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प्रधान संपादक की कलम से

अब जब आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं, निस्संदेह यह मानकर चला जा सकता है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत के साथ तीसरे कार्यकाल के लिए मोदी और भाजपा के अभियान को बड़ी ताकत मिलेगी. प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष को गफलत में डाल दिया था

इंडिया टुडे: आई हिंदू पुनरुत्थान की वेला
इंडिया टुडे: आई हिंदू पुनरुत्थान की वेला
अपडेटेड 5 फ़रवरी , 2024

- अरुण पुरी

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी को अयोध्या में भव्य नए मंदिर में बालक राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान संपन्न किया, भारत के उथल-पुथल भरे इतिहास का एक नया अध्याय शुरू हो गया. यह हमारे देश के लिए खास है जिसके इतिहास में युगांतरकारी और गहरी छाप छोड़ने वाली घटनाओं की शायद ही कमी रही है.

मगर नए मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा घटनाओं को मापने के हमारे सामान्य पैमाने से भी कहीं ऊपर है और इसके कई कारण हैं. वह जो तीन दशक से भी ज्यादा वक्त से राजनैतिक विवाद और एक सदी से भी ज्यादा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मन-मुटाव का कारण बना हुआ था, अब एक शानदार स्मारक में बदल गया है. हालांकि इतने भर से इसका पूरी तरह वर्णन नहीं हो पाता जितनी गहराई से यह घटना आधुनिक भारत की हकीकत को बदलने की कोशिश करती है. 

स्वतंत्र भारत के शुरुआती दिनों से ही ऐसे मौके आए जब राज्यसत्ता का धर्म से महामिलन हुआ. मसलन, देश के पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल की पहल पर सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था. तब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने जवाहरलाल नेहरू की आपत्तियों को अनदेखा करके नए मंदिर में शिवलिंग की अधिष्ठापना में हिस्सा लिया था. मगर प्रधानमंत्री होने के नाते मोदी कई कदम आगे चले गए और उन्होंने अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के यजमान या संरक्षक की भूमिका में अनुष्ठान संपन्न किए.

दुनिया भर में समारोह की लाइव स्ट्रीमिंग कर रहे मीडिया प्लेटफॉर्मों के बहुगुणक प्रभाव की असाधारण शक्ति के बूते इस घटना ने अभूतपूर्व आयाम ग्रहण कर लिए. सड़कों-चौराहों पर चारों तरफ इसी का बोलबाला था, यह लाखों घरों में भी पैठ गया, जहां श्रद्धालुओं ने भी पूजा-पाठ किया. कुछ लोग संवैधानिक पदाधिकारी होने के नाते प्रधानमंत्री के धार्मिक आयोजन में सर्वेसर्वा बनने के औचित्य पर सवाल उठाते रहेंगे. मगर हमने देखा यह कि देश भर में लोगों के बड़े हिस्से ने खुद इसमें भागीदारी करके उस पर उत्साहजनक सम्मति दे दी. यह राजनीति और धर्म ही नहीं, बल्कि जनसंस्कृति तक जाने वाला पुल है.

इस तरह मोदी की अगुआई में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ऐसी अनूठी सफलता हासिल की, जो उसके होने के उद्देश्य मात्र से गूंजती है. उसने अपना एक 'अधूरा एजेंडा' पूरा कर दिया, जो 1989 से ही पार्टी की थीम रहा है, जब उसने राम मंदिर को अपने हेतु के रूप में उठाने का औपचारिक फैसला किया था. ऐसा करके उसने संस्कृति और आस्था के क्षेत्र को कामयाबी के साथ राज्यसत्ता के बीचोबीच रख दिया है. ठीक वही बात जो उसके आलोचकों को बेचैन कर देती है, भाजपा के लिए सोने का मुलम्मा चढ़ी तश्तरी है.

भाजपा के राजनैतिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की लंबे समय से यह दलील रही है कि भारत सांस्कृतिक लोकाचार में अपने को बांधे बिना आगे नहीं बढ़ सकता. संघ ने हिंदुत्व को स्थापित करने की अपनी तलाश भारत की हिंदू पहचान को आध्यात्मिकता आधारित परंपराओं की निरंतरता और समावेशिता तथा भारत की मूल्य व्यवस्था की समूची संपदा के आधार पर पुनर्जीवित करने के रूप में परिभाषित की थी. उसने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण, जम्मू-कश्मीर को विशिष्ट स्वायत्तता का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के समापन और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की स्थापना को हिंदुत्व की नींव के तीन पत्थरों के तौर पर देखा जिन्हें अंतत: प्रभावी होना होगा.

मोदी इतिहास में ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में दर्ज किए जाएंगे जिन्होंने न केवल संघ परिवार के दो बड़े लक्ष्य—राम मंदिर और अनुच्छेद 370 का समापन—पूरा करना पक्का किया, बल्कि मुसलमानों में तलाक के आधार के तौर पर तीन तलाक पर पाबंदी लगाने का कानून पारित करके यूसीसी की स्थापना के लक्ष्य को भी आगे बढ़ाया. उन्होंने यह भी पक्का किया कि ये फैसले कानूनी रास्ते से हों और सुप्रीम कोर्ट की मोहर लगी हो.

लेकिन हिंदू पहचान के विजयी दावे के बजाय, प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में दिए गए अपने भाषण में मोदी राजनेता की तरह दिखाई दिए, जब उन्होंने कहा, "यह न केवल उत्सव का क्षण है बल्कि भारतीय समाज की परिपक्वता के एहसास का क्षण भी है. केवल विजय का क्षण नहीं, बल्कि विनय का भी है." उन्होंने इस मौके को विकसित भारत सरीखे राजकाज के आदर्शों से भी यह कहकर जोड़ा, "यह भव्य राम मंदिर भव्य भारत, विकसित भारत के उदय का गवाह बनेगा. यह भारत का समय है और भारत आगे बढ़ रहा है."

प्राण प्रतिष्ठा समारोह में और समारोह के बाद धन्यवाद-ज्ञापन भाषणों के समय मंच पर भगवाधारी संतों के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी चीजों को महज सरकारी भागीदारी से कहीं आगे ले गई. इससे इस अवसर को विचारधारात्मक-सांस्कृतिक वजन मिला. भागवत ने राम राज्य की अवधारणा को विस्तार से रखा—उन्होंने इसे ऐसा जनसमर्थक और लोकतांत्रिक सिद्धांत तथा विश्वास बताया जिसमें हर राय, संवाद, परस्पर सम्मान और सुशासन के लिए जगह है.

इसलिए हिंदू राष्ट्र का जो विचार उन्होंने सामने रखा, वह केवल और केवल 'हिंदू' नहीं है, बल्कि उसमें बातचीत की उदार संस्कृति है, जिसे उन्होंने भारत की आत्मा बताया. व्यवहार में ऐसा आदर्श साकार हो पाता है या नहीं, भारत इसका इंतजार करेगा. ये सारे घटनाक्रम विराट हिंदू पुनरुत्थान के प्रतीक हैं, जिसका इस पर गहरा असर पड़ेगा कि भारत राष्ट्र के रूप में कैसे आगे बढ़ता है.

अब जब आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं, निस्संदेह यह मानकर चला जा सकता है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत के साथ तीसरे कार्यकाल के लिए मोदी और भाजपा के अभियान को बड़ी ताकत मिलेगी. प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष को गफलत में डाल दिया था—अगर वे आमंत्रण को ठुकराते तो हिंदू-विरोधी करार दिए जाने का जोखिम उठाते; अगर हिस्सा लेते तो विभाजनकारी और भावनात्मक मुद्दे को खत्म करने का श्रेय भाजपा और आरएसएस को देते देखे जाते. कांग्रेस ने समारोह का बहिष्कार करना चुना और मोदी पर इसे राजनैतिक आयोजन में तब्दील करने का आरोप लगाया.

राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर डटे रहे, उस दिन उन्होंने असम के सबसे पवित्र स्थल बटद्रवा थान जाने को तरजीह दी—हालांकि उन्हें रोक दिया गया. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कुछ दिन पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पुनर्विकास का उद्घाटन करके मोदी के मास्टरस्ट्रोक के समानांतर अपने मास्टरस्ट्रोक को अंजाम दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने तीर्थ केंद्र के रूप में अयोध्या का कायाकल्प शुरू कर दिया, जिसे हिंदू धर्म का 'नया वेटिकन' कहा जा रहा है. कुछेक छिटपुट सांप्रदायिक घटनाओं को छोड़ दें तो यह आयोजन शांतिपूर्वक गुजर गया.

इस विशेष अंक में हम आपके लिए इस आयोजन का और इसकी कई पहलुओं वाली अनुगूंजों और नतीजों का विशद कवरेज लेकर आए हैं, जिसमें इस बड़े सवाल का जवाब भी शामिल है—"क्या भव्य हिंदू पुनरुत्थान भारत को बदलेगा और राम राज्य की तरफ ले जाएगा?" हमारे महाकाव्य हमसे जो चाहते थे, उस तक पहुंचने की इसे हमारी विनम्र पेशकश समझिए.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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