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प्रधान संपादक की कलम से

दो साल पहले तक गैर-कांग्रेसी पार्टियां यूपीए और एनडीए दोनों गठबंधनों से समान दूरी बनाकर 'तीसरा मोर्चा' कायम करने की कोशिश में लगी थीं.

गिरता पड़ता गठबंधन
गिरता पड़ता गठबंधन
अपडेटेड 12 फ़रवरी , 2024

- अरुण पुरी

ताकतवर लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष उतना ही जरूरी है, जितना सत्तारूढ़ दल का स्थिर बहुमत. मई 2024 में आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा अजेय लग रही है, लेकिन 2023 के मध्य में विपक्ष ने खासी एकजुटता कायम कर ली थी और 27 सहमना पार्टियों का काफी दमदार गठबंधन बना लिया था.

यह 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस' या भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठजोड़ अपने संक्षिप्त नाम 'इंडिया' से बेहतर जाना जाता है. उसने भाजपा के लिए कड़ी चुनौती पेश करने का दमखम दिखाया था लेकिन ताजा घटनाक्रम बताते हैं कि उसके घटक दलों में ही सामंजस्य नहीं बैठ रहा.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अपने राज में किसी तरह की साझेदारी से इनकार कर रही थीं. वहीं 'इंडिया' के सूत्रधार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही राहें जुदा कर लीं. 'इंडिया' जो कांग्रेस को केंद्रीय मंच पर लाने का वाहन बना था, नीतीश के यू-टर्न ने उसमें नया मोड़ ला दिया. 

कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के लस्त-पस्त रिश्ते ही 'इंडिया' की बुलंद शुरुआत और अब उस ढलान की दास्तान है, जिससे वह वाबस्ता है. दो साल पहले तक गैर-कांग्रेसी पार्टियां यूपीए और एनडीए दोनों गठबंधनों से समान दूरी बनाकर 'तीसरा मोर्चा' कायम करने की कोशिश में लगी थीं.

नीतीश ने ही सबको कांग्रेस को अहमियत देने को राजी किया. लेकिन कुछ साझेदार हमेशा दूसरों से कम 'सहमना' थे और सिर्फ भाजपा को सत्ता से हटाने की ख्वाहिश के लिए साथ आए थे. कुछ तो एक ही इलाके में मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं.

जब कांग्रेस ने दक्षिण में दोबारा जी उठने और उत्तर में उन तबकों को अपनी ओर खींचने का दमखम दिखाया, जिन्हें विधानसभा चुनावों में गंवा बैठी थी, तो जाहिर है कि इससे 'इंडिया' के सहयोगी सकते में आ गए. 

अब बड़ा सवाल यह है कि 'इंडिया' राज्यों में कैसे एक घाट उतरेगा? एक कहावत या कहिए पहेली है कि बाघ, बकरी और घास एक ही नाव पर सवार होकर कैसे सकुशल पार उतर सकते हैं? उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी कांग्रेस को कुल 80 में से सिर्फ 11 सीटों की पेशकश कर रही है.

कागज पर तो अब बिहार में अधिक सीटें खुल गई हैं. पहले जद (यू) और राजद कुल 40 सीटों में से तकरीबन 17-17 सीटें अपने लिए रखकर बाकी छह सहयोगियों के लिए छोड़ रहे थे. लेकिन नीतीश के पाला बदलने से सिर्फ मनोबल ही बुरी तरह नहीं टूटा, बल्कि समीकरण भी बदल गए हैं.

भाजपा की अपेक्षित राम लहर में नीतीश के पाले के अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के वोट जोड़ दें, और फिर महिला वोट को लुभाने में तो दोनों ही जुटे हैं. इसके विपरीत, राजद तमाम सहानुभूति और इस गठजोड़ के खिलाफ गोलबंदी का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहेगा.

इन हालात में वह मरणासन्न कांग्रेस के प्रति बहुत उदारता शायद न दिखा पाए. झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद अनिश्चितता का माहौल है. ममता राज्य की सभी 42 सीटों पर अपना दबदबा बनाए रखने में जुटी हैं.

उन्होंने शिष्टाचार की सिर्फ एक पतली-सी संभावना खुली रखी है, जो इस पर निर्भर है कि स्थिति कैसी बनती है. फिलहाल तो यही लगता है कि उनकी टीएमसी बंगाल में 'इंडिया' का हिस्सा नहीं रहेगी. 

दक्षिण में ही विपक्षी ब्लॉक को कुल 130 में से 62 सीटों के अपने आंकड़े को पार कर पाने की उम्मीद है, जो यूपीए ने 2019 के आम चुनाव में जीती थीं. यह उम्मीद कर्नाटक और तेलंगाना के राज्य चुनावों में कांग्रेस में आई नई जान पर टिकी है.

कर्नाटक में 2019 में भाजपा ने कुल 28 में से 25 सीटें जीत ली थी. सिर्फ एक सीट जीतने वाली कांग्रेस को उम्मीद है कि उसका भाग्य कुछ तो पलटेगा. इसी तरह, तेलंगाना में 2019 में कांग्रेस को कुल 17 में से सिर्फ तीन सीटें मिलीं जबकि टीआरएस को नौ और भाजपा को चार सीटें मिली थीं.

हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बीआरएस (टीआरएस का नया नाम) को हरा दिया, जिससे उसे आम चुनाव में बड़े फायदे की उम्मीद है. भाजपा यूं तो तेलंगाना में हाशिए की खिलाड़ी है, लेकिन बीआरएस के साथ मिलकर जोर लगा सकती है.

तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व में भाजपा विरोधी मोर्चा अपनी स्थिति मजबूत बनाए रख सकता है. उसने पिछली बार कुल 39 में से 38 सीटें जीत ली थी. केरल की 20 सीटें भी काफी हद तक 'इंडिया' की ओर जाएंगी, लेकिन वामपंथियों और कांग्रेस के बीच तीखी दोस्ताना लड़ाई भी देखने को मिलेगी. 

महाराष्ट्र में दिशासूचक अजीब चकरघिन्नी खा रहा है. वहां की कुल 48 सीटें भाजपा के लिए 'इंडिया' का आखिरी बड़ा मोर्चा हैं. कई मायनों में इस मोर्चे में पहले ही सेंध लगाई जा चुकी है. उसके दो प्रमुख घटक—शिवसेना और एनसीपी से टूटे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट भाजपा के साथ हैं.

इसलिए इन पार्टियों के मूल पेटेंट वाले उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपने सियासी वजूद को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. पहले ही सुलग रहे सियासी मामले में अब शिंदे के मराठों को ओबीसी आरक्षण देने से तेज उबाल आ गया है. नतीजतन, अब कोई नहीं जानता कि सियासी चौसर में कौन-सा प्यादा क्या चाल चल रहा है.

इसी अराजक नजारे के बीच मार्च में राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा (बीजेएनवाई) महाराष्ट्र में प्रवेश करेगी. शुरुआती चरण में ही बीजेएनवाई का कारवां बंगाल और बिहार की धधकती जमीन पर पहुंच चुका है. शायद उसका आगमन ही जमीन धधका रहा है.

पहले ही दबाव में क्षेत्रीय नेता कड़ी मेहनत से हासिल की गई अपनी जमीन साझा करने से कतरा रहे हैं. जब राहुल 'मोहब्बत की दुकान' खोलने की बातें करते हैं तो कोई उनकी नीयत पर संदेह नहीं करता, लेकिन मसलन, बिहार में अंतिम स्कोरकार्ड कांग्रेस के लिए 40-लव के टेनिस स्कोर जैसा हो सकता है. और 'एडवांटेज भाजपा' ही हर कहीं दिखता है.

इस हफ्ते की आवरण कथा में एग्जीक्यूटिव एडिटर कौशिक डेका इस दास्तान की परतें खोल रहे हैं. 'इंडिया' के खंडित सियासी नक्शे की पूरी तस्वीर खुलती है, पटना में सीनियर एडिटर अमिताभ श्रीवास्तव के लगभग अविश्वसनीय-सी घटनाओं के इनपुट से; कोलकाता में ममता के साथ बातचीत टूटने की कड़वाहट के विशेष संवाददाता अर्कमय दत्ता मजूमदार के वृतांत से.

फिर, सीनियर एसोसिएट एडिटर धवल एस. कुलकर्णी ने महाराष्ट्र में तेजी से बदलते परिदृश्य को कैद किया; और सीनियर डिप्टी एडिटर अमरनाथ के. मेनन ने दक्षिण की कई सियासी अंडरकरेंट को भांपने की कोशिश की है. डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन भाजपा की रणनीति पर एक झलक डालते हैं कि कैसे उसने 'इंडिया' को हर चाल पर शह दी.

'इंडिया' की बुनियादी समस्या यह है कि उसके पास भाजपा विरोध, खासकर प्रधानमंत्री मोदी विरोध के अलावा मतदाताओं के लिए कोई दिलचस्प नैरेटिव नहीं है. इसके अलावा, उसके पास प्रोजेक्ट करने के लिए कोई राष्ट्रीय नेता भी नहीं है. ऐसा लगता है कि विपक्ष के लिए खुद को दलदल से बाहर निकालना एवरेस्ट लांघना सरीखा काम है, दूसरी तरफ भाजपा की चुनौती भी इस पहाड़ से कम नहीं.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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