scorecardresearch

प्रधान संपादक की कलम से

यह उन महिला शख्सियतों की शानदार फेहरिस्त है, जिन्होंने अलग-अलग किस्म की विषमताओं—गरीबी, लैंगिक गैर-बराबरी, भीतर धंसे और अवचेतन के पूर्वाग्रह, अवसर और पूंजी के अलावा और भी कई भेदभाव—पर फतह पाई अपने पेशे के शिखर पर पहुंचने का रास्ता बनाया

अहम उपलब्धियों वाली भारत की शीर्ष 100 महिलाएं
अहम उपलब्धियों वाली भारत की शीर्ष 100 महिलाएं
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2023

- अरुण पुरी

भारतीय महिलाएं बीते कुछ दशकों से नई ऊंचाइयां छू रही हैं. अब यह बहुत साफ है. देश की अग्रणी खगोल भौतिकीविद्. अंतरिक्ष उद्यमी. सूर्य के हमारे मिशन की कमान संभाल रही एक वैज्ञानिक. ठेठ जमीन पर भारतीय रेलवे को चला रही एक अफसरशाह. सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश. विराट बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सीईओ. हेल्थकेयर, टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर, फार्मा और बैंकों से लेकर सोशल मीडिया और मनोरंजन की चहल-पहल भरी दुनिया की विशालकाय कंपनियों तक समूचे विस्तार में फैले कारोबारों की मालिक. एक वाइस चांसलर. एक वाइस एडमिरल. एक चैंपियन बॉक्सर. एक क्रैक कमांडो प्रशिक्षक. ये सब महिलाएं हैं. और यह उन महिलाओं के कुछ उदाहरण भर हैं जिन्होंने भेदभावों की कांच की दीवार अनूठे अंदाज में तोड़ दी है. 

उन्हें सम्मानित करने के सम्मोहक कारण हैं, जिन्होंने, माओ के शब्दों में, 'आधा आसमान थाम रखा है'. सालाना अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआइएसएचई) की रिपोर्ट ने 2015 और 2020 के बीच विश्वविद्यालयों के महिला दाखिले में 18.2 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की और अब अनुमान है कि कॉलेज के छात्रों में पहली बार करीब 50 फीसद लड़कियां हैं—2 करोड़ से ज्यादा. इस तरह शिक्षित महिलाओं की पलटनें कामयाब महिलाओं के नक्शेकदम पर चलने के लिए नेपथ्य में इंतजार कर रही हैं. ऑनलाइन आकलन प्लेटफॉर्म व्हीबॉक्स का एक सर्वे फीमेल एम्प्लॉयबिलिटी 52 फीसद से ज्यादा बताता है, जो पुरुषों से काफी ज्यादा है. मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ें तो ईवाइ की एक रिपोर्ट से पता चला कि बोर्डों में महिलाओं की औसत नुमाइंदगी 2022 में बढ़कर महज 18 फीसद पर पहुंची, पर यह 2013 के छह फीसद से काफी तेज बढ़ोतरी है. इसे प्रतीकवाद नहीं, तर्क रफ्तार दे रहा है. 70 फीसद वैश्विक खपत की अगुआई महिलाएं कर रही हैं और ऐसे में तमाम अध्ययन बताते हैं कि 'महिलाओं को साथ' रखने वाली कंपनियां बहुत बेहतर प्रदर्शन करती हैं. भारत इस पुण्यचक्र में अभी दाखिल ही हो रहा है. तथाकथित सी-समूह (सीईओ, सीएफओ, सीओओ, वगैरह) में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ना तय है, जो सीईओ के मामले में अभी 4.7 फीसद है.

यह देखकर हौसला बढ़ता है कि स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की 44.4 फीसद मौजूदगी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है. पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में आरक्षण ने यह पक्का किया, जो कुछ राज्यों में तो 50 फीसद है. ठेठ जमीन से जो शुरू हुआ, वह खुशकिस्मती से अब शिखर की ओर बढ़ रहा है—महिला आरक्षण विधेयक 2023 हमारे विधानमंडलों का एक-तिहाई हिस्सा उन्हें सौंपने जा रहा है. 2019 में केवल 78 महिला सांसद चुनी गई थीं, जो हमारी 543 सदस्यों की लोकसभा की महज 14 फीसद थीं, ऐसे में हमारी राजनीति का महिलाकरण तभी होगा जब यह कानून अमल में आएगा. महिलाओं के वोटों से यह प्रक्रिया जोर पकड़नी चाहिए, जिन्होंने 2019 में 67.18 फीसद मतदान करके पहली बार पुरुषों को पीछे छोड़ दिया था और जो हाल के राज्यों के चुनावों में निर्णायक साबित हुआ.

इस विशेषांक में हम 100 महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं. यह उन महिला शख्सियतों की शानदार फेहरिस्त है, जिन्होंने अलग-अलग किस्म की विषमताओं—गरीबी, लैंगिक गैर-बराबरी, भीतर धंसे और अवचेतन के पूर्वाग्रह, अवसर और पूंजी के अलावा और भी कई भेदभाव—पर फतह पाई अपने पेशे के शिखर पर पहुंचने का रास्ता बनाया. ये पेशे भी राजनीति, कारोबार, कानून, विज्ञान, शिक्षा, खेल, सामाजिक कार्य, कला, मनोरंजन और संस्कृति जितने भिन्न-भिन्न हैं. देश में उपलब्धि हासिल करने वाली महिलाओं की अनगिनत तादाद को देखते हुए यह संपूर्ण फेहरिस्त नहीं है, बल्कि यह सबसे तेज चमकने वाली महिलाओं पर रोशनी डालती है.

विज्ञान के क्षेत्र की महिलाओं को ही लीजिए. प्रबल रूप से पुरुषों के इस गढ़ में यह अकेला होना है. मगर यह अन्नपूर्णी सुब्रह्मण्यम को भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान का डायरेक्टर बनकर सितारों तक पहुंचने से नहीं रोक सका. किशोरवय में आकाशगंगा को निहारते हुए वे जानती थीं कि वे ऐसा 'कुछ भी' करेंगी जिसका 'वास्ता सितारों से हो.' या निगार शाजी को, भारत के सौर मिशन आदित्य की प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में, सूरज का पीछा करने से. उनके पिता की सुनाई मैरी क्यूरी का कहानियों ने उनके दिल में विज्ञान के प्रति रुचि की अखंड ज्योति जलाई.

सशस्त्र बलों में भी महिलाएं अल्पसंख्यक हैं. रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का चेहरा चंद्रिका कौशिक याद करती हैं कि किस तरह कमरे में वे अक्सर अकेली महिला होती हैं, पर फिर भी अपनी बात कहने से नहीं हिचकिचातीं. भारत की अकेली महिला कमांडो प्रशिक्षक सीमा राव ब्रूस ली की मिश्रित मार्शल आर्ट जीत कुने दो और इज्राएली क्राव मागा में प्रशिक्षण लेने और कमांडो ट्रेनिंग की अपनी पुकार खोजने से पहले 'पानी, ऊंचाई और आग से भयभीत' कृशकाय लड़की थीं. वे न केवल अल्फा मेल यानी सबसे दबंग पुरुषों से जुड़े मिथक तोड़ रही हैं, बल्कि उन्होंने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से इम्यूनोलॉजी की पढ़ाई की है, छह बार टेडएक्स में बोल चुकी हैं और मिसेज इंडिया वर्ल्ड की रनर-अप रही हैं.

कारोबारी क्षेत्र की महिलाएं सबसे अहम हिस्सा हैं. अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों के बाद वे हमेशा रही हैं. तब महिला उद्यमियों में ऐसी उछाल आई थी कि 1988 में हमने एक पूरा अंक उन्हें समर्पित किया था, जेंडर पर यह फोकस हमने इन सारे वर्षों के दौरान बनाए रखा. इस बार महिला कारोबारियों की गैलरी में बायोटेक सुपरवुमन किरण मजुमदार-शॉ सबसे प्रमुख हैं, जिनकी और भी ज्यादा कीर्ति की भूख कभी शांत नहीं होती, खासकर जब वे बायोसिमिलर में वैश्विक अगुआई करने की तरफ देख रही हैं. स्टार्ट-अप में कामयाब फाल्गुनी नायर भी हैं, जिन्होंने इन्वेस्टमेंट बैंकर के शानदार करियर से संतुष्ट न होकर 'कुछ ऐसा जिसकी अपनी जिंदगी हो' रचने की तीव्र इच्छा के आगे घुटने टेक दिए. वह 'कुछ' नायका था, जो देश में महिलाओं की अगुआई वाले इने-गिने स्टार्ट-अप में है. 

इनमें से कुछ महिलाओं के लिए कामयाबी का मतलब हमेशा कांच की दीवार तोड़ना नहीं है. ट्रैक्टर बनाने वाली दिग्गज कंपनी टीएएफई की सीएमडी मल्लिका श्रीनिवासन कहती हैं, "आप पुरुष हों या स्त्री, कामयाबी के सूत्र तो समान ही हैं."

फिर 'सूटों के बीच साड़ी' अरुंधती भट्टाचार्य भी हैं, जो भारतीय स्टेट बैंक की पहली महिला चेयरपर्सन के रूप में उसके टेक्नोलॉजी कायापलट की देखरेख करने के बाद अब वैश्विक टेक फर्म सेल्सफोर्स के इंडिया परिचालन की प्रमुख हैं. कारोबार की दूसरी कामयाब महिलाओं को विरासत में जन्म लेने की बदौलत बढ़त मिली, जैसे अपोलो हॉस्पिटल्स की एमडी सुनीता रेड्डी, एचसीएल टेक्नोलॉजीज की चेयरपर्सन रोशनी नाडर-मल्होत्रा या आरआइएल की नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ईशा अंबानी को. मगर कारोबार की सूझबूझ के बिना, जिसने इतनी संपदा का निर्माण किया, अरबपति की बेटी होना आपको बस यहीं तक ले जाएगा.

कॉर्पोरेट मुकदमेबाजी की दिग्गज महिला पल्लवी श्रॉफ के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश (पी.एन. भगवती) की बेटी और अग्रणी लॉ फर्म के वारिस (शार्दूल श्रॉफ) की पत्नी होने का मतलब उनकी विशाल छायाओं से बाहर आकर अपनी जगह बनाना भी था. वे कहती हैं, "लोग मुझसे अक्सर पूछते कि क्या मैं अपने पति या बड़े वकीलों के साथ आने का इंतजार कर रही हूं." रिनिकी भुइयां सरमा को यह सुनना पड़ा कि उनकी उपलब्धियां इसलिए हैं कि उनके पति हिमंत बिस्व सरमा असम के मुख्यमंत्री हैं. वे कहती हैं, "मैंने कारोबार का हुनर पिता से विरासत में पाया. मुझे राजनैतिक संरक्षण की जरूरत नहीं है."

उनकी हरेक कामयाबी बड़ी मेहनत से और अक्सर वर्क-लाइफ बैलेंस की कीमत पर कमाई गई है. श्रॉफ याद करती हैं कि वे अपने बच्चों को अक्सर उस कोर्टरूम में पीछे बिठा देती थीं जहां वे बहस कर रही होती थीं. महिलाएं सपोर्ट सिस्टम की जरूरत पर जोर देती हैं. तब भी जब आप सेबी की चेयरपर्सन हों. माधवी पुरी बुच कहती हैं, "मेरी सास मेरा बड़ा सहारा थीं. वे मेरे पेशेवर होने पर गर्व करती थीं." महिलाओं का हश्र अक्सर वह चुकाने में होता है जिसे 'मातृत्व का जुर्माना' कहा जाता है, जिसके चलते कार्यबल में उनकी तादाद काफी कम हो जाती है. यह उन तमाम चुनौतियों को दर्शाता है जिनका असमान असर उनके करियर पर पड़ता है. अलबत्ता मल्टी-टास्किंग वह हुनर है जो उन्हें स्वाभाविक रूप से मिलता है. नीता अंबानी, जो खुद मल्टी-टास्कर हैं, कहती हैं, "सभी महिलाएं मल्टी-टास्कर हैं. मैं पक्के तौर पर मानती हूं कि महिलाएं जो नहीं कर सकतीं, वह नहीं किया जा सकता." महिलाओं की आवाज अहम बनी हुई है, चाहे राजनीति हो या बोर्डरूम. अपर्णा पुरोहित और मोनिका शेरगिल इसे प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स में भी ला रही हैं. मोनिका पूछती हैं, "आधी दुनिया महिलाएं हैं, तो बराबर नुमाइंदगी क्यों नहीं, खासकर जब कहानियां सुनाई जा रही हों?"

फलक के दूसरे छोर पर 27 वर्षीया निकहत ज़रीन हैं, जो शून्य से निकलकर आईं—या निजामाबाद से, जो करीब ही है, जब आप बॉक्सिंग की दुनिया या मुस्लिम महिलाओं की दुनिया पर विचार करते हैं. उनका सफर जिंदगी के साथ मुक्केबाजी के मैच से मिलता-जुलता है. दो विश्व खिताब और एक कॉमनवेल्थ का स्वर्ण पदक, और दिलो-दिमाग में ओलंपिक के साथ वे बहुत बुरा नहीं कर रही हैं. मगर उन्होंने जो सबसे अच्छा मुकाबला जीता, वह शायद दिमाग में चल रहा मुकाबला था. इसके बारे में उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, "मैं इस रूढ़िवादिता को तोड़ना चाहती हूं कि मुस्लिम औरतों को परदे में रहना चाहिए."

यह प्रेरक सुर कामयाब महिलाओं की इस पूरी फेहरिस्त में व्याप्त है, जो हमने आपके लिए संजोई है. इसमें राजनीति, खेल और सिनेमा के वे नाम भी हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं. यहां वे भी उसी पोडियम पर खड़े हैं जिस पर प्रशासन, विज्ञान और रक्षा क्षेत्र की छिपी हुई शख्सियतें खड़ी हैं. हमारा सौभाग्य है कि हम उनकी कामयाबी का जश्न मना रहे हैं.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

Advertisement
Advertisement