कच्चे तेल की ऊंची कीमतें एक बार फिर देश के सामने परेशानी खड़ी कर रही हैं, जिससे चालू खाता घाटा (सीएडी) बढ़ने, रुपए के कमजोर होने और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. चालू खाता बढ़ने का मतलब उस स्थिति से है, जब आयात की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य देश के निर्यात के कुल मूल्य से अधिक हो जाता है.
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पिछले कुछ हफ्तों में 10 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं क्योंकि रूस और सऊदी अरब जैसे बड़े उत्पादकों ने आपूर्ति में कटौती की है. वहीं, ईंधन और कच्चे तेल का भंडार कम ही रहा है. इससे बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें एक महीने में करीब 14 फीसद से ज्यादा बढ़ी हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 24 अगस्त को 82.9 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 29 सितंबर को 95 डॉलर हो गईं. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमतें अगले साल के शुरू में 100 डॉलर के स्तर को पार कर सकती हैं. भारत पर इसका क्या असर होगा? भारत अपनी आवश्यकता का 80 फीसद से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए इसकी ऊंची कीमतों से अर्थव्यवस्था को नुक्सान होना तय है. भारत में कच्चे तेल का आयात 2022-23 में पिछले साल के मुकाबले 9.4 फीसद की दर से बढ़कर 232.4 मिलियन टन (एमटी) हो गया.
मूल्य के संदर्भ में बात करें तो इस वित्त वर्ष कच्चे तेल का आयात 158.3 बिलियन डॉलर (13.2 लाख करोड़ रुपए) था, जो 2021-22 में 120.7 बिलियन डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) की तुलना में 31 फीसद वृद्धि को दर्शाता है. इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पादों की मांग भी बढ़ी है. 2022-23 में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत पिछले साल के मुकाबले 10 फीसद से अधिक की दर से बढ़कर रिकॉर्ड 222.3 मीट्रिक टन पर पहुंच गई. हालांकि, देश में कच्चे तेल का उत्पादन 2022-23 में केवल 29.2 मीट्रिक टन रहा.
एक सीधा-सा नियम है, कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि से चालू खाता घाटा 40-50 बेसिस पॉइंट (आधार अंक) बढ़ जाता है. एक बेसिस पॉइंट का मतलब है एक फीसद अंक का सौवां हिस्सा. सीएडी का उच्च स्तर निवेशकों का भरोसा घटाने के साथ ही रुपए को और कमजोर कर सकता है, जो पहले ही प्रति डॉलर 83 रुपए तक पहुंच चुका है. मुद्रा कमजोर होने का सीधा मतलब है महंगाई बढ़ना और लोगों की खरीदने की शक्ति का घटना. इस वित्तीय वर्ष की जून तिमाही में, भारत का चालू खाता घाटा पिछली तिमाही के 1.3 बिलियन डॉलर (10,799 करोड़ रुपए) से बढ़कर 9.2 बिलियन डॉलर (76,420 करोड़ रुपए) यानी जीडीपी के 1.1 फीसद पर पहुंच गया.
यह बढ़ते व्यापार घाटे यानी आयात-निर्यात मूल्य में अंतर बढऩे, शुद्ध सेवा अधिशेष घटने और निजी हस्तांतरण प्राप्तियां (मुख्य तौर पर विदेशों में कार्यरत भारतीयों की तरफ से भेजी गई राशि) कम होने का नतीजा था, जो स्थानीय मुद्रा पर दबाव का प्रमुख कारण है. पश्चिमी देशों और चीन की तरफ से मांग में गिरावट के कारण भारत का व्यापारिक निर्यात धीमा पड़ा है जो व्यापार घाटे को बढ़ा रहा है. बैंक ऑफ बड़ौदा का एक रिसर्च नोट कहता है, ''हमारा अनुमान है कि चालू खाता घाटा इस वर्ष सकल घरेलू उत्पाद के 1.5 से 1.8 फीसद के आसपास रहेगा, लेकिन यह काफी हद तक तेल के अर्थशास्त्र पर निर्भर करेगा.''
दरअसल, खाद्य पदार्थों की कीमतों में नरमी के कारण अगस्त में मुद्रास्फीति घट गई थी, जबकि जुलाई में यह 15 महीने के उच्चतम स्तर पर थी. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) आधारित मुद्रास्फीति अगस्त में घटकर 6.8 फीसद हो गई, जो पिछले महीने 7.4 फीसद थी. हालांकि, अभी यह मान लेना जल्दबाजी होगा कि मुद्रास्फीति आगे भी गिरती रहेगी क्योंकि कुछ खाद्य पदार्थों की कीमतों में ऐसे कोई आसार नहीं दिख रहे.
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों की वजह से घटी हुई महंगाई से किसी तरह की राहत मिलने की गुंजाइश नजर नहीं आ रही है. भारत में ईंधन की कीमतें पहले ही ऊंचाई पर हैं, देश के तमाम हिस्सों में पेट्रोल के दाम 100 रु. प्रति लीटर से ऊपर हैं. हालांकि, प्रस्तावित विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव के कारण केंद्र की तरफ से ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम ही है.
क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी लिखते हैं, ''अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बरकरार रही तो इसका प्रत्यक्ष और व्यापक असर मुद्रास्फीति—खुदरा पंप पर ऊंचे दाम, उत्पादन और परिवहन लागत में वृद्धि आदि—के तौर पर सामने आ सकता है. उच्च सब्सिडी और आयात निर्भरता के मद्देनजर इससे राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा के बढ़ने के आसार हैं. साथ ही जीडीपी वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है.'' उन्होंने बताया कि 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से जीडीपी में 20-30 आधार अंकों की कमी आती है. हालांकि, पूरी तरह आशावादी बने रहते हुए उनका कहना है कि भारत की वृहद अर्थव्यवस्था कच्चे तेल की कीमतों में इस तरह की अस्थायी उछाल का मुकाबल करने में सक्षम साबित होगी.
9.4% बढ़त 2022-23 में कच्चे तेल के आयात में, अब 232.4 मिलियन टन
तेल की बढ़ी कीमतों का असर :
> चालू खाता घाटा (सीएडी) में होती है वृद्धि
> सीएडी का उच्च स्तर निवेशकों के भरोसे को घटाता है
> रुपया कमजोर होने से महंगा होने लगता है आयात
> उच्च मुद्रास्फीति की संभावना, खरीद शक्ति होती है कमजोर

