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समान नागरिक संहिता से क्या साधने की तैयारी में है बीजेपी?

यूसीसी पर विधि आयोग की रिपोर्ट अभी नहीं आई है लेकिन इससे पहले उत्तराखंड के बिल ने केंद्र को इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ने का पूरा मसाला मुहैया कर दिया है

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2 फरवरी को यूसीसी मसौदा रिपोर्ट पेश करते हुए
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2 फरवरी को यूसीसी मसौदा रिपोर्ट पेश करते हुए
अपडेटेड 20 फ़रवरी , 2024

बस कुछ ही हफ्ते बचे हैं आम चुनाव का ऐलान होने में. लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पूरा यकीन है कि उससे ठीक पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अपनी पार्टी भाजपा को एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिसमें मतदाताओं को लुभाने के वास्ते सियासी ध्रुवीकरण करने लायक पूरा मसाला है.

मेजों की थपथपाहट और जय श्रीराम तथा वंदेमातरम् की जोरदार गूंज के बीच राज्य विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) मसौदा विधेयक को पारित कर दिया. इसके साथ ही विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में सभी धर्मों के लिए समान नागरिक कानूनों का रास्ता साफ हो गया.

विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार सरीखे मामलों में लागू नागरिक कानून संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत आते हैं और इस पर राज्यों और केंद्र दोनों को कानून बनाने का अधिकार है. हालांकि, किसी विवाद की स्थिति में केंद्र का कानून ही मान्य होता है.

उत्तराखंड में पारित यूसीसी में थोड़े-बहुत बदलावों के साथ भाजपा शासित गुजरात और असम में भी इसी तरह का कानून बनाने की तैयारी चल रही है और मार्च मध्य में चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले ही इन्हें मंजूर कराया जा सकता है.

यूसीसी पर उत्तराखंड में लाए गए अपनी तरह के पहले विधेयक पर सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई वाली समिति ने व्यापक चर्चा की. इसने चार खंड में 749 पन्नों की रिपोर्ट का मसौदा तैयार किया और कई सिफारिशें कीं.

दूसरी तरफ, केंद्र अभी देशव्यापी यूसीसी पर विधि आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है. खैर, नया कानून राष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा गर्माए रखने के लिए काफी है. राम मंदिर उद्घाटन, ज्ञानवापी मस्जिद के एक तहखाने में हिंदुओं को पूजा की अनुमति मिलने, अनुच्छेद 370 रद्द होने और सीएए यानी नागरिकता (संशोधन) अधिनियम पर जारी बहस के बीच यूसीसी ने आम चुनाव से पहले हिंदुत्व के मुद्दे को और धार दे दी है.

अगर इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो भाजपा के मूल संगठन भारतीय जनसंघ (बीजेएस) ने 1967 से एक समान पर्सनल लॉ को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया था. इस मुद्दे का जन्म नेहरू के शासनकाल के दौरान हिंदू पर्सनल लॉ में सुधारों को संहिताबद्ध करने के विरोध स्वरूप हुआ.

मुख्य रूप से यह मुद्दा इस पर सवाल उठाने का एक तरीका था कि ऐसे सुधारों को दरकिनार करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ को संवैधानिक छूट क्यों दी गई? जनसंघ की मांग थी कि ऐसी रियायतें खत्म की जाएं.

दरअसल, इस पूरे विचार के पीछे सबसे बड़ी वजह था मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसके तहत बहुविवाह और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं के लिए खुली छूट थी. तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद 2019 में मोदी सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाकर पर्सनल लॉ पर जारी मौजूदा बहस को हवा दे दी थी.

हालांकि, इस पूरी बहस की शुरुआत आजादी के पहले ही शुरू हो चुकी थी. चूंकि, ब्रिटिश शासनकाल के अंतिम दौर में विभाजन की मांग जोर पकड़ने लगी थी, इसलिए मुस्लिम सांस्कृतिक प्रथाओं में कोई भी दखल न देना औपनिवेशिक रणनीति का हिस्सा बन गया था.

यही वजह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 में एक तरह से पूर्ण स्वायत्तता की गारंटी दी गई. विभाजन के बाद नेहरू सरकार ने सभी अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी बरकरार रखने का विकल्प चुना. उनकी राय थी कि भारत भी कहीं पाकिस्तान की तरह धर्म-केंद्रित राष्ट्र न बन जाए, इसलिए ऐसे अंदेशे को खत्म कर देना ही उचित होगा.

यही वह क्षेत्र है जिसमें मौजूदा विधेयक के जरिए बदलाव लाने की कवायद चल रही है. यह विचार हमेशा से विवादास्पद रहा है क्योंकि इसे हिंदू ध्रुवीकरण के नाम पर वोटबैंक साधने की कोशिश माना जाता है. यह मुद्दा केवल कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में रहा जब 1977 में जनता पार्टी में विलय के समय जनसंघ ने एक रणनीतिक कदम के तौर पर इसे अपने एजेंडे से हटा दिया.

लेकिन 1980 में भाजपा के गठन के साथ ही यह फिर से चर्चा में आ गया. 1998, 99 और 2004 के लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल समाजवादी सहयोगियों की वजह से भगवा पार्टी को इस पर अपने कदम पीछे खींचने पड़े. लेकिन फिर 2009 में उसने इसे अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाया. अब देशभर में एक के बाद लगातार चुनावी जीतों से उत्साहित भाजपा को लगता है कि यूसीसी को मूर्त रूप देने का समय आ गया है.

मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में नए कानून की बात करें तो जाहिर है कि यह उलेमा-मौलवियों की भूमिका सीमित कर देता है, जो आम तौर पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के तहत संगठित होते हैं और निजी अधिकारों पर शरीयत-आधारित नियम-कायदों की व्याख्या का अधिकार रखते हैं.

एक तरह से इस्लामी कानून के तहत पर्सनल लॉ पर कोई निश्चित व्यवस्था नहीं है और इसकी अलग-अलग तरह से व्याख्या की जाती रहती है, जो संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है और हमेशा से जारी प्रतिरोध के कारण इसे संहिताबद्ध नहीं किया जा सका है. भाजपा की शिकायत सिर्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाली छूट को लेकर नहीं है, बल्कि एक वजह यह भी है कि अपनी भूमिका की वजह से मौलवी समुदाय पर हावी रहते हैं.

इससे सामुदायिक नैरेटिव पर उनका नियंत्रण बना रहता है और यह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर भाजपा-आरएसएस के खिलाफ मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण की संभावना को बढ़ाता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ के हितों और उद्देश्यों की रक्षा के नाम पर 1973 में गठित ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को 'मजहबी मामलों में दखल' करार दिया है और इसके खिलाफ कानूनी कदम उठाने पर विचार कर रहा है.

उत्तराखंड में मुसलमानों की आबादी 13 फीसद है, इसलिए पार्टी के लिए उनकी चिंताओं को बहुत ज्यादा तवज्जो न देकर इस तरह का बड़ा कदम उठाना थोड़ा सहज था. लेकिन असम में यह मुद्दा गर्मा सकता है, जहां इस समुदाय की हिस्सेदारी कुल आबादी में करीब एक-तिहाई है.

उत्तराखंड ने नए कानून में सभी बच्चों—चाहे लड़की हो या लड़का-के लिए समान उत्तराधिकार निर्धारित किए हैं और इसमें जायज, नाजायज और गोद लिए गए बच्चों के बीच कोई अंतर नहीं होगा. इसके अलावा, मुसलमानों समेत सभी जोड़ों को गोद लेने की अनुमति दी गई है.

धार्मिक समारोहों के जरिए होने वाले सामूहिक विवाहों को भी इसके दायरे में लाया गया है, सभी विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य होगा. नए कानून के तहत बहुविवाह, निकाह हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं को गैरकानूनी घोषित किया गया है.

विवाह तथा तलाक के पंजीकरण के मानदंडों को कानूनी जामा पहनाया गया है. इद्दत की प्रथा हाल ही पाकिस्तानी राजनीति के केंद्र में रही, जहां जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पत्नी बुशरा खान पर आरोप लगा कि उन्होंने 2018 में इमरान से शादी के लिए अपने पिछले पति को तलाक देने के बाद इद्दत की निर्धारित अवधि पूरी नहीं की.

नए कानून में विवाह पंजीकरण के लिए गलत जानकारी देने पर जेल की सजा जैसे प्रावधान हैं, जिसे कई आलोचक ज्यादा ही कड़ा मानते हैं. नए बिल ने विशुद्ध धर्मनिरपेक्षता के अलावा लिव-इन रिश्तों को लेकर कड़े प्रावधानों की वजह से भी काफी हलचल पैदा की है. इसके चलते पार्टी पर 'बेडरूम में झांकने' की कोशिश के आरोप लग रहे हैं. बहरहाल, समुदायों के बीच टकराव बढ़ने के खतरों के बीच उत्तराखंड का यूसीसी बिल एक व्यापक बहस को जन्म दे चुका है.

क्या हैं खास प्रावधान

इलस्ट्रेशन: सिद्धांत जुमडे

> सीधे रक्त संबंधों वाले विवाह गैर-कानूनी, लेकिन ऐसे रीति-रिवाज अपनाने वाले कुछ समुदाय दायरे से बाहर.

> सबको शादी के 60 दिनों के भीतर इसे कानूनी तौर पर पंजीकृत कराना होगा, नहीं तो 10,000 रुपए का जुर्माना लगेगा. शादी के हलफनामे में गलत जानकारी देने पर तीन माह की जेल अथवा 25,000 रुपए के जुर्माने का रखा गया प्रावधान.

> बिना वसीयत वाले उत्तराधिकार के मामले में यूसीसी में पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है.

> लिव-इन जोड़ों को साथ रहने के एक महीने के भीतर 'धारा-381' की उप-धारा (1) के तहत अपने रिश्ते का विवरण रजिस्ट्रार को देना होगा, इस प्रावधान के उल्लंघन का मतलब है 10,000 रुपए का जुर्माना और तीन महीने की जेल.

> लिव-इन रिश्ते को खत्म करने की जानकारी देने के लिए भी एक शपथपत्र देना होगा. पुरुष साथी भरण-पोषण के भुगतान का जिम्मेदार होगा और ऐसे रिश्तों से जन्मा बच्चा उत्तराधिकार और अन्य सभी कानूनी अधिकारों का हकदार होगा.

> बाल विवाह पर पाबंदी, विवाह के लिए लड़कों की उम्र कम से कम 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष होनी जरूरी.

> 'हिंदू संयुक्त परिवारों' के लिए विशेष सुरक्षा उपायों के तहत बेटों और बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार दिया गया.

> खास तरह के 'पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं' को ध्यान में रखते हुए आदिवासी समुदायों को यूसीसी से बाहर रखा गया.

> यूसीसी पर बनी समिति ने 72 बैठकें कीं; ई-मेल और पत्रों के माध्यम से मिले 2,72,000 सुझावों पर भी किया विचार.

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