लखनऊ के मॉल एवेन्यू इलाके में 400 मीटर के फासले पर मौजूद यूपी कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रदेश कार्यालयों के भावी संबंधों पर 15 जनवरी को सबकी नजर थी. मौका बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के 68वें जन्मदिन का था. हर बार की तरह 'बहन जी' मीडिया से मुखातिब थीं.
हल्का गुलाबी सूट पहने मायावती अपने चिरपरिचित अंदाज में पार्टी दफ्तर में दाखिल हुईं. जैसे ही बसपा सुप्रीमो ने साथ में लाए कागजों को पढ़ना शुरू किया, यूपी में बसपा के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की संभावना धूमिल होती चली गई. मायावती ने 1993 में सपा और 1996 में कांग्रेस से किए गए गठबंधनों का जिक्र करते हुए कहा कि इससे बसपा को फायदा कम, नुकसान ज्यादा हुआ है.
बसपा अध्यक्ष का तर्क था कि अकेले चुनाव लड़ने पर 2007 में बसपा ने बहुमत की सरकार बनाई थी. उन्होंने कहा, "बसपा लोकसभा चुनाव गरीब, अति पिछड़े और उपेक्षित लोगों के बूते अकेले ही लड़ेगी और केंद्र की सत्ता में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करेगी."
जन्मदिन पर कार्यकर्ताओं को करीब आधा घंटे के संदेश में मायावती ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी फिलहाल इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं होने जा रही. बसपा के विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की अटकलें उस वक्त तेज हो गई थीं जब यूपी कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी अविनाश पांडेय ने 7 जनवरी को अपने लखनऊ प्रवास के दौरान बसपा को साथ लेने की पुरजोर वकालत की थी. मायावती ने भाजपा के साथ कांग्रेस को भी जातिवादी, पूंजीवादी, सामंतवादी और सांप्रदायिक बताकर देश की सबसे पुरानी पार्टी के साथ अपने रुख को स्पष्ट कर दिया. उनका संबोधन समाप्त होते ही यह तय हो गया कि लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी में त्रिकोणीय राजनैतिक संघर्ष का मैदान सजने जा रहा है.
असल में मायावती के सामने तीन विकल्प थे. पहला तो यह कि बसपा भाजपा विरोधी इंडिया गठबंधन का हिस्सा बने. यह स्थिति मायावती के लिए बहुत सहज नहीं थी. चूंकि सपा यूपी में इंडिया गठबंधन की अगुआ है इसलिए बसपा के समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में जाना पार्टी के जनाधार को और कम कर सकता था. इसके अलावा, केवल कांग्रेस से चुनावी तालमेल करने पर बसपा को कोई लाभ नहीं मिलता. इसलिए मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने के तीसरे विकल्प को चुना.
लखनऊ के बाबा साहेब आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर सुशील पांडेय बताते हैं, "पिछले कुछ चुनावों से जिस तरह बसपा का जनाधार घटा है और उसकी सीटें कम हुई हैं उससे मायावती काफी चिंतित हैं. इस कारण से मायावती ने किसी गठबंधन में उलझने की बजाय संगठन को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है. हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में सरकार का समर्थन करने का विकल्प खुला रखकर उन्होंने अपने कैडर में भी जोश भरने की कोशिश की है."
मायावती की सबसे बड़ी चिंता अपने उस वोट बैंक को लेकर है जो पिछले कुछ चुनावों से दूसरी पार्टियों के साथ जुड़ गया है. इसके चलते 2007 में अपने बूते पर सरकार बनाने वाली बसपा 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में महज एक सीट पर सिमट गई. हालांकि बसपा ने 12.9 प्रतिशत वोट हासिल किए और यूपी की तीसरी सबसे बड़ी राजनैतिक ताकत बनी रही. मायावती को सबसे ज्यादा नाराजगी सपा से है जिसके साथ मिलकर पार्टी ने 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था और 10 सीटें (सपा ने पांच) जीती थीं. 2019 के बाद जिस तरह सपा ने बसपा के वोट बैंक और नेताओं में सेंध लगाई है, उससे मायावती काफी खफा हैं.
इंडिया गठबंधन में बसपा को शामिल न करने को लेकर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बयान दिया और बाद में सपा कार्यकर्ताओं से बसपा प्रमुख का सम्मान करने की नसीहत दी थी. इस पर मायावती का कहना था, "सोची-समझी रणनीति के तहत बसपा के लोगों को गुमराह करने के लिए अखिलेश ने गिरगिट की तरह रंग बदला. इनसे सावधान रहें." अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जिस तरह से भगवा खेमे ने प्रतीकों के जरिए दलित मतदाताओं को साधने की कोशिश की है, उससे भी मायावती सतर्क हो गई हैं. इसलिए मायावती ने 22 जनवरी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का स्वागत तो किया लेकिन इसमें शामिल होने का निर्णय चालाकी से टाल दिया.
मायावती ने फिलहाल लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर फोकस किया है. पार्टी ने यूपी के हर कोऑर्डिनेटर से उनके संबंधित जिलों में संभावित उम्मीदवारों की सूची तलब की है. बसपा के 10 सांसदों में ज्यादातर पार्टी से अलग राह पकड़े दिखाई दे रहे हैं. अमरोहा से सांसद दानिश अली को कांग्रेस से नजदीकियों के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. जौनपुर से सांसद श्याम सिंह यादव कई मौकों पर भाजपा नेताओं की तारीफ कर चुके हैं. बिजनौर से सांसद मलूक नागर पिछले वर्ष भाजपा सरकार के बजट की तारीफ कर चर्चा में आए थे तो श्रावस्ती के सांसद रामशिरोमणि वर्मा की भी अपना दल और भाजपा से नजदीकियों की चर्चा है. लालगंज सांसद संगीता आजाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर चर्चा बटोर चुकी हैं.
गाजीपुर से सांसद अफजाल अंसारी और आंबेडकर नगर के सांसद रितेश पांडेय समय-समय पर सपा से करीबी दिखा चुके हैं. मायावती अब अपने मौजूदा सांसदों की जगह नए उम्मीदवारों की तलाश में जुटी हैं. इसी क्रम में बसपा ने सहारनपुर से मौजूदा सांसद हाजी फजलुर्रहमान बर्क को नजरअंदाज करते हुए इस सीट पर माजिद अली को लोकसभा प्रभारी घोषित किया है. भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने के साथ मायावती ने खुद को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का प्रभारी बनाए रखा.
अब मायावती लोकसभा चुनाव से पहले पूरे यूपी का दौरा करने की योजना को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं. बसपा के लगातार गिरते ग्राफ को संभालकर मायावती इसे किस तरह ऊपर उठा पाएंगी? यह लोकसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे.
हाथी न उठा पाया समझौते का बोझ
1991: बसपा के संस्थापक कांशीराम ने 1991 में मुलायम सिंह यादव के सहयोग से इटावा लोकसभा सीट पर एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. इसके बाद कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच नजदीकियां बढ़ी थीं.
1993: बसपा और सपा ने 1993 का विधानसभा चुनाव गठबंधन करके लड़ा. सपा ने 256 और बसपा ने 164 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. गठबंधन के 176 उम्मीदवार ( सपा -109, बसपा-67) जीते और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार बनी.
1995: मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने से गुस्साए सपा कार्यकर्ताओं ने 2 जून, 1995 को लखनऊ के मीराबाई गेस्ट हाउस में मायावती पर हमला किया. भाजपा ने समर्थन देकर मायावती के नेतृत्व में सरकार बनवाई. 17 अक्टूबर, 1995 को मायावती सरकार गिर गई.
1996: बसपा ने 1996 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस से गठबंधन करके लड़ा. बसपा ने 296 और कांग्रेस ने 126 सीटों पर चुनाव लड़ा. बसपा ने 67 और कांग्रेस ने 33 सीटें जीतीं. चुनाव बाद बसपा ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया.
1997: मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर एक बार फिर सरकार बना ली. लेकिन लेकिन छह महीने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. भाजपा ने बसपा के विधायकों को तोड़कर अपने साथ मिला लिया और फिर सरकार बनाई.
2002: इस साल विधानसभा चुनाव के बाद बसपा और भाजपा ने एक बार फिर मिलकर सरकार बनाई. मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. वर्ष 2003 में भाजपा से नाराजगी के चलते मायावती ने इस्तीफा दे दिया और सरकार गिर गई.
2019: सपा और बसपा ने पुरानी अदावत भुलाकर 2019 का लोकसभा चुनाव गठबंधन करके लड़ा. बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. बसपा ने 10 और सपा ने पांच सीटें जीतीं. चुनाव के बाद मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ लिया.

