भारत-कनाडा रिश्तों में खटास बढ़ते जाने का पहला संकेत हाल में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान मिला. भारत ने द्विपक्षीय बैठक के लिए कनाडा के अनुरोध को ठुकरा दिया और इसके बजाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के साथ अलग-से बस थोड़ी बातचीत की. मोदी ने खालिस्तान कट्टरपंथियों की भारत-विरोधी गतिविधियों पर गहरी चिंता जाहिर की, जबकि ट्रूडो ने सख्त लहजे में ''कानून के राज की अहमियत’’ और ''विदेशी हस्तक्षेप’’ की फिक्र का इजहार किया.
हालांकि, बातचीत के बाद ट्रूडो के रवैए ने साफ कर दिया कि दोनों देशों के रिश्ते वाकई गोता लगा गए हैं. ट्रूडो के प्रधानमंत्री वाले विमान में दिल्ली में उड़ान भरने से पहले तकनीकी खराबी आ गई, तो उन्होंने दूसरे विमान में वापस जाने के भारत की पेशकश को ठुकरा दिया और विमान के ठीक होने तक दो दिनों का इंतजार किया और ज्यादातर अपने होटल के कमरे में ही बंद रहे.
हफ्ते भर बाद तो कनाडाई प्रधानमंत्री ने भारत पर खुलकर हमला बोल दिया. उन्होंने लोकसभा जैसी कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा कि ''कनाडाई सुरक्षा एजेंसियां भारत सरकार के एजेंटों और कनाडाई नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बीच संभावित संबंध के विश्वसनीय आरोपों की पड़ताल में सक्रियता से जुट गई हैं.’’
किसी देश, खासकर ताकतवर गुट सात या जी-7 देशों का कोई शासनाध्यक्ष भारत पर विदेशी धरती पर किसी विदेशी नागरिक की न्यायेतर हत्या में शामिल होने का आरोप लगाए, यह अभूतपूर्व था, वह भी बिना सबूत मुहैया कराए. नाराज भारत ने ट्रूडो के आरोपों को ''बेतुका’’ बताया और बदले में कनाडा पर ''आतंकवादियों, कट्टरपंथियों और संगठित अपराध का सुरक्षित पनाहगाह’’ बन जाने का आरोप लगाया. इससे कूटनीतिक तूफान खड़ा हो गया और दोनों देशों के रिश्ते बिल्कुल खराब होने का खतरा पैदा हो गया.
कहां है 'स्मोकिंग गन’?
अगले कुछ दिन दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ जैसी को तैसी कार्रवाइयों पर उतर गए. कनाडा ने पहले कदम उठाया और ओटावा में तैनात पंजाब काडर के आइपीएस अधिकारी पवन कुमार राय को निष्कासित कर दिया. उसके बाद भारत ने दिल्ली में कनाडा उच्चायोग के एक राजनयिक को बाहर का रास्ता दिखा दिया. कनाडा ने घोषणा की कि वह भारत के साथ प्रारंभिक प्रगति व्यापार समझौते की जारी बातचीत को रोक रहा है; नई दिल्ली ने जवाबी कार्रवाई में कनाडा में ई-वीजा समेत सभी वीजा सेवाओं पर रोक लगा दी.
इसके अलवा ओटावा से भारत में तैनात लगभग 90 राजनयिकों की संख्या को घटाकर कनाडा में भारत के 30 राजनयिकों के बराबर करने को कहा गया. भारत को तब झटका लगा जब न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कनाडा के सरे में गोलीबारी में सिख कट्टरपंथी निज्जर के मारे जाने के बाद अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने ओटावा को जानकारी साझा की थी जिससे यह निष्कर्ष निकालने में मदद मिली कि उसमें भारत का हाथ था.
रिपोर्ट में अनाम अमेरिकी अधिकारियों के हवाला से कहा गया है कि आखिरकार उनके कनाडाई सूत्रों ने ''स्मोकिंग गन’’ का पता लगाया, कनाडा में भारतीय राजनयिकों के 'इंटरसेप्टेड कम्युनिकेशन’ या एसआइजीआइएनटी (सिग्नल इंटेलिजेंस) सहित खुफिया जानकारी जुटाई, जिससे नई दिल्ली का हाथ होने की आशंका का संकेत मिलता है.
जी20 की अध्यक्षता के कामयाब आयोजन के बाद इन आरोपों के भू-राजनैतिक नतीजे थे, जो भारत के बढ़े हुए वैश्विक कद और प्रतिष्ठा को नष्ट कर सकते हैं. कनाडा फाइव आईज एलायंस का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड हैं. इन देशों की खुफिया एजेंसियां नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ जानकारियां साझा करती हैं.
अमेरिकी अधिकारियों ने खुलासा किया कि राष्ट्रपति जो बाइडन नई दिल्ली में जी20 सम्मेलन से अलग द्विपक्षीय बैठक के दौरान पहले ही प्रधानमंत्री मोदी से निज्जर हत्या का मुद्दा उठा चुके थे. विदेश विभाग के सचिव एंटनी ब्लिंकन ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ''हम जवाबदेही देखना चाहते हैं और यह महत्वपूर्ण है कि जांच मुकम्मल हो और नतीजे पर पहुंचे.’’
भारत ने आलोचकों पर पलटवार किया. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुन्न्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में कहा, ''नियम बनाने वाले नियम का पालन करने वालों को अधीन नहीं बनाते हैं. आखिर नियम तभी काम करेंगे जब वे सभी पर समान रूप से लागू होंगे. न ही हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि राजनैतिक सुविधा आतंकवाद, उग्रवाद और हिंसा पर रवैया तय करती है. इसी तरह, क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना चुनिंदा नहीं हो सकता है.’’
भारत का कड़ा रुख
जयशंकर का असामान्य कठोर बयान संकेत है कि कनाडा के साथ टकराव में भारत खुलकर खेलेगा, और यह कि भारत पश्चिमी देशों के ''दोहरे रवैए’’ को उजागर कर रहा है, जिन्होंने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए दूसरे देशों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है, लेकिन उभरती शक्तियों की ऐसी किसी कोशिश की निंदा में उतर आते हैं.
बाद में, कनाडा के आरोप पर एक खास सवाल पर जयशंकर ने अमेरिकी विदेश नीति के जानकारों के एक जमावड़े में कहा, ''हमने कनाडा से कहा है कि यह भारत सरकार की नीति नहीं है और उनके पास कुछ खास या प्रासंगिक है, तो हम उसे देखने को तैयार हैं.’’ हालांकि, यह स्पष्ट है कि भारत अब कनाडा स्थित खालिस्तानी तत्वों को आतंकवादी हमलों को मदद करने और बढ़ावा देने और नापाक भारत विरोधी गतिविधियों को चुपचाप देखते रहने को तैयार नहीं है, जबकि ओटावा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत से अलग किस्म के राजद्रोह कानून का हवाला देकर उन पर नकेल कसने से इनकार करता है.
और यह भी कि अगर कनाडा ने, बकौल एक भारतीय राजनयिक ''हिंसक और कट्टर भारत-विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाने में माहिर काहिली’’ जारी रखी तो नई दिल्ली अपने संपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को दांव पर लगाने और ओटावा के साथ कूटनीतिक रिश्ते को कमतर दर्जा देने को तैयार है. संक्षेप में कहें, तो जी-20 आयोजन के बाद भारत खुलकर मैदान में है और उसे इधर-उधर धकेला नहीं जा सकेगा.
जयशंकर ने ''राजनैतिक सुविधा’’ पद का इस्तेमाल किया. इसी में ट्रूडो और निज्जर की हत्या में दिल्ली के हाथ के ओटावा के आरोप के प्रति भारत के नजरिए का इजहार है. जिस 45 वर्षीय निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने का आरोप अब कनाडा लगा रहा है, वह कनाडा स्थित उन दो दर्जन कट्टरपंथियों में था, जिनके बारे में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने ओटावा को चेताया था.
निज्जर प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन खालिस्तान टाइगर फोर्स (केटीएफ) का प्रमुख था, और उसने 1997 में रवि शर्मा नाम के जाली दस्तावेजों के सहारे कनाडा में शरण ली थी (देखें, कुछ इस तरह टूटे टाइगर के दांत). पिछले 15 वर्ष में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने उस पर पंजाब में कई लक्षित हत्याओं में सहायता करने, भारत में हथियारों की तस्करी के लिए खालिस्तानी आतंकियों का इस्तेमाल करने और पंजाब स्थित दूसरे गैंगस्टरों के साथ जबरन वसूली रैकेट चलाने का आरोप लगाया.
भारत सरकार ने 2022 में उसके सिर पर 10 लाख रुपए के इनाम का ऐलान किया और कनाडा से उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. एक शीर्ष भारतीय पुलिस अधिकारी का कहना है, ''यह वाकई हताशाजनक है. कनाडाई अधिकारी केवल बातें, बातें, बातें ही करते हैं, लेकिन किसी भी खालिस्तानी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, यह दीवार पर सिर मारने जैसा है. यहां तक कि जब ये आतंकवादी सोशल मीडिया में दावा करते हैं कि वे हत्या में शामिल थे और वर्चुअल मीडिया में नंगा नाच करते हैं, तो भी हमें कनाडा से कोई सहयोग नहीं मिलता है.’’
दोष ऐतिहासिक और राजनैतिक वजहों का है. ऐतिहासिक रूप से, कनाडा में उदार आप्रवासन नीति रही है, जिसमें शरण चाहने वालों को शरण दिया जाता है. इससे वह विविध आप्रवासी समूहों का घर बन गया है, जिसमें भारतीय मूल के लोगों का स्थान सबसे ऊपर है. अनुमान है कि कनाडा में भारतीय आप्रवासी अब 18.5 लाख हैं, जिसमें सिखों की संख्या लगभग 8,00,000 है. इनमें से बमुश्किल 5,000-6,000 खालिस्तान के सक्रिय समर्थक हैं.
खालिस्तान का समर्थन ब्रिटेन, अमेरिका और पश्चिम एशिया में रहने वाले सिख आप्रवासियों में अधिक है. लेकिन नई दिल्ली को खालिस्तानी संगठनों के कार्यक्रमों में ट्रूडो और उनके मंत्रियों की उपस्थिति खटकती है. दरअसल, कनाडा के साथ संबंधों में खटास तभी आ गई थी जब 1980 के दशक की शुरुआत में मौजूदा प्रधानमंत्री के पिता, लिबरल पार्टी के तत्कालीन प्रमुख पियरे ट्रूडो ने कनाडा में शरण लिए खालिस्तानी कट्टरपंथी तलविंदर सिंह परमार के प्रत्यर्पण के भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अनुरोध को ठुकरा दिया था.
बाद में परमार ने 1985 में एयर इंडिया के कनिष्क विमान में बीच हवा में बम धमाके की साजिश रची, जिसमें 329 यात्री और चालक दल के सदस्य मारे गए. भारत में निराशा तब और बढ़ गई जब कनिष्क न्यायिक जांच वर्षों तक लटकती रही, जिसके परिणामस्वरूप कई प्रमुख आरोपी बरी हो गए. हाल में सिख कट्टरपंथियों ने कनाडा भर में कई गुरुद्वारों पर कब्जा कर लिया है, जिनमें से कई पर चस्पां है, ''भारतीय अधिकारियों और कुत्तों का आना मना है.’’ ये गुरुद्वारे कथित तौर पर आतंकवादियों लिए धन जुटाने और उनके रहने के गुप्त ठिकाने हैं.
ट्रुडो की सियासी मजबूरियां
राजनैतिक रूप से सिख वोटर सिर्फ 20-25 क्षेत्रों में ही प्रभावी हैं, लेकिन कनाडा की राजनीति के रुझान के मद्देनजर वे सरकार बनाने में निर्णायक साबित हो सकते हैं. 2021 में सबसे ताजा संसदीय चुनावों में ट्रुडो की लिबरल पार्टी सिर्फ 160 सीटंी ही जीत पाई, जो 338 सदस्यीय सदन में बहुमत के आंकड़े 170 से 10 कम था. 25 सीटों के साथ जगमीत 'जिम्मी’ धालीवाल की अगुआई में वाम झुकाव वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन से ट्रुडो सरकार बना पाए और प्रधानमंत्री के पद पर लौटे.
बतौर प्रधानमंत्री अपने तीसरे कार्यकाल (कुल आठ वर्ष) में ट्रुडो की लोकप्रियता में घरेलू वजहों, खासकर अर्थव्यवस्था पर उनकी सरकार की नाकामियों से तेज गिरावट आई है. कनाडा के ताजा चुनाव सर्वेक्षणों से अंदाजा मिलता है कि उनकी निजी लोकप्रियता खुद के सबसे नीचले स्तर पर चली गई है और आज चुनाव हुए तो लिबरल हार जाएंगे और कंजर्वेटिव अपने दम पर अच्छा-खासा बहुमत पा जाएंगे. विदेश नीति के मोर्चे पर ट्रुडो संसद में इस आरोप से बचाव की मुद्रा में आ गए कि पिछले आम चुनावों के नतीजों को चीन ने प्रभावित किया था और प्रधानमंत्री ने इस बारे में कुछ नहीं किया था.
दरअसल, भारत के साथ ट्रूडो के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव वाले रहे और मोदी के साथ उनकी केमिस्ट्री की कमी साफ नजर आई. नई दिल्ली को सबसे ज्यादा परेशानी कनाडा में खालिस्तानी संगठनों के आयोजनों में ट्रुडो और उनके मंत्री की मौजूदगी से होती है. 2018 में बतौर प्रधानमंत्री भारत की उनकी पहली आधिकारिक यात्रा भी कुछ हद तक कूटनीतिक पराजय साबित हुई, खासकर जब यह खबर आई कि प्रतिबंधित इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (आइएसवाइएफ) का पहले सदस्य और अभियुक्त रहा जसपाल अटवाल को दिल्ली और मुंबई में ट्रूडो के लिए आयोजित दो कार्यक्रमों में बुलाया गया था.
पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन को ''खालिस्तान समर्थक’’ बताकर उनसे मिलने से भी इनकार कर दिया था. बदतर तो यह कि ट्रूडो इस बात से खीझे हुए थे कि मोदी उनकी आगवानी के लिए खुद हवाई अड्डे पर नहीं आए, जबकि दूसरे विदेशी नेताओं के लिए पहुंचे थे.
फिर, द्विपक्षीय बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें लंबा भाषण पिला दिया कि कनाडा को खालिस्तान आतंकवादियों का स्वर्ग बनने से रोकने के लिए उनके प्रयास बेहद कम हैं. भारत सरकार के आकलन के अनुसार, 2021 के चुनाव के बाद, ट्रूडो राजनैतिक तौर पर काफी कमजोर हो गए हैं और सत्ता बरकरार रखने के लिए सिख आप्रवासियों का भरपूर समर्थन उनकी बड़ी राजनैतिक मजबूरी जैसा बन गया है.
भारत के लिए यह बेहद चिंताजनक था. खालिस्तानी कट्टरपंथी कोविड-19 महामारी के दौरान तो शांत थे, लेकिन पिछले दो वर्षों में उनकी गतिविधियों में फिर तेजी दिखी है. बदतर तो यह है कि जबरन वसूली और नशीली दवाओं की तस्करी में लिप्त पंजाब के गैंगस्टरों और खालिस्तान कट्टरपंथियों के बीच सांठगांठ बढ़ रही थी, जिनमें से कई कनाडा को अपना अड्डा बनाए हुए हैं.
मोदी सरकार 2019 में करतारपुर गुरुद्वारे के तीर्थयात्रियों के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच कॉरीडोर खोलने पर सहमत होकर सिख आप्रवासियों को खुश करना चाह रही थी. भारत ने सिख कट्टरपंथियों की काली सूची को भी काफी हद तक कम कर दिया था और उनमें से 312 को भारत में प्रवेश की अनुमति दी थी, जिन पर पहले प्रतिबंध लगाया गया था.
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले मोदी के काम की बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआइ) से पहले जुड़े रहे रिपुदमन सिंह मलिक ने भी प्रशंसा की, जो कनिष्क बम विस्फोट के मुख्य आरोपियों में एक थे, लेकिन 2005 में उन्हें बरी कर दिया गया था. उन्हें ''भारतीय केंद्रीय एजेंसी का कठपुतली’’ कहा गया और, जुलाई 2022 में सरे में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई.
हत्या के मुख्य संदिग्धों में निज्जर भी शामिल था, जिसका वर्षों से खासकर गुरु ग्रंथ साहिब को छापने के अधिकार को लेकर मलिक के साथ मतभेद चल रहा था. निज्जर की हत्या को हिसाब बराबर करने के लिए खालिस्तानी गुटों की होड़ के रूप में देखा गया. 20 सितंबर को ट्रूडो के भारत के खिलाफ आरोप सार्वजनिक करने के दो दिन बाद, कनाडा में सक्रिय पंजाब के कुख्यात देविंदर बंबीहा गिरोह से जुड़े सुखदुल सिंह उर्फ सुक्खा दुनेके को विनिपेग में गोली मार दी गई.
सुखदुल अर्शदीप सिंह डाला का गुर्गा था, जो गैंगस्टर था और निज्जर के केटीएफ से जुड़ा था. इस हत्या को पंजाब के दूसरे गैंगलॉर्ड लॉरेंस बिश्नोई के साथ रंजिश का नतीजा माना गया. बिश्नोई पंजाब के लोकप्रिय गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या के प्रमुख संदिग्धों में एक है. भारत के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय जबरन वसूली गिरोहों, ड्रग सरगनाओं और कट्टरपंथियों के बीच का गठजोड़ है, क्योंकि जब पुलिस उन पर कार्रवाई करती है तो उनमें से कई लोग कनाडा में शरण लेते हैं.
भारत का मानना है कि पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस कश्मीर में नाकाम कोशिशों के बाद खालिस्तान मुद्दे को जिलाने की कोशिश कर रही है. खुफिया अधिकारी ऐसी कोशिशों को शुरू में ही खत्म कर देना चाहते हैं. ट्रूडो के नेतृत्व में कनाडा अब तक भारत के सुरक्षा हितों के प्रति असंवेदनशील रहा है, जो दोनों देशों के बीच बिगड़ते संबंधों का एक प्रमुख कारण बन गया है.
भारतीय विदेश नीति जानकारों का मानना है कि ट्रूडो के भारत के साथ मुद्दों को सुलझाने के लिए कूटनीतिक रास्ते के बजाए निज्जर मुद्दे को कनाडा की संसद में उठाने का विस्फोटक रास्ता चुनने की कई खास वजहें हैं. एक, कनाडा का प्रमुख अखबार द ग्लोब ऐंड मेल निज्जर हत्या में भारत के हाथ की कहानी का खुलासा करने वाला था.
और ट्रूडो संसद में इस खिंचाई से बचने की कोशिश में थे कि भारत कनाडा की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है और वे जी20 में मोदी के साथ डिनर उड़ा रहे थे. इससे न केवल चीन के उल्लंघनों पर नरम रुख अपनाने के आरोपों से ध्यान हटता, बल्कि बेहिसाब महंगाई और दूसरी आर्थिक समस्याओं से भी ध्यान हटता, जिससे कनाडा के लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं.
सबसे बढ़कर यह है कि अब एनडीपी उनकी सरकार से समर्थन नहीं खींचेगी, जिसका सिखों में बड़ा समर्थन आधार है. इससे 2025 में ट्रूडो का सिख वोट बैंक भी मजबूत हो सकता है. जैसा कि एक भारतीय राजनयिक ने कहा, ''ट्रूडो के लिए यह मौका एक तीर से कई शिकार करने जैसा था.’’
कुछ जानकार इसमें अमेरिका का हाथ देखते हैं क्योंकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ने ही भारत का हाथ होने की आशंका की जानकारी साझा की थी. उनका मानना है कि अमेरिका का मकसद भारत को जी20 की बुलंदी के बाद कुछ पायदान नीचे लाना है. अमेरिका गरमागर्मी कम करने के लिए कनाडा और भारत के बीच मध्यस्थता कर सकता है, इसलिए नई दिल्ली के लिए अमेरिका का एहसान बढ़ेगा ही.
दूसरे लोग इस आकलन को खारिज करते हैं और कहते हैं कि अमेरिका इससे न सिर्फ हैरान, बल्कि उलझन में भी पड़ गया. वह करीबी रणनीतिक सहयोगी (कनाडा) और बढ़ते रणनीतिक साझेदार (भारत) के बीच अपने हितों के संतुलन के लिए मजबूर हो गया है. इसके अलावा, कनाडा अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं दे पाया है जिसमें भारत फंसता हो. अगर यह जल्द ही नहीं आया तो ट्रूडो के राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी उनके पीछे पड़ जाएंगे. उधर, ट्रूडो को लगता है कि भारत केवल खालिस्तान मुद्दे पर कनाडा के साथ अपने संबंधों को जोड़कर राई को पर्वत बना रहा है क्योंकि उनके देश में आप्रवासी सिखों की आबादी बहुत मामूली है.
तनाव दूर करने का वक्त
अधिकांश जानकार दोनों देशों के बीच राजनयिक तनाव कम करने की बात करते हैं क्योंकि खासकर बढ़ते आर्थिक संबंधों के कारण जोखिम बड़ा है. भारत और कनाडा के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार लगातार बढ़कर भारत के पक्ष में 8 अरब डॉलर (करीब 66,500 करोड़ रु.) तक पहुंच गया है, लेकिन यह संभावना से काफी कम है.
कनाडा के लोगों ने भारत में भारी निवेश करना शुरू कर दिया है, खासकर पेंशन फंड में अनुमानित 55 अरब डॉलर (4.6 लाख करोड़ रु.) का निवेश किया है. 2022 में कनाडा में करीब 2,26,000 छात्र पढ़ रहे थे, आवाजाही भी हाल के वर्षों में बढ़ी है. बड़ी संख्या में भारतीय आप्रवासी आबादी नौकरी के अवसरों की तलाश में भी है.
चीन पर अंकुश के केंद्र और एशिया-प्रशांत में धुरी के रूप में भारत का महत्व बढ़ा है. दोनों मामले कनाडा की भविष्योन्मुख नीति के लिए जरूरी हैं, इसलिए नई दिल्ली के साथ संबंधों को दुरुस्त रखना ओटावा के हित में है. ट्रूडो ने सिखों को दिखा दिया है कि वे उनके लिए खड़े हुए हैं और ''भारत की दादागीरी का सामना कर चुके हैं.’’ अब वे अपनी घरेलू आलोचनाओं की परवाह किए बिना, देश में सक्रिय प्रमुख खालिस्तानियों पर नकेल कस कर भारत की भावनाओं पर मरहम लगा सकते हैं.
भारत को सभी कनाडाई लोगों को वीजा जारी करने पर रोक लगाने के बदले सिद्ध कट्टरपंथियों वाले पीआइओ कार्ड धारकों के वीजा और पासपोर्ट रद्द करने पर ध्यान लगाना चाहिए. इसके अलावा भगोड़ों की भारत में भौतिक और मौद्रिक संपत्तियों को जब्त करने चाहिए. जैसा कि कनाडा में देश के एक पूर्व उच्चायुक्त ने कहा, ''दोनों पक्षों को हाइवे से हटकर किनारे आने की दरकार है ताकि टकराव में तेजी लाने के बदले सुलह-सफाई संभव हो सके.’’
समस्या दूसरी है, जैसा कि एक अन्य भारतीय राजनयिक ने कहा, ''जब आपके मुंह खून लग जाता है, जो हाल ट्रूडो का है, तो आप नहीं जानते कि सीमा कहां खींचनी है.’’ उनका मानना है कि 2025 के आम चुनाव तक अगले दो साल रिश्ते ठंडे बस्ते में चले जाएंगे. दूसरे आशावादी हैं और वकालत करते हैं कि दोनों देश कूटनीतिक मेज पर लौटें, क्योंकि स्थिति चाहे कितनी ही बिगड़ी क्यों न दिखे, कूटनीति असंभव मेल-मिलाप को संभव बनाने की कला है.

