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प्रधान संपादक की कलम से

सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को उस इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया जिसे मोदी सरकार ने जनवरी, 2018 में अधिसूचित किया था

इंडिया टुडे कवर: कैसे लाएं पारदर्शिता
इंडिया टुडे कवर: कैसे लाएं पारदर्शिता
अपडेटेड 4 मार्च , 2024

- अरुण पुरी

राजनैतिक पार्टियों की इलेक्शन फंडिंग दुनिया भर के तकरीबन सारे लोकतंत्रों में उलझन भरा और विवादास्पद विषय है. सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को उस इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया जिसे मोदी सरकार ने जनवरी, 2018 में अधिसूचित किया था.

इस व्यवस्था की बदौलत कई तरह के दानदाता और खासकर कॉर्पोरेट कंपनियां 1,000 रुपए से लेकर 1 करोड़ रुपए तक के मूल्यवर्ग के बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक से खरीदकर अपनी पसंद की राजनैतिक पार्टी को दान दे सकीं.

दान की कोई अधिकतम सीमा न थी. न ही राजनैतिक पार्टियों के लिए दानदाता के नाम का खुलासा करना जरूरी था, उन्हें केवल इतना बताना होता था कि उन्हें कुल कितनी रकम मिली. केंद्र का कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड से 'मेज के नीचे लेन-देन' की प्रथा खत्म हो जाएगी और राजनैतिक फंडिंग में काले धन पर लगाम लगेगी.

मगर 232 पेज के सर्वसम्मत फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और रेत पर ऐसी लकीरें खींच दीं जो भविष्य में इलेक्शन फंडिंग को लेकर सारी बहसों का रंग-रूप तय करेंगी.

यह फैसला देते हुए कि यह योजना असंवैधानिक थी और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के विचार को निषिद्ध करती थी, सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार के बरअक्स निजता के अधिकार की जांच-परख की.

उसने कहा कि दानदाता की निजता जरूरी और अहम है, लेकिन हद दर्जे की छूट देकर पारदर्शिता हासिल नहीं की जा सकती. शीर्ष अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को 13 मार्च तक सभी दानदाताओं के नाम सार्वजनिक करने का निर्देश दिया, जिसके नतीजे दिलचस्प होने की संभावना है.

सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी कानून 2017 की धारा 182 में उस संशोधन पर भी ऐतराज जताया जिसने कंपनी की तरफ से राजनैतिक पार्टी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए दान देने की अधिकतम सीमा हटा दी थी. नए नियमों ने घाटे में चल रही कंपनियों को भी दान देने की इजाजत दे दी थी.

वित्त अधिनियम 2016 के जरिए एक समानांतर संशोधन करके उन विदेशी कंपनियों को भी यह अधिकार दे दिया गया जिनकी सहायक कंपनियां भारत में थीं. अदालत ने कहा कि राजनैतिक चंदे के जरिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कंपनी की क्षमता व्यक्ति की क्षमता के मुकाबले बहुत ज्यादा है. इसलिए उसने फैसला दिया कि यह योजना संविधान के अनुच्छेद 14 में अधिष्ठापित समानता के अधिकार का उल्लंघन करती थी.

शीर्ष अदालत के फैसले ने एक बार फिर भारत में राजनैतिक फंडिंग के साफ-सुथरे तंत्र की जरूरत पर रोशनी डाली है. दुनिया की दूसरी जगहों की तरह चुनाव में बेहिसाबी धन देश में चुनावी कदाचरण और भ्रष्टाचार की जड़ रहा है.

चुनाव आयोग ने लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए उम्मीदवारों की तरफ से खर्च किए जाने वाले धन की सीमाएं तय की हैं, जिन्हें महंगाई और मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी को समायोजित करने के लिए समय-समय पर बढ़ाया जाता है. बड़े लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए यह सीमा 95 लाख रुपए है, जबकि विधानसभा क्षेत्र के लिए 40 लाख रुपए. मगर वास्तविक खर्च की नाप-जोख करें तो यह समंदर के एक कतरे के जितनी जान पड़ती है.

हालांकि 2019 के आम चुनाव में हुए कुल खर्च का कोई आधिकारिक मिलान मौजूद नहीं है, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के एक विश्लेषण से पता चलता है कि हर जीतने वाले उम्मीदवार ने औसतन 58 लाख रुपए खर्च किए, जो तब के लिए तय 70 लाख की सीमा के काफी भीतर ही थे. उस चुनाव में 8,048 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे और मान लें कि हर उम्मीदवार ने इतना ही धन खर्च किया, तो उस चुनाव में उम्मीदवारों का कुल खर्च 4,667 करोड़ रुपए रहा होगा.

अगर हम इसमें 2019 के चुनाव में हिस्सा लेने वाली 32 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की तरफ से घोषित 2,591 करोड़ रुपए का खर्च भी जोड़ लें, तो यह रकम बढ़कर 7,000 करोड़ रुपए के ऊपर पहुंच जाती है. मगर दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने 2019 के आम चुनाव में चुनावों के आयोजन पर हुआ कुल खर्च, चुनाव आयोग की तरफ से खर्च की गई अनुमानित रकम के अलावा 47,000 करोड़ रुपए आंका है. ज्यादा फिक्र की बात यह है कि सीएमएस के आंकडेे 2014 के आम चुनाव के मुकाबले चुनाव खर्च में 60 फीसद बढ़ोतरी का इशारा करते हैं.

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना में जो कमियां थीं, सो तो थीं, पर साफ है कि चुनाव फंडिंग को निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने का मुद्दा अब फिर देश के सामने मुंह बाए खड़ा है. एग्जीक्यूटिव एडिटर कौशिक डेका की लिखी आवरण कथा 'चुनावी चंदा: कैसे लाएं पारदर्शिता’ इससे जुड़े तमाम पहलुओं का विश्लेषण करती और संभावित जवाब सामने रखती है.

स्टेट फंडिंग या सरकारी धन एक विकल्प है जो बार-बार उभरकर आता है. 1998 और 2008 के बीच इस मुद्दे की पड़ताल करने वाली तीन आधिकारिक भारतीय समितियों/आयोगों ने इस विचार का अनुमोदन किया. यूरोप के 86 फीसद, अफ्रीका के 71 फीसद, अमेरिकी महाद्वीपों के 63 फीसद और एशिया के 58 फीसद देशों में यही प्रथा प्रचलित है और वे इसके अच्छे और बुरे पहलुओं की जांच का बेहतरीन मौका देते हैं. एक अध्ययन से पता चला कि जर्मनी, जापान और इज्राएल सहित करीब 70 देश हर पार्टी को उसे मिले वोटों के प्रतिशत के अनुपात में धन देते हैं.

आलोचकों का कहना है कि इससे परंपरागत पार्टियों को खासा फायदा मिलता है जबकि नए संगठनों का आना ऊंची रुकावटों के कारण ज्यादा दूभर हो जाता है. दशक भर पहले किसी ऐसी आम आदमी पार्टी की कल्पना कीजिए, जिसके पक्ष में जनसम्मति तो थी पर उसे चुनावी तरीके से उसका प्रदर्शन अभी करना था. इसके लिए ऐसी पार्टी को दंडित करना यथास्थिति की तरफदारी करना होता. आप कभी भी नहीं चाहेंगे कि सुधार के खाके में ऐसी कोई चीज हो.

यही नहीं, स्टेट फंडिंग ने महज कुछ ही देशों में निजी धन की भूमिका पर असरदार ढंग से लगाम लगाई है. जैसा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी हमें बताते हैं, "स्टेट फंडिंग से तब तक कोई फर्क नहीं पड़ेगा जब तक चुनाव खर्च पर लागू सीमा सख्ती से लागू नहीं की जाती." दूसरा विकल्प यह है कि निजी फंडिंग के बारे में यथार्थवादी रवैया अपनाएं और इसे संदेह के धुंधलकों से बाहर निकालें.

कॉर्पोरेट फंडिंग अपने आप में कोई दानवी शक्ति नहीं है. जरूरत बस इस बात की है कि इसके भीतर ही ऐसी खूबियों का निर्माण करें जो इलेक्टोरल बॉन्ड योजना में नहीं थीं यानी पारदर्शिता और खुलापन, खुलासे और बेनामी तथा बेहिसाबी धन को बाहर रखने की छानबीन की व्यवस्थाएं और हरेक हकदार पार्टी के दिखाई और सुनाई देने के लिए काफी कुछ.

चुनावी फंडिंग लोकतंत्र के लिए पूंजीगत खर्च की तरह है. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला हैं और भारत में चुनाव का आयोजन दुनिया का आश्चर्य है. इन्हें ऐसे ही बने रहना चाहिए.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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