- अरुण पुरी
बुरी खबरें अक्सर वायरल हो जाती हैं, जबकि अच्छी खबरें नकारात्मक घटनाक्रमों के घटाटोप में दफ्न हो जाती हैं. इसलिए 2016 में इंडिया टुडे में हमने हर साल दिल को खुशियों से भर देने वाले घटनाक्रमों को समर्पित एक पूरा अंक लाकर मायूसी के इस दबदबे को तोड़ने का फैसला किया. इस साल यह हमारे गणतंत्र दिवस के विशेष अंक में करीने से गुंथा है. हमने आपको उन सकारात्मक और प्रेरक व्यक्तियों और संस्थाओं का एक कोलाज देने का फैसला किया, जिन्होंने अपने काम से अच्छी खुशियां बिखेरी हैं. मगर आगे के पन्नों में आपको जो मिलेगा, वे बाहरी दुनिया से कटे हुए हर्ष और आनंद के द्वीप नहीं हैं, न ही कोई अपवाद. ये कहानियां भारतीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सामान्य होती जा रही अच्छी स्थितियों की ओर इंगित करती हैं.
हमने जिन क्षेत्रों को छुआ है, कह सकते हैं वे संक्रामक प्रभाव वाले हैं. मसलन, कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता को लीजिए, या पर्यावरण अनुकूल खेती, खानपान की संस्कृतियों में हो रही प्रगति, ग्रामीण भारत के पसीना बहाते कामगार तबकों की ओर टेक्नोलॉजी का प्रवाह, या खेल, कला, मीडिया और मनोरंजन में मानव क्षमता का निर्माण. इन पर अभी काम चल रहा हो सकता है, पर वे कई गुना वृद्धि की संभावनाएं समेटे हैं. खुशी की भी अपनी एक प्रोसेस है.
जेंडर को लीजिए. जब हम महिलाओं के सामने मौजूद असमानताओं के बारे में सोचते हैं, हमारा ध्यान सहज ही समाज के उन हिस्सों की ओर जाता है जो अब भी दकियानूसी रीति-रिवाजों में डूबे हैं—खासकर दूरदराज इलाकों में. दूसरी तरफ कॉर्पोरेट इंडिया और शहरी कामकाजी जगहों को देखिए जहां महिलाओं की वृद्धि में बेड़ियां डालने वाले पक्षपात की जिद्दी जड़ें जमाए बैठी परतें दिखेंगी. खुशी की बात है कि यह बदलने लगा है.
हमारी एक रिपोर्ट बताती है कि किस तरह कई भारतीय कंपनियां अपने कार्यस्थलों पर विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं. ये पथप्रदर्शक कंपनियां पैरों में बेड़ियां डालने वाले ढांचों को तोड़ रही हैं और भारतीय कंपनियों को महिलाओं/ट्रांसजेंडरों के ज्यादा अनुकूल बना रही हैं. जोमैटो में सात में से चार डायरेक्टर महिलाएं हैं. डेलॉइट में कुल 38 फीसद की विविधता दर लेकिन शीर्ष पर सिर्फ 16 फीसद महिलाएं. उसने 'ठीक यहीं बदलाव लाने' के लिए इनक्यूबेशन कार्यक्रम लागू किया.
एचसीएल टेक्नोलॉजीज और एक्सिस बैंक सरीखी दूसरी कंपनियां महिलाओं को व्यवस्थित ढंग से बोर्ड के पदों के लिए तैयार कर रही हैं. एक्सिस के डीईआई प्रमुख हरीश अय्यर कहते हैं, "महिलाओं को उनकी जिंदगी के चरण के आधार पर रूढ़िबद्ध करने के बजाय उन्हें हुनर और महत्वाकांक्षा के चश्मे से देखना बहुत जरूरी है." भारत में एनएसई में सूचीबद्ध तमाम कंपनियों में महिलाएं अब बोर्ड के 20 फीसद पदों पर हैं—एक दशक पहले के 5 फीसद से खासी ज्यादा.
फिर वे हैं जो 'खेत से खाने' तक नए-नवेले काम कर रहे हैं और हमें खानपान के टिकाऊ भविष्य की तरफ ले जा रहे हैं. यहां विचार फलते-फूलते क्षेत्र बनाने का है. मिनती साबत ने महिलाओं का जो 16 सदस्यीय स्वयंसहायता समूह शुरू किया, उसे देखिए. केंद्र का मिलेट मिशन और ओडिशा सरकार का मिशन शक्ति मिलकर इस 46 वर्षीया गृहिणी के भीतर छिपे आंत्रप्रेन्योर को बाहर ले आए. भुवनेश्वर के कलिंग स्टेडियम में महज एक साल पहले स्थापित 'मिलेट शक्ति आउटलेट' 32 प्रकार की मिलेट आधारित पकी और साबुत चीजें बेचता है और इसका औसत मासिक टर्नओवर 5-6 लाख रुपए है, जिससे हरेक सदस्य को शुद्ध 15,000-20,000 रुपए मिल जाते हैं.
वह भी उन देसज फसलों को लोकप्रिय बनाने में मदद करते हुए, जो हमारे भविष्य को पोषित करेंगी. ऐसे ही उद्देश्य से लेकिन ज्यादा लंबे-चौड़े पदचिह्नों वाली एक कोशिश गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की अगुआई में चल रही है. उन्होंने गोबर और केंचुओं से बिना लागत का उर्वरक जीवामृत विकसित किया, जिसे कच्छ से नवसारी और सौराष्ट्र तक हर तरह के भूभागों और मौसमी परिस्थितियों वाले 7,52,000 एकड़ खेतों ने अपनाया है. यह प्रयोग राज्य के 9,00,000 किसानों की जिंदगी बदल रहा है.
भोजन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बिहार की 'दीदी की रसोई' ने दूसरे ढंग से राह दिखाई. यह राज्य के विभिन्न अस्पतालों में 18,500 से ज्यादा मरीजों को स्वस्थ खाना पहुंचाते हुए हर महीने 1,700 से ज्यादा महिलाओं को आजीविका दे रही है. उनके 117 रसोईघरों ने 2018 में शुरुआत के बाद से 57.4 करोड़ रुपए का टर्नओवर हासिल किया. उनकी ऐसी ही एक रसोई की यात्रा आपको सुख की मर्मस्पर्शी भावना से भर देगी: भुने हुए चिकन की महक, मशरूम और दाल की खुशबू, दर्जन भर महिला रसोइयों के बीच खुशगवार मेहनत की भनक. एक और उल्लेखनीय पहल अहमदाबाद का कांकरिया लेक फूड हब है, जो भारत भर में ऐसे 100 इलाकों की स्थापना का मॉडल बन गया है.
उनकी खासियत है सुरक्षित, मिलावटरहित और स्वस्थ स्ट्रीट फूड. यहां आपको चटपटे मसालेदार व्यंजनों के प्रति भारत का सार्वभौम लगाव सेहत के आम खतरों से मुक्त मिलता है. कांकरिया के 60 प्रशिक्षित स्ट्रीट फूड विक्रेता लजीज व्यंजन परोसते हैं: पावभाजी, आइसक्रीम, समोसा, ढोकला, पानीपूरी, भेलपूरी और दाबेली. ग्राहकों की तादाद हर साल 1.2 करोड़ तक पहुंच जाती है. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण जब ईट राइट इंडिया आंदोलन के तहत खानों की साज-संभाल करने वालों के प्रशिक्षण, स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट और प्रमाणन में निवेश कर रहा है, ऐसे परिदृश्य की कल्पना करें जहां यह सौ गुना बढ़ जाएगा. इसका असर शायद उन 20 लाख विक्रेताओं पर पड़े जो भारत के स्ट्रीट फूड बाजार का निर्माण करते हैं.
खुशी संक्रामक होती है. ऐसी ही 20 कहानियों का हमारा यह संग्रह पढ़िए. मध्य प्रदेश के एक गांव में 'मिनी ब्राजील' से लेकर बिहार के पश्चिम चंपारण में एक स्टार्ट-अप जोन तक जहां 59 प्रवासी कामगार उद्यमी बन गए हैं, महाराष्ट्र के सतारा में आर्चरी एकेडमी के साथ लक्ष्य के बीचो-बीच निशाना साधते एक पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन से लेकर छत्तीसगढ़ में 4,000 की आबादी वाले उस गांव तक जहां हर घर में एक यूट्यूबर है.
उनका कंटेंट खुशगवार है, यह भरोसा हम आपको दिलाते हैं. विडंबना है कि वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट 2023 में भारत 146 देशों में 126वें पायदान पर आया. मगर नमूना सर्वे खुद ही सीमित था और कुशलता का उसका माप पूरी तरह व्यक्तिपरक. चुपचाप किए जा रहे अच्छे कामों का अंबार विरले ही दिखाई देता है. इन्हीं की एक बानगी हमने प्रमुखता से सामने रखी है. हिंदुस्तानी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जितने खास ढंग से आनंद का सृजन करते हैं, दुनिया के पास उसकी माप-तौल के साधन ही नहीं. मौके के अनुरूप हम इसे 'खुशियों का गणतंत्र' कह रहे हैं. इसकी उद्देशिका ऐसे आदर्श अनुकरणीय लोग लिख रहे हैं जिन्होंने अपने कामों से पूरे भारत में खुशी और आनंद का संचार किया है.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

