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एमएसपी समेत अपनी इन मांगों को लेकर एक बार फिर से आक्रोश में हैं अन्नदाता

बातचीत में पेच फंस गया है क्योंकि किसान संगठन जो मांग कर रहे हैं उनमें से कुछ का जवाब तलाशना इतना आसान नहीं है

सब बेअसर शंभू बॉर्डर पर 13 फरवरी को आंसू गैस का सामना करते किसान
अपडेटेड 26 फ़रवरी , 2024

पंजाब-हरियाणा की सीमा के पास पटियाला के शंभू में भारी-भरकम ट्रैक्टर बड़ी संख्या में जमा हैं. ऊंची आवाज में बजते गीतों में दिल्ली (केंद्र) को नतीजे भुगतने की चेतावनी दी जा रही है और जट सिख समुदाय की बहादुरी का बखान किया जा रहा है.

गरजते हुए यह काफिला 13 फरवरी को राष्ट्रीय राजधानी को घेरने निकला था. विरोध कर रहे किसानों का दावा है कि वे अपने साथ महीनों तक का राशन और डीजल लेकर चल रहे हैं. ठीक उसी समय आकाश से आंसू गैस के गोलों की बारिश होने लगी, जिनको बैरिकेड की रक्षा में लगे सुरक्षा कर्मियों ने ड्रोन से दागा था.

यह सारी सीनरी 13 महीने पहले (सितंबर 2020 से नवंबर 2021) के राष्ट्रीय राजधानी के घेराव की याद दिला रही थी. फर्क इतना ही था कि किसान अभी दिल्ली के दरवाजे तक नहीं पहुंचे थे. उस वक्त के घेराव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पीछे हटने और कृषि क्षेत्र के बड़े सुधारों को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था.

आम चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं और लंबे विरोध की धमकी ने सत्तारूढ़ भाजपा को खासी फिक्र में डाल दिया है. आम आदमी पार्टी नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की मध्यस्थता में किसान संगठनों की केंद्रीय मंत्रियों पीयूष गोयल और अर्जुन मुंडा के साथ अभी तक दो दौर की बातचीत हो चुकी है पर बेनतीजा रही है.

हालांकि इस बार भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों से निबटने को बेहतर तैयारी की है. उसने उनको शंभू और खनौरी सीमा पर रोक दिया है और ट्रैक्टर ट्रॉलियों को दिल्ली पहुंचने से रोक रही है. दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा से सटी सीमा को सील कर दिया है. इस बीच, चंडीगढ़ में मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है जहां याचिकाकर्ताओं ने किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए लगाई गई सभी बाधाएं हटाने की मांग की है.

इस सबसे ऐसे समय मजा खराब हुआ है जब प्रधानमंत्री और भाजपा ने यह सोचा था कि उन्होंने उत्तर में कृषक समुदाय का समर्थन जुटा लिया है. हाल में भाजपा सरकार ने किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह को भारत रत्न देने का ऐलान किया जिससे इस दिग्गज किसान नेता के पोते जयंत चौधरी और उनके राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) को एनडीए में लाने में मदद मिली (लक्ष्य उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाता हैं जहां रालोद प्रमुख पार्टी है).

किसानों का विरोध अगर बढ़ा तो इस गठजोड़ पर भी असर डाल सकता है. इन विरोधों का राजनैतिक असर पंजाब में पहले ही हो चुका है और राज्य में गठजोड़ के लिए अकाली दल के साथ भाजपा की बातचीत पटरी से उतर गई है. हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के साथ भी रिश्तों में तनाव आ सकता है. जेजेपी पहले से ही भाजपा से नाराज है क्योंकि भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए हरियाणा में सीटों के तालमेल पर बातचीत करने से इनकार कर दिया है.

भाजपा को घेरने के लिए विपक्ष ने भी मौका नहीं गंवाया. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तुरंत ही किसानों का समर्थन किया जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किसानों से मिलने के लिए अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा बीच में ही रोक दी. आप भी मैदान में कूद गई और उसने दिल्ली के बाहरी इलाके बवाना के स्टेडियम को प्रदर्शनकारियों के लिए अस्थायी जेल में बदलने के केंद्र के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे लोग देश के अन्नदाता हैं और उनसे ऐसा घटिया व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए.

भाजपा की चुनौतियां कई गुना ज्यादा हैं क्योंकि पार्टी ने पिछले दो साल में पंजाब में जिन भी जट सिख नेताओं को तोड़ अपने साथ जोड़ा, वे इन किसान नेताओं से जुड़ नहीं पाए हैं. इस बार मोर्चा संभाल रहे किसान नेताओं में किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के सर्वन सिंह पंधेर, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू)-दोआबा के मनजीत सिंह राय, बीकेयू (एकता सिधुपुर) के जगजीत सिंह दल्लेवाल और लोक भलाई इंसाफ वेलफेयर सोसाइटी के बलदेव सिंह सिरसा शामिल हैं जो किसान संगठनों में दूसरी कतार के नेता हैं.

इन विरोधों का अभी पूरे पंजाब में असर नहीं हुआ है पर अगर टकराव बरकरार रहा तो कुछ लोगों का मानना है कि गुस्सा हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक में फैल सकता है. अभी तक इन राज्यों के किसान संगठनों ने आंदोलन को सिर्फ नैतिक समर्थन दिया है.

बातचीत भी मुश्किल है क्योंकि किसान संगठनों की कुछ मांगें ऐसी हैं जिनका कोई आसान हल नहीं है और उनमें राज्य भी शामिल हैं. मसलन, 60 साल से ऊपर के किसानों और कृषि मजदूरों को हर महीने 10,000 रु. पेंशन देने की मांग. हाल के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भूमिहीन कृषि मजदूरों को हर साल 10,000 रु. देने का वादा किया था.

लेकिन यह पैसा राज्य के खजाने से दिया जाना है. मांगों की सूची खासी लंबी है. मुख्य मांग सभी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए कानूनी गारंटी की है, जिसकी गणना 2004 में स्वामीनाथन आयोग के सुझाए फॉर्मूले के हिसाब से की जानी चाहिए.

इसमें जमीन का किराया जैसी पूंजी लागत (सी 2) को भी जोड़ने की बात है जबकि मोदी सरकार ने कमतर फॉर्मूला (ए 2+एफ एल) अपनाया है, जिसमें परिवार के श्रम सहित सभी तरह की लागत शामिल है. (एक चुनौती यह है कि हर राज्य में दरें अलग-अलग हैं).

किसान संगठन सभी कर्जों की पूरी तरह माफी, किसी भी तरह की कृषि भूमि के अधिग्रहण के लिए बढ़ा हुआ मुआवजा, वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2023 की वापसी की मांग कर रहे हैं. एक मांग जो गैर वाजिब लगती है, वह है कि भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से अलग हो जाए. इसके अलावा 2021 की लखीमपुर खीरी घटना में मारे गए किसानों के लिए न्याय की मांग भी शामिल है.

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर कहते हैं, "विरोध कर रहे किसानों को समझना चाहिए कि अगर वे नई मांगें जोड़ते रहे तो इससे गतिरोध बढ़ेगा और समाधान में समय लगेगा.

अगर आप डब्ल्यूटीओ से भारत के अलग होने की बात कर रहे हैं और स्वतंत्र व्यापार समझौतों को खत्म करने की बात करते हैं, अगर आप स्मार्ट मीटर लगाने से रोकना चाहते हैं, पराली जलाने के मसले को बाहर रखने की मांग कर रहे हैं या जलवायु मुद्दे से कृषि को बाहर रखने की बात है, तो ये सब फैसले एकतरफा तरीके से नहीं लिए जा सकते.

इनमें कई चीजें दांव पर लगी हैं. सत्तारूढ़ भाजपा को अभी भी इस मसले को राजनैतिक और नीतिगत तरीके से संभलकर हल करना होगा. और उन्हें यह काम जल्दी ही करना पड़ेगा.

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