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पश्चिमी यूपी साधने में जुट गई हैं प्रमुख पार्टियां, किसकी क्या रणनीति?

पीएम मोदी ने बुलंदशहर से चुनावी अभियान का आगाज करके पश्चिमी यूपी को साधने की कोशिश की. इंडिया गठबंधन के घटक दल भी रैली और यात्राओं में जुटे हैं

पीएम मोदी को सिकंदराबाद की रैली में पॉटरी भेंट करते CM योगी आदित्यनाथ
अपडेटेड 14 फ़रवरी , 2024

अयोध्या के राम मंदिर में बालक राम की प्राण प्रतिष्ठा से बने माहौल को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लोकसभा चुनाव तक बनाए रखना चाहती है. इस लिहाज से प्राण प्रतिष्ठा समारोह के तीसरे ही दिन 25 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पश्चिमी यूपी के जिले बुलंदशहर में सिखेड़ा गांव के चांदमारी मैदान पर रैली महज संयोग भर नहीं थी. राजनीति में प्रतीकों और चिन्हों का बड़ा महत्व होता है. प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री की पहली जनसभा राम मंदिर आंदोलन के अगुआ रहे पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की कर्मस्थली बुलंदशहर में रखी गई. जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी मंच पर पहुंचे, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें खुर्जा में बनी पॉटरी भेंट की जिसपर राम मंदिर उकेरा गया था. इसके बाद भगवान राम की प्रतिमा भी भेंट की गई. 

जनसभा में साधु-संत समाज के लोगों की बड़ी संख्या में मौजूदगी के बीच मोदी ने अपने 31 मिनट के भाषण की शुरुआत वंदेमातरम् से की. लेकिन जैसे ही उन्होंने प्राण प्रतिष्ठा का जिक्र किया, रैली स्थल जय श्रीराम के उद्घोष से गूंजने लगा. मोदी ने अपने भाषण को किसान से लेकर विकास पर ही फोकस रखा. उन्होंने न केवल 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की योजनाओं का शि‍लान्यास किया बल्कि निर्माणाधीन नोएडा एयरपोर्ट और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का जिक्र करके पश्चिमी यूपी को रोजगार के एक बड़े केंद्र के रूप में उभारने की बात भी कही. भाषण के दौरान मोदी ने जब भी कल्याण सिंह का नाम लिया, जवाब में लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए.

पश्चिमी यूपी से उठने वाली राजनैतिक लहर का असर पूरे यूपी पर पड़ता है. गौतमबुद्ध नगर लोकसभा क्षेत्र की सिकंदराबाद विधानसभा सीट पर जनसभा के जरिए मोदी ने कुछ वैसी ही ज्वार पैदा करने की कोशिश की जैसा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा था. तब भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने बुलंदशहर से ही विजय शंखनाद रैली का आगाज किया था. 10 वर्ष बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर बुलंदशहर से चुनावी अभियान का आगाज करके पश्चिमी यूपी में हिंदुत्व और विकास के मिले-जुले एजेंडे से भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की. 

हालांकि राजनैतिक विश्लेषक इस बार पश्चिमी यूपी के माहौल को भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं. मेरठ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर रमेश बालियान बताते हैं, ''2014 के लोकसभा चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर दंगे से जाट-मुस्लिम एक दूसरे के विरोधी हो गए थे. जाट समाज का एकतरफा वोट भाजपा को मिला था. 10 वर्ष बाद हालात बदले हैं. पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन के बाद से जाट समाज का एक तबका भाजपा के विरोध में है. इसे मुस्लिम मतदाता के साथ जुड़ने में कोई गुरेज नहीं है. 2022 के विधानसभा चुनाव में जाट और मुस्लिम मतदाताओं के बदले रुख के चलते ही भाजपा को पश्चिमी यूपी में नुकसान उठाना पड़ा था.''

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की आधी सीटों पर चुनाव हारना भाजपा को सबसे ज्यादा खटक रहा है. इसलिए भगवा खेमे ने गंगा-यमुना दोआब वाले इस इलाके में सबसे ज्यादा फोकस किया है. किसान आंदोलन से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे इस इलाके का मिजाज भांपने की कवायद पिछले साल 7 जून को दिखी जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने नोएडा में कार्यकर्ताओं के साथ टिफिन बैठक की. हालांकि 2022 के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा ने रामपुर सीट जीतकर पश्चिमी यूपी में हारी सीटों की गणना में एक की कमी की. वर्ष 2024 के संसदीय चुनाव में पश्चिमी यूपी में हारी गई छह सीटों पर ''लोकसभा प्रवास योजना'' के जरिए भाजपा दोबारा कमल खिलाने के जुगत में लगी है.

भाजपा ने एक वर्ष पहले राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल को यूपी में हारी हुई लोकसभा सीटों का प्रभारी बनाया था. इन सीटों की जिम्मेदारी एक-एक केंद्रीय मंत्री को सौंपकर संवाद और संपर्क के जरिए जनसमर्थन जुटाया जा रहा है. इसके अलावा इन हारी हुई सीटों पर राज्यसभा सांसदों को ''विकसित भारत संकल्प यात्रा'' की जिम्मेदारी सौंपकर विभिन्न अभियानों के जरिए जनता से निरंतर 'कनेक्ट' रहने की रणनीति भी है. विकसित भारत संकल्प यात्रा के प्रदेश संयोजक और प्रदेश भाजपा के पश्चिमी यूपी प्रभारी सुभाष यदुवंश बताते हैं ,''यात्रा में विधान परिषद सदस्यों को भी लगाया गया है. सक्रिय कार्यकर्ताओं के जरिए जनता के बीच जाकर केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर जनसमर्थन जुटाया जा रहा है.''

पश्चिमी यूपी में जातिगत समीकरण साधना भाजपा के लिए चुनौती पूर्ण है. वर्ष 2022 के चुनाव के बाद यूपी विधानसभा में जाट विधायकों की संख्या बढ़ने के बावजूद इसमें भाजपा की हिस्सेदारी घट गई है. जाट समुदाय को साधने के लिए भाजपा ने विधानसभा चुनाव के करीब छह महीने के बाद 25 अगस्त, 2022 को पिछले 31 वर्ष से संगठन और सरकार में किसी न किसी प्रकार की भूमिका में रहने वाले भूपेंद्र चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. यह पहली बार था जब भाजपा ने यूपी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी किसी जाट नेता को सौंपी थी. लक्ष्य साफ था कि पश्चिमी यूपी में दरकते जाट वोट बैंक को मजबूती के साथ खड़ा करना. हालां‍कि खतौली विधानसभा उपचुनाव और नगरीय निकाय चुनाव में जाट बाहुल्य सीटों पर भाजपा के कमजोर प्रदर्शन ने पार्टी की चिंता को बरकरार रखा है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव दोहरी चुनौती लेकर आएगा. 

दलित मुस्लि‍म गठजोड़ की रणनीति के जरिए अपने लिए संभावनाएं टटोल रही कांग्रेस ने सुदूर पश्चिमी यूपी के जिले सहारनपुर से 20 दिसंबर को 'यूपी जोड़ो यात्रा' की शुरुआत की. लेकिन पश्चिमी यूपी में कांग्रेस की सभी संभावनाओं में सबसे बड़ी बाधा कमजोर संगठन है. इसलिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और यूपी कांग्रेस के प्रभारी अविनाश पांडेय ने 11 जनवरी को मेरठ जिले से 'कांग्रेस संवाद कार्यशाला' की शुरुआत की. मेरठ के प्यारेलाल शर्मा स्मारक पार्क में आयोजित संवाद कार्यशाला में पांडेय ने पश्चिमी यूपी के 14 जिलों के कार्यकर्ताओं से मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया. इसके साथ ही संगठन के स्तर पर भी कांग्रेस ने मुसलमानों के बीच भी पैठ बनाने की कोशिशें तेज की हैं. यूपी कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष शाहनवाज आलम बताते हैं ''अल्पसंख्यक विभाग के 'आपकी पार्टी आपके गांव' अभियान को पश्चिमी यूपी के मुस्लिाम बाहुल्य इलाकों में बहुत अच्छा समर्थन मिला है.'' सहारनपुर के नेता इमरान मसूद को शामिल कर और अमरोहा से बसपा सांसद दानिश अली को साथ जोड़कर कांग्रेस ने पश्चिमी यूपी के मुसलमानों को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है. 

पश्चिमी यूपी में 'यूपी जोड़ो यात्रा' निकालते प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय

लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) का भी पश्चिमी यूपी के मुस्लि‍म समाज पर फोकस है. पिछले वर्ष विपक्षी गठबंधन इंडिया की समन्वय एवं रणनीतिक समिति में यूपी से सबसे चौंकाने वाला नाम सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान का था. राजनैतिक रूप से भी जावेद का नाम सपा की बदलती रणनीति की ओर इशारा करता है क्योंकि अभी तक सपा में मुस्लिम चेहरे के रूप में आजम खान को ही आगे रखा जाता रहा है. जावेद अली खान की पहचान सपा के गैर विवादित और साफ सुथरी छवि वाले नेताओं में होती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा-रालोद ने पश्चिमी यूपी की आधी सात सीटों पर कब्जा जमाया था. अब यूपी में इंडिया गठबंधन की अगुआ पार्टी के रूप में सपा को अपने सहयोगी दलों के साथ पुराने प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती है. इसके लिए खासकर पिछड़ी जातियों को साइकिल के पक्ष में लामबंद करने के लिए सपा पीडीए यात्रा का सहारा ले रही है. पश्चिमी यूपी में इंडिया गठबंधन का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रालोद प्रमुख जयंत चौधरी से सात सीटों पर गठबंधन किया है. इसके अलावा सपा की ऑफर की गई 11 लोकसभा सीटों से इत्तेफाक न रखकर कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन का तापमान बढ़ा दिया है.

उधर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने के निर्णय ने यूपी में 2014 जैसे चुनावी हालात पैदा कर‍ दिए हैं जब बहुकोणीय लड़ाई में भाजपा ने पश्चिमी यूपी की सभी 14 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमा लिया था.

आसान नहीं पश्चिमी यूपी की राह

  • पश्चिमी यूपी में कुल 14 (रामपुर, मुरादाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बिजनौर, सहारनपुर, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, कैराना, नगीना, संभल, मेरठ, बागपत, अमरोहा और बुलंदशहर) लोकसभा सीटें और 70 विधानसभा सीटें हैं 
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सात (गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बुलंदशहर और कैराना) लोकसभा सीटें जीती थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी यूपी की सभी 14 सीटें जीती थीं 
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने बिजनौर, सहारनपुर, अमरोहा और नगीना लोकसभा सीटें और सपा ने संभल, मुरादाबाद और रामपुर लोकसभा सीटें जीती थीं. 2022 के उपचुनाव में रामपुर लोकसभा सीट भाजपा ने जीत ली थी 
  • 2019 का लोकसभा चुनाव सपा ने बसपा और रालोद के साथ गठबंधन करके लड़ा था. रालोद को बागपत और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा 
  • 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी यूपी की कुल 71 सीटों में से 41 पर जीत हासिल की थी. जबकि सपा ने 22 और रालोद ने आठ सीटें जीती थीं. कांग्रेस और बसपा का खाता नहीं खुला
  • 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार 17 जाट विधायक चुने गए. इनमें 10 भाजपा और सात सपा-रालोद के थे. जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 14 जाट विधायक चुने गए थे और इनमें 13 भाजपा और एक आरएलडी का था
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