- अरुण पुरी
जातिवाद भारत के सबसे बुरे अभिशापों में से एक है. हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसकी निंदा की गई है, लेकिन यह भारतीय जीवन के हर पहलू में व्याप्त है. देश के नेता इस अभिशाप को खत्म करने की कोशिश करने के बजाए सत्ता हासिल करने या बनाए रखने के लिए इसे प्रोत्साहन देते रहते हैं. इसकी सबसे ताजा मिसाल देशभर में जाति जनगणना की मांग है, जो भारतीय राजनीति में दूसरे मंडल क्षण का प्रतीक है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के जाति आधारित सर्वेक्षण के नतीजे जारी करने के लिए भले ही 2 अक्तूबर का दिन चुना, लेकिन उन्होंने 2024 में होने वाले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए सियासी माहौल गर्म कर दिया है. नीतीश की यह सियासी गुगली भाजपा को बचाव की मुद्रा में लाने की कोशिश है. इसी वजह से कांग्रेस और दूसरे दल पूरे जोशोखरोश के साथ देशव्यापी जाति जनगणना का समर्थन कर रहे हैं. भाजपा के हिंदुत्व के संभावित प्रभावी जवाब की तलाश में इंडिया गठबंधन पिछड़ा समर्थक मुद्दे को हथियाने की कोशिश कर रहा है.
लेकिन जरूरी नहीं कि योद्धा नरेंद्र मोदी इससे सकते में आ जाएं. अब छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 3 अक्तूबर को हुई रैली में ही उनके जवाबी हमले को देख लीजिए, जहां उन्होंने कहा, ''सबसे बड़ी जनसंख्या गरीबों की है.'' यह उनकी ओर से राहुल गांधी के उस बयान का जवाब था जिसे राहुल ने कांशीराम के पुराने नारे से प्रेरित होकर कहा था, ''जितनी आबादी, उतना हक.'' हालांकि यह एक आक्रामक युद्ध रणनीति का दुर्लभ नमूना था. यह सच है कि भाजपा ने जातीय जनगणना के मुद्दे पर फ्रंट फुट पर खेलना शुरू कर दिया है, लेकिन उन्हें अभी भी अंदाजा नहीं है कि इस खेल में गेंद का उछाल कैसा होगा. दरअसल, यह पार्टी के एक ऐसे द्वंद्व को उजागर करता है, जिसका समाधान उनके पास नहीं है—वे न ही इस दांव को खुलकर खेलना चाहते हैं और न ही हार मानना चाहते हैं. 1990 का दशक मंडल बनाम मंदिर के बीच रस्साकशी में उलझा रहा, मगर इन तीन दशकों में भाजपा का विकास हुआ है. हिंदुत्व का उनका हालिया मॉडल जाति के प्रति संवेदनशील है. उन्होंने बीते कुछ समय में अपनी 'सवर्णों की पार्टी' की छवि को बदलकर अधिक समावेशी होने पर जोर दिया है. भाजपा के अंदर इसके कुछ समर्थक होने के बावजूद पार्टी ने जातीय जनगणना से अपनी दूरी बरकरार रखी है.
नीतीश कुमार ने 1931 के बाद से पहली बार ऐसा आधिकारिक डेटा सामने रखा है जो ओबीसी (अदर बैकवर्ड क्लासेज) की जनसंख्या नुमायां करता है. और इसका हासिल गौरतलब है—ओबीसी और ईबीसी (एक्सट्रीमली बैकवर्ड क्लासेज या अति पिछड़ा वर्ग) राज्य की 13 करोड़ से अधिक जनसंख्या का 63 फीसद हैं. यह भारत की कुल ओबीसी जनसंख्या, जो 1931 में देश का 52 फीसद अनुमानित थी और जिसे मंडल आयोग ने भी स्वीकारा था, से 11 फीसद ज्यादा है. अगर अनुसूचित जातियों और जनजातियों को मिलाकर देखा जाए तो बिहार की 84 फीसद जनसंख्या पिछड़ा वर्ग (जिसमें पिछड़ा मुसलमान वर्ग शामिल) है. ऐसे मजबूत लोकतंत्र में इस बात की जानकारी होना ही आम लोगों को एक तरह से सशक्त करती है, क्योंकि अब वे आरक्षण में बड़ा हिस्सा मांग सकते हैं. चार बड़े आगामी विधानसभा चुनावों में यह एक बड़ा कारक साबित हो सकता है. जाति जनगणना का विचार ही अपने आप में एक बड़ा हथियार है, इतना बड़ा कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल पार्टियां जैसे केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का अपना दल (सोनेलाल), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी इसका खुलकर समर्थन करते हैं.
इंडिया गठबंधन भी जाति-आधारित राजनीति के विरोधाभासों के खिलाफ उतर सकता है. उदाहरण के लिए, बिहार में नीतीश की जद (यू) ने ओबीसी के एक वर्ग में अपनी अलग पहचान बनाई, मुख्यत: लालू-तेजस्वी की राजद के खिलाफ, जो यादवों की पार्टी मानी जाती है. राजनीति से इतर, आरक्षित नौकरियों तक पहुंच में भी गंभीर गड़बड़ी दिखाई दे सकती है. उपलब्ध डेटा की विस्तृत समीक्षा से पता चलता है कि ओबीसी वर्ग के भीतर भी आरक्षण में कुछ विशेष समुदायों का कब्जा है. दरअसल, मोदी सरकार का भी यही मुख्य तर्क है. 2017 में उन्होंने जी. रोहिणी आयोग का गठन कर ओबीसी के अंतर्गत आने वाले 2,600 से भी अधिक समुदायों का अध्ययन किया. बीती जुलाई, तीन बार एक्सटेंशन लेने के बाद, आयोग ने अंतत: अपनी रिपोर्ट दी. अंतिम लक्ष्य यह है कि ओबीसी वर्ग की बनावट को समझकर इसे ऐसे वर्गों में बांटा जाए जिससे उन्हें आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ मिल सके, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.
भाजपा को जाति जनगणना की व्यवहारिक दिक्कतों का अंदाजा है और इसको लेकर उसकी हिचक की आंशिक वजह यही है. हालांकि, व्यापक रूप से यह उसकी विचारधारा के विरुद्ध जाता है. संघ-भाजपा हिंदुओं को एक इकाई के रूप में देखना चाहते हैं, जहां विभाजन के दूसरे मुद्दों पर धार्मिक जुड़ाव सबसे ऊपर हो. लेकिन जाति की मक्खी इस तस्वीर को बिगाड़ देती है. इसलिए पार्टी गरीबी को—इसे पैदा करने वाले सामाजिक कारकों से अलग कर—मुख्य वर्ग बनाना चाहती है. बिलाशक भाजपा अभी इस दुविधा में है कि जाति जनगणना की हिमायत करना उसके मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा या नहीं. वह भूली नहीं होगी कि 2015 में बिहार चुनाव के कुछ हफ्तों पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की 'सामाजिक समीक्षा' किए जाने की जरूरत बताई थी. कई लोगों का मानना है कि उस चुनाव में भाजपा को इस बयान से नुक्सान उठाना पड़ा था. लेकिन अब आगे क्या होगा, क्या जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ेगा, भाजपा अपने रुख में सुधार करेगी. यह सब देखना काफी दिलचस्प होगा. एग्जीक्यूटिव एडिटर कौशिक डेका, डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन और सीनियर एडिटर अमिताभ श्रीवास्तव इस बार की आवरण कथा में भारतीय राजनीति के एक बड़े अध्याय और संभावित नतीजों के बारे में बता रहे हैं.
कोई देश तभी आगे बढ़ता है जब उसके सभी लोग आगे बढ़ते हैं. भारत दावा करता है कि वह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है लेकिन प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े इस दावे की सच्चाई खोलकर रख देते हैं. इसके अलावा ऐसे कई सर्वे हैं जो जाति और गरीबी के संबंध को दिखाते हैं.
कमजोर ही सही लेकिन आज इस बात को लेकर सहमति है कि सकारात्मक पहल की जाए. हालांकि फिर भी कुछ लोग बराबरी के वितरण में ईमानदारी पर जोर दे सकते हैं और यह भी कह सकते हैं कि कुछ समूहों, जो वंचित हैं लेकिन जिन्होंने हमेशा ही सामाजिक बहिष्कार नहीं झेला है, को एक निश्चित समयावधि के लिए आरक्षण दिया जाए.
आखिरकार भारत को आधुनिक प्रगतिशील राष्ट्र बनने के लिए सरकारी मदद के जरूरतमंदों की पहचान की खातिर जाति और काम को आधार बनाने के बजाए और ज्यादा कारगर मानदंड अपनाने चाहिए.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

