने डकार में पहली बार 2020 में हिस्सा लिया था. 2021 में वे 20वें पायदान पर रहे, जो किसी भारतीय के लिए सबसे ऊंचा पायदान था. जाहिर है, इस साल से पहले तक.

और फिर टूटा बांध

नोआ के पिट मैकेनिक और मैनेजर शुरुआती सालों में उनके पिता ही थे. हरित कहते हैं, "मुझे राइडिंग में मजा आता था और मैं बेहतर बनना चाहता था. मैं धान के खेतों में राइडिंग कर रहे दूसरे लड़कों की तरह मोटरसाइकिल को रपटाना-कुदाना चाहता था." सचमुच. स्कूल के बाद उन्होंने ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स साइंस के कॉरेस्पोंडेंस कोर्स में दाखिला लिया. यहां उनकी मुलाकात स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट नील रोच से हुई, जो अब उनके मेंटल ट्रेनर हैं.

इंटरव्यू लेने वाले कभी-कभी उनसे अपनी शर्ट उतारकर देह दिखाने को कहते हैं, जो किसी एमएमए फाइटर या कलारीपयट्टू के महारथी के मुआफिक है. रैलियों में हिस्सा लेना जबरदस्त फिजिकल ट्रेनिंग की मांग करता है. वे कहते हैं, "मैं खुद अपना फिटनेस ट्रेनर हूं. मैं अपने पढ़े कोर्स से प्रेरणा लेता हूं." उन्होंने लॉस एंजेलिस में सबसे उम्दा एथलीटों के लिए बने रेड बुल के केंद्र से प्रशिक्षण लिया है.

मोटरसाइकिल रैली के लिए तीन बुनियादी खूबियों की जरूरत होती है: शारीरिक दमखम, नैविगेशन या रास्ता बनाने का हुनर और राइडिंग का हुनर. नोआ मानते हैं कि दमखम और नैविगेशन के मामले में वे बेहतरीन मोटरसाइकिलिस्ट्स की बराबरी पर खड़े हैं. वे कहते हैं, "मुझे अपने राइडिंग हुनर को संवारने की जरूरत है." नोआ उन एथलीट्स से मुकाबला करते हैं जिन्होंने मात्र तीन बरस की उम्र में राइडिंग शुरू की; भारतीय राइडर देर से शुरू करते हैं. अब यह चलन बदल रहा है. सुंबली कहते हैं, "मोटोजीपी भारत में आने के साथ मोटरस्पोर्ट्स में अब करियर मुमकिन है."

डकार रैली में नोआ को एक गुप्त बढ़त हासिल थी. 2020 से यह सऊदी अरब में हो रही है, जहां मलयालियों की बड़ी आबादी है. मसलन, एंबुलेंस सेवा चला रही कंपनी केरल की है. पिछले साल उनकी टक्कर और रीढ़ में फ्रैक्चर के बाद उसने उनकी अच्छी देखभाल की. इस साल वे स्टॉपओवर के दौरान उस कंपनी के लोग मदद के लिए वहां मौजूद थे.

जीत के दो दिन बाद जब वे केरल पहुंचे तो हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए भीड़ इंतजार कर रही थी. नोआ को थोड़ा संकोच महसूस हुआ. डकार जीतना आसान है. पर इतने सारे लोगों की निगाहों के केंद्र में आना, उसमें संयत रहना? इसके लिए जिस हुनर की जरूरत है, वह हरित नोआ के पास अभी नहीं है.

 - सोपान जोशी

Advertisement
Advertisement