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बीजेपी लोकसभा चुनाव के लिए किस तरह की सोशल इंजीनियरिंग में जुटी है?

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की अलग-अलग जातियों को रिझाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाने की योजना बनाई है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में उज्ज्वला योजना की एक लाभार्थी के घर पर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में उज्ज्वला योजना की एक लाभार्थी के घर पर
अपडेटेड 1 मार्च , 2024

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते कुछ महीनों से कह रहे हैं कि उनके लिए सिर्फ चार जातियां हैं: युवा, गरीब, महिला और किसान. जब से बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण हुआ है और देश भर में जातिगत जनगणना की बात उठी है, तब से मोदी जात-पांत की पारंपरिक राजनीति करने के लिए विपक्षी दलों पर आक्रामक हैं.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की लोकसभा चुनाव की रणनीति में जाति आधारित सोशल इंजीनियरिंग की छाप स्पष्ट तौर पर दिख रही है. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की अलग-अलग जातियों को रिझाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाने की योजना बनाई है.

पार्टी को लगता है कि इन कार्यक्रमों के माध्यम से वह इन जातियों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब होगी और इसका सीधा असर लोकसभा चुनावों में उसकी सीटों पर पड़ेगा.

अनुसूचित जाति के मतदाताओं में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए भाजपा आने वाले दिनों में कई राज्यों में बौद्ध सम्मेलन करने की योजना बना रही है. उत्तर प्रदेश के अलावा पार्टी इन सम्मेलनों का आयोजन पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक और तेलंगाना में करने की योजना तैयार कर रही है.

छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी राज्यों में दलितों की आबादी 15 प्रतिशत या इससे ज्यादा है. इस तरह के सम्मेलन 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चर्चा में आए थे. तब भाजपा ने अखिल भारतीय भिक्खु महासंघ की मदद से उन क्षेत्रों में कई बौद्ध सम्मेलन किए थे, जहां दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी थी. महासंघ ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले एक धम्म चक्र यात्रा निकाली थी, जिसे केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने हरी झंडी दिखाई थी.

इन कार्यक्रमों को योजनाबद्ध करने में जुटे भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं, "अब तक पार्टी अनौपचारिक तौर पर 400 लोकसभा सीटें जीतने की बात कर रही थी. लेकिन अब प्रधानमंत्री ने औपचारिक तौर पर संसद में 370 लोकसभा सीट जीतने का लक्ष्य भाजपा के लिए तय कर दिया है. ऐसे में हमें देश के हर क्षेत्र में सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ने के अपने प्रयासों में और तेजी लानी होगी. हमारी कोशिश सिर्फ दलित समाज के लिए ही नहीं बल्कि आदिवासी समाज और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ अति पिछड़ा वर्ग को भी अपने साथ जोड़ने की है. इसके लिए स्वाभाविक ही है कि पार्टी कई कार्यक्रमों का आयोजन करे."

अनुसूचित जाति में भी उन जातियों पर भाजपा अधिक जोर देने की रणनीति बना रही हैं, जो अधिक पिछड़ी हैं. उदाहरण के तौर पर तेलंगाना के माडिगा और पंजाब-हरियाणा के वाल्मीकि समाज के लोग. तेलंगाना में अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी करीब 15 फीसद है, जिनमें आधी संख्या अकेले माडिगा की है. लेकिन इस जाति के लोगों का कहना है कि उन्हें अनुसूचित जाति के लिए दिए जा रहे आरक्षण और अन्य सुविधाओं का उचित लाभ नहीं मिल रहा.

तेलंगाना में विधानसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अनुसूचित जाति के उपवर्गीकरण का वादा किया था. भले ही वहां भाजपा जीत नहीं पाई लेकिन विधानसभा में पार्टी को 14 फीसद वोट मिले. इससे पार्टी को लग रहा है कि लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत और बढ़ सकता है. 

इसी वजह से मोदी सरकार ने इस साल जनवरी में कैबिनेट सचिव राजीव गौबा के नेतृत्व में भारत सरकार के सचिवों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया. कैबिनेट सचिव के अलावा इसमें गृह मंत्रालय, विधि मंत्रालय, सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्रालय, जनजातीय कार्य मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय के सचिव भी शामिल हैं. इस समिति को 1,200 से अधिक अनुसूचित जातियों की सूची में पीछे रह गई जातियों की स्थिति का अध्ययन करने का काम सौंपा गया है.

समिति की रिपोर्ट के आधार पर कुछ अनुसूचित जातियों को 'कोटा विदिन कोटा' यानी आरक्षण के दायरे के अंदर अलग से आरक्षण देने पर भी विचार किया जा सकता है. हालांकि, इसकी उम्मीद कम ही लग रही है कि यह समिति लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले अपनी रिपोर्ट दे देगी लेकिन भाजपा इस समिति के गठन का प्रचार-प्रसार करते हुए अनुसूचित जातियों के अंदर की पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाने की योजना बना रही है. 

विपक्ष की तरफ से जाति जनगणना की मांग का बचाव करने के लिए भाजपा की तरफ से इस समिति के गठन का इस्तेमाल करने की योजना है. हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फिर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पाले में आ जाने से विपक्ष की ओर से जातिगत जनगणना की मांग धीमी पड़ी है. नीतीश कुमार के पाला बदलने से न सिर्फ बिहार में कोइरी-कुर्मी समाज की सोशल इंजीनियरिंग को भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए साध पाएगा बल्कि उत्तर प्रदेश में भी कुर्मी समाज के प्रभाव वाली सीटों पर भाजपा को फायदा मिल सकता है.

बिहार के मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर को हाल में भारत रत्न देने की घोषणा को भी भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देखा गया. अति पिछड़ा वर्ग को बिहार में अलग से आरक्षण देने वाले कर्पूरी ठाकुर के पूरे राजनैतिक जीवन को पिछड़ों के लिए काम करने से जोड़कर देखा जाता है. अब उन्हें भारत रत्न देकर भाजपा ने पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पैठ और मजबूत बनाना चाहती है.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के बीच अपना आधार बढ़ाया है. इसका फौरी नतीजा राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन के रूप में सामने आया.

संसद के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने फिर से चार जातियों—युवा, महिला, गरीब और किसान की बात दोहराई लेकिन साथ ही उन्होंने पिछले दस साल में दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए किए गए कार्यों को भी गिनाया. साथ ही उन्होंने खुद को एक बार फिर से ओबीसी बताया.

भाजपा ने वैसी पिछड़ी जातियों को भी इस लोकसभा चुनाव में लक्षित करने की योजना बनाई है जिनकी संख्या प्रतिशत में कम है लेकिन जो किसी गैर भाजपा के प्रतिबद्ध वोट बैंक के तौर पर नहीं जानी जातीं. इन जातियों को ध्यान में रखकर ही मोदी सरकार ने 17 सितंबर, 2023 को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना की शुरुआत की थी. प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त, 2023 को लाल किले की प्राचीर से इस योजना की घोषणा की थी.

इस योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों समेत छोटा-मोटा तकनीकी काम करने वालों को ब्याज मुक्त कर्ज देने से लेकर उनके कौशल विकास में मदद करते हुए अन्य कई सहायता देने का प्रावधान है. इसके राजनैतिक लाभ को लेकर भाजपा इसलिए उत्साहित है कि विश्वकर्मा योजना को शुरू हुए चार महीने से थोड़ा ही अधिक वक्त हुआ है लेकिन इसका लाभ लेने के लिए अब तक 97 लाख से अधिक आवेदन आ चुके हैं.

विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों में बड़ी संख्या उन पिछड़ी जातियों के लोगों की है जो किसी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक नहीं हैं. इनमें बढ़ई, लोहार, सुनार, कुम्हार, नाई, मोची और मल्लाह के अलावा और भी कई ऐसी जातियां हैं जिनकी पहचान किसी न किसी काम से है. उदाहरण के लिए, गुजरात के जामनगर के आसपास राजमिस्तरी का काम करने वाली एक जाति है कड़िया.

इसी तरह से अलग-अलग कामों से जुड़ी कुछ जातियां अलग-अलग राज्यों में हैं. विश्वकर्मा योजना के जरिए भाजपा इन जातियों को अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रही है. आने वाले दिनों में भाजपा प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों के कई सम्मेलन अलग-अलग राज्यों में आयोजित करने वाली है. इनके जरिए पार्टी अति पिछड़ी जातियों के बीच पैठ बनाने की कोशिश करेगी.

लोकसभा चुनाव के साल में भाजपा एक तरफ जहां अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग में भी अति पिछड़ा जातियों को लक्षित कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ ओबीसी की प्रभावी जातियों को भी अपनी सोशल इंजीनियरिंग में पीछे छोड़ने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है. इसमें हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और महाराष्ट्र में मराठा समाज के लोग शामिल हैं. मराठा आरक्षण की मांग पर जिस तरह से महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार ने काम किया और इस मांग को स्वीकार करने पर सहमति दी, उसे भाजपा के दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है. 

प्रभावी जातियों को भाजपा के साथ जोड़ने की रणनीति पर पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, "हम जाट और मराठा समाज के लोगों के बीच कई कार्यक्रम करने वाले हैं. जाट और मराठा समाज में कई ऐसे लोग हैं जो किसी पार्टी की राजनीति में सक्रिय नहीं हैं लेकिन समाज में उनका प्रभाव है. इनमें से कई लोग सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं. संभव है कि ये कार्यक्रम भाजपा के बैनर तले न हों लेकिन हमारी कोशिश है कि इन मंचों से वही बात की जाए जो हम चाहते हैं." यानी भाजपा ने सभी जातियों को जोड़कर जीत की जुगत लगा रखी है.

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