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प्रधान संपादक की कलम से

एआई का इस्तेमाल फसल स्वास्थ्य के आकलन, बाढ़ की भविष्यवाणी, शिक्षा में क्रांति, स्टार्ट-अप अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने, मौजूदा उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि जैसे बहुत कुछ के लिए किया जा सकता है

एआई: वरदान या शाप
एआई: वरदान या शाप
अपडेटेड 20 जनवरी , 2024

- अरुण पुरी

वर्ष 2023 में बार-बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र सुना गया कि यह क्या कुछ आश्चर्यजनक कर सकता है और कैसे यह हमारी जिंदगी को बेहतर या बदतर बना देगा. लगभग 13 महीने पहले चैटजीपीटी जब इंसानियत के घाट पर उतरा, तबसे दुनिया पहले जैसी नहीं है. इसकी आगवानी पुरानी फंतासी की छननी सामने रखकर की गई, जो उत्तेजना और खौफ दोनों पैदा करती है.

कल्पना में ऐसी मशीन थी, जो पिकासो जैसी पेंटिंग, डिकेंस जैसा लेखन, बाख जैसी संगीत रचना कर सकती है, या पेनिसिलिन की खोज और डार्क मैटर जैसे खगोलीय रहस्यों को डिकोड कर सकती है, कास्पारोव से बेहतर शतरंज या कोड बनाने जैसे की तो पूछिए ही मत. यानी ईश्वर-जैसा अतिमानव या विचारशील भस्मासुर.

यह अतिरंजना है या कमतर कहना? इससे फर्क नहीं पड़ता. फौरन यह सवाल मन में घुमड़ता है कि असलियत में यह क्या कर सकती है? यह भारत जैसे देश में जिंदगियों में कैसे फर्क ला सकती है, जहां कई सदियां साथ-साथ कदमताल करती हैं और भविष्य अतीत के साथ हमबिस्तर रहता है? ज्यादा वक्त नहीं लगा.

जनवरी 2023 के महीने भर में ही यह खिलौना करीब 10 करोड़ लोगों के मन को भा गया. उसके बाद का वर्ष एआई के वास्तविक जीवन में उपयोग के आम और खास डोमेन में विस्फोट होते गए, जो दुनिया बेहतर बना सकते हैं या युद्ध में झोंक सकते हैं. वर्ष के अंत में हमने काशी तमिल संगमम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण का साथ-साथ अनुवाद होते देखा, जो लगता सरल है लेकिन है मानव जीनोम कोड को क्रैक करने जैसा.

जाहिर है, हम कोपर्निकन क्रांति 2.0 के दौर में हो सकते हैं. अब यह हम पर निर्भर है कि हम उसके अगले इस्तेमाल को देख चौंके और डर जाएं, या इसे समझने की कोशिश करें. याद रखें, मानव इतिहास की पहली तकनीकी क्रांति यह जानने के साथ नहीं हुई कि आग क्या कर सकती है, बल्कि यह जानकर हुई कि उसे कैसे काबू में रखा जाए. नए साल के विशेषांक में हम इस क्षेत्र के आला दिमागों के लेखों की शृंखला ले आए हैं, जिसमें वैश्विक और देसी उद्योग प्रमुखों से लेकर डोमेन के खासे जानकार राजीव चंद्रशेखर जैसे शीर्ष सरकारी शख्स, एआई विशेषज्ञ और आलोचक हैं. इसे एक अनजाने महादेश की यात्रा गाइड समझें. यह अनभिज्ञ लोगों के लिए है, जो हममें से ज्यादातर हैं. जो पहले ही दीक्षा-संस्कार पा चुके हैं, उन्हें भी यह विचारों की अच्छी खुराक लगेगा, और एक इंडेक्स मिलेगा कि दुनिया और देश के शीर्ष दिमाग एआई के बारे में क्या सोच रहे हैं.

आप लेखों में कुछ दोहराव पाएंगे. एक, एआई की क्षमता जीवन के हर क्षेत्र में बदलावकारी है. विविधता और जटिलता से भरे भारत में यह संचार-संवाद के स्टेरॉयड जैसा है. जैसा कि गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई लिखते हैं, देश भर में लोग पहले ही "नौ अलग-अलग भारतीय भाषाओं में" वार्तालाप एआई इंटरफेस बार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह तो बस शुरुआत है. गूगल भारत सरकार के साथ "लगभग 800 बोलियों का डेटा जुटाने" पर काम कर रहा है.

बेंगलूरू में उसकी शोध टीम अंतत: "एक मॉडल तैयार करेगी जो 100 से अधिक विभिन्न भारतीय भाषाओं को समेट सकती है." संवाद-संचार की यह सामग्री हमारे भविष्य को नए सिरे से लिख सकती है. कई लेखकों ने नेत्र रोग की जांच, टीबी का पता लगाना और ऐंटीबॉडी की खोज जैसी अद्भुत संभावनाओं का हवाला दिया है. एआई का इस्तेमाल फसल स्वास्थ्य के आकलन, बाढ़ की भविष्यवाणी, शिक्षा में क्रांति, स्टार्ट-अप अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने, मौजूदा उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि जैसे बहुत कुछ के लिए किया जा सकता है.

युद्ध से लेकर चुनाव प्रचार तक सब बदल रहा है. जी20 शेरपा अमिताभ कांत का अनुमान है कि 2035 तक भारतीय अर्थव्यवस्था में 'अविश्वसनीय 967 अरब डॉलर' की आमद होगी. या माइक्रोसॉफ्ट इंडिया तथा दक्षिण एशिया के प्रेसिडेंट पुनीत चंडोक भारत में 'अरबों पैमाने का असर' देखते हैं, खासकर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एआई इंडेक्स रिपोर्ट ने पुष्टि की कि हमारे यहां दुनिया में 'एआई प्रतिभा का सबसे बड़ा खजानाट है.

दुनिया में बिग डेटा के सबसे बड़े सेट में एक, इंडिया स्टैक और इंडिया डेटासेट्स जैसी चीजें हमें इस मामले में दुनिया में अगुआ बनने का मौका मुहैया कराती हैं. लेकिन जब हम ऑटोनोमस सैन्य-ग्रेड हथियारों, डीपफेक, स्व-चालित कार दुर्घटनाओं और चुनावी हेराफेरी के लिए जनमत प्रभावित करने के बारे में सोचते हैं, तो स्वाभाविक आशंका घर कर जाती है.

इन खतरों से आगाह करना हमारे सभी लेखकों का दूसरा दोहराव है. पिचाई से लेकर हर कोई नैतिक जवाबदेही की बात करता है, जो इनोवेशन से जुड़ी होनी चाहिए. इस मामले में हमें दिलचस्प विरोधाभास भी मिलते हैं. मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन कंपनी सोरोको के संस्थापक रोहन मूर्ति हमें अपने शानदार लेख में इसका एक छोर पकड़ाते हैं, जिसके अंत में वे संपादन में मदद के लिए एलएलएम (लार्ज लैंग्वेज मॉडल) की तारीफ करते हैं. वे इंटरनेट से एआई की दुनिया के आंदोलन को सूचना से ज्ञान की ओर बढ़ना कहते हैं.

दूसरी ओर, दक्षिणी गोलार्द्ध में टेक्नोलॉजी और समाज के बीच तालमेल पर शोध करने वाले अंतर्विषयक शोध समूह डिजिटल फ्यूचर्स लैब की संस्थापक और कार्यकारी निदेशक उर्वशी अनेजा हमें बताती हैं कि एआई क्या नहीं है. "प्रचार के बैठने से ही असली कहानी शुरू हो पाती है...एआई सिस्टम मानव बुद्धि से बहुत दूर हैं. दरअसल, एआई सिस्टम को कंप्यूटेशनल आंकड़ों के रूप में बेहतर समझा जाता है जो पैटर्न का पता लगाने और अनुमान लगाने के लिए बड़ी मात्रा में डेटा को स्कैन करता है." फ्रैक्टल एनालिटिक्स के सह-संस्थापक श्रीकांत वेलमकन्नी इस पर उंगली रखते हैं कि अन्यथा क्या हो सकता है. असली खतरा यह है कि "जो लोग इन टेक्नोलॉजी को विकसित और नियंत्रित करेंगे, वे उसके सभी फायदों पर एकाधिकार बना सकते हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन गड़बड़ा सकता है."

इन लेखों के साथ हम इंडिया टुडे का एआई अनुभव साझा करते हैं. यह ग्रुप क्रिएटिव एडिटर नीलांजन दास की तस्वीरों का एक सेट है, जिसे वे 'हाइब्रिड' कला बताते हैं. वे कहते हैं: "मैंने हर चीज विजुअलाइज की, और उसे कई उपकरणों और ट्रेंड बॉट्स की मदद से एआई के जरिए साकार किया. फिर मैंने अन्य सॉफ्टवेयर से इसे मैन्युअली पूरा किया. एआई पहले ऐसी तस्वीरें सामने लाता है जो मैंने सोचा ही नहीं. यह किसी मूर्ख को बातें बताने जैसा है." यह दिलचस्प जानकारी है. फिलहाल तो, इंसानों को ही भविष्य संभालना होगा. लेकिन याद रखें कि टेक्नोलॉजी की धारा रुकती नहीं और क्रांतियां अमूमन अपने रचयिता को ही निगल जाती हैं.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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