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उभरती विश्व व्यवस्था

जी20 की भारतीय अध्यक्षता ने ग्लोबल साउथ की दमदार आवाज बनकर प्रतीकात्मक और ठोस कामयाबी के झंडे गाड़े

9 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली घोषणापत्र जारी करते हुए
9 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली घोषणापत्र जारी करते हुए
अपडेटेड 27 सितंबर , 2023

नई दिल्ली में जी20 का शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले, शेक्सपीयर के शब्दों में कहें तो, ए टाइड इन द अफेयर्स ऑफ मैन सरीखा मामला था. जूलियस सीजर नाटक की इस लाइन का मोटा-मोटा अर्थ यह है कि किसी भी इंसान के लिए मौके समंदर की लहर की तरह आते हैं और फिर देखते-देखते चले जाते हैं.

दिल्ली में इस महाआयोजन से पहले विश्व व्यवस्था तहस-नहस थी. यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को बांट दिया था. जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निबटने के तरीकों को लेकर फूट पड़ी थी. जिंदगियों और अर्थव्यवस्थाओं को महामारी ने तार-तार कर दिया था. विश्व व्यापार करने के तौर-तरीकों को लेकर एका नहीं था. टेक्नोलॉजी के धनी और निर्धन दोफाड़ थे. आय समूहों और विकास सूचकांकों में चीर-फाड़ हो चुकी थी. दरारें गहरी और चमकदार ढंग से तीखी थीं.

बर्बादी और मायूसी के इस समूचे माहौल के बीच दुनिया के सबसे ताकतवर समूह के सामने एक विकल्प था. वह दुनिया को सौहार्द, उपचार, उम्मीद और खुशहाली की तरफ खींच सकता था. अगर ऐसा नहीं होता, तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होने के फैसले के बाद जी20 की भारतीय अध्यक्षता को नेताओं के सर्वसम्मत घोषणापत्र के बगैर समाप्त होने की भीषण संभावना का सामना करना पड़ता. यह नाकामी का संकेत होता और भारत के निंदकों की बांछें खिल जातीं, पर दुनिया की मुसीबतें और जद्दोजहद और बढ़ जातीं.

मगर यह भारत का लम्हा था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी20 की कार्यवाही को बीच में रोककर नाटकीय ढंग से ऐलान किया कि नई दिल्ली घोषणा पर सदस्यों की मंजूरी मिल गई है. सभासद के हथौड़े को निर्णायक ढंग से पीटते हुए उन्होंने ऐलान किया कि इसे अंगीकार कर लिया गया है. इस पर न केवल इसे अंजाम देने के लिए कड़ी मेहनत कर रही टीम इंडिया ने बल्कि वहां इकट्ठा दुनिया के नेताओं ने भी तालियों की गड़गड़ाहट के साथ खुशी जाहिर की.

हाल के इतिहास में अगर कभी कोई निर्णायक मोड़ थे, तो उनमें एक शीर्ष दावेदार वह होता, जो 9 सितंबर, 2023 की दोपहर भारत मंडपम में दुनिया ने देखा. दुनिया की जीडीपी में तीन-चौथाई हिस्सेदारी रखने वाले 100 से ज्यादा देशों (भारत के पुरजोर आग्रह की बदौलत उसी सुबह जी20 में शामिल अफ्रीकी यूनियन सहित) ने दिखा दिया कि वे अपने भारी-भरकम मतभेदों से ऊपर उठकर 'दुनिया की साझा भलाई’ के लिए मिलकर काम कर सकते हैं.

यह सचमुच 'जागृत’ जी20 था. सभी सहमत थे कि यूक्रेन सहित सभी युद्ध 'अत्यधिक मानव यंत्रणा' का सबब होते हैं और उन्हें समाप्त करना ही होगा, जैसा कि नई दिल्ली घोषणा में कहा गया. मगर कई और तत्काल जरूरी चिंताएं भी थीं. मसलन वैश्विक मंदी से निबटना, कोविड के विनाशकारी असर के बाद गरीबी की रेखा से नीचे फिसल गए लाखों लोगों को ऊपर उठाना, और जलवायु परिवर्तन को रोकना. भारतीय वार्ताकारों और उनके सहयोगी देशों ने यह बात सबके गले उतारी कि जी20 में सर्वानुमति के अभाव की वजह से अराजकता और ढुलमुलपन का एक साल भी जारी रहना तीसरे विश्व युद्ध के फूट पड़ने के बराबर होगा.

जी20 के लिए भारत के शेरपा और वार्ताकारों की अगुआई कर रहे अमिताभ कांत ने बताया, ''हमने सदस्यों से कहा कि जी-20 को युद्ध की राह के बजाए आर्थिक वृद्धि की राह पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अव्वल तो यह इसी के लिए बनाया गया था. वह सारा ध्यान यूक्रेन के युद्ध में झोंककर दुनिया के पैरों में बेड़ियां नहीं डाल सकता. लिहाजा जी20 को अपनी सरोकारों की प्राथमिकता तय करनी चाहिए." 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 सितंबर को महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर विश्व नेताओं के साथ

मगर यूक्रेन पर सर्वसम्मति मुख्य रूप से जी20 के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी की निजी चर्चाओं की बदौलत बन सकी, और केवल वही चर्चाएं नहीं जो दिल्ली में हुईं, बल्कि वे भी जो उन्होंने जोहानेसबर्ग में ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन और दिल्ली शिखर सम्मेलन से ठीक पहले जकार्ता में ईस्ट एशिया की बैठक के दौरान की थीं.

दिल्ली घोषणा कई कारणों से भारत और दुनिया दोनों के लिए जीत थी. पहली बात तो यह कि 55 देशों वाली अफ्रीकी यूनियन को शामिल करके उसने विकासशील देशों की बढ़ती प्रमुखता को स्वीकार करने के अलावा जी20 को ज्यादा समावेशी बना दिया. यहां भी काफी कुछ श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाना चाहिए, जिन्होंने आगे बढ़कर अगुआई की. शी को न आने का अफसोस हुआ होगा क्योंकि मोदी ग्लोबल साउथ या वैश्विक दक्षिण की निर्विवाद आवाज बनकर उभरे.

दूसरी उपलब्धि जलवायु परिवर्तन के खतरे से निबटने के लिए किए गए ग्रीन पैक्ट से मिली. महज उस 100 अरब डॉलर के बजाए जिसकी सालाना प्रतिबद्धता विकसित दुनिया ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत जताई थी, जी-20 ने वैश्विक तापमान को खतरे के स्तर से नीचे रखने के लिए 2030 तक ज्यादा यथार्थवादी 60 खरब (ट्रिलियन) डॉलर के लिए जोर डाला.

सतत विकास लक्ष्यों को लागू करने की प्रगति तेज करने के लिए कार्य योजना तैयार की गई. वर्ल्ड बैंक सरीखे बहुराष्ट्रीय विकास बैंकों (एमडीबी) के बेहद जरूरी पुनरोद्धार के रोडमैप को मंजूरी मिल गई, तो कैपिटल एडिक्वेसी फ्रेमवर्क (सीएएफ) यानी पूंजी पर्याप्तता ढांचा तय किया गया, जिससे बैंकों की उधार देने की गुंजाइश बढ़कर 200 अरब डॉलर हो गई.

उतना ही महत्वपूर्ण यह भी रहा कि जी-20 ने माना कि वित्तीय समावेशन यानी हर किसी को वित्तीय ढांचे के साथ जोड़ने में डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) एक अहम साधन होगा. इस मोर्चे पर भारत की उपलब्धियों को खूब सराहा गया, साथ ही अगले चार साल में विकासशील देशों में डीपीआइ पर अमल की एक कार्ययोजना को मंजूरी भी दी गई. 

जी20 शिखर सम्मेलन में लैंगिक सशक्तीकरण के अलावा क्रिप्टोकरेंसी के संबंध में अधिक संतुलित और विनियमित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया. भारत में संपन्न जी20 के दौरान 73 कार्य-उन्मुख नतीजे निकले, जो 2022 में इंडोनेशियाई अध्यक्षता या उससे पहले इटली की अगुआई में हुए सम्मेलन की तुलना में दोगुने हैं. प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. प्रमोद के. मिश्रा बताते हैं, ''प्रधानमंत्री मोदी की सोच एकदम स्पष्ट थी कि भारत की जी20 की अध्यक्षता के व्यावहारिक नतीजे निकलने चाहिए ताकि भारत कुछ ऐसा ठोस हासिल कर सके जो खासकर वैश्विक दक्षिण के विकास के लिहाज से सार्थक साबित हो."

नतीजों पर मंथन के लिए पीएमओ के नेतृत्व में सभी संबंधित मंत्रालयों की समीक्षा बैठकें बुलाई गई हैं. प्रधानमंत्री ने भारत की तरफ से 2024 के लिए ब्राजील को अध्यक्षता सौंपने से पहले ताजा प्रगति की समीक्षा के लिए नवंबर में जी20 नेताओं के एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन का भी आह्वान किया है. हालांकि, यह सबसे कठिन हिस्सा होगा क्योंकि जी20 किसी कार्यकारी संगठन के बजाए देशों के क्लब की तरह कार्य करता है. यह निर्धारित मानकों पर संचालित एक निकाय है, और इसकी संभवत: सबसे बड़ी उपलब्धि 2008 में सामने आई थी, जब इसने लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद उपजे वैश्विक वित्तीय संकट को सुलझाने की दिशा में कदम उठाया.

यही वह समय था जब इसे और अधिक निर्णायक बनाने के उद्देश्य से वित्त मंत्रियों की बैठक से बढ़ाकर राष्ट्राध्यक्षों के स्तर पर लाया गया. इससे पहले, जी20 की बैठकें सबसे ताकतवर देशों के समूह जी7 की तरफ से निर्धारित एजेंडे के इर्द-गिर्द केंद्रित रहती थीं. लेकिन भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे अन्य उभरती वैश्विक ताकतों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाया कि जी20 विकास का ऐसा एजेंडा निर्धारित करे जो ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता हो.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन कहते हैं, ''अगर अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश सीधे तौर पर नाम लेकर रूस की आलोचना न करने और बाली की तुलना में यूक्रेन युद्ध का जिक्र कम आक्रामक तरीके से करने पर सहमत हुए तो इसकी वजह सिर्फ यही है कि उन्हें लगा कि अगर वे दिल्ली घोषणापत्र पर एकमत नहीं हुए तो भारत का कद कमजोर पड़ जाएगा. यही नहीं,  इससे चीन को बढ़त मिल सकती है. इसलिए, पश्चिमी देशों ने घोषणापत्र की भाषा में एक तकनीकी सुधार किया और किसी और समय या किसी अन्य मंच पर यह मुद्दा उठाने का मन बनाया.’’ 

जैसा अनुमान था, यूक्रेन ने इस बात पर गहरी निराशा जताई कि रूस जो करना चाहता है, वह कर रहा है और पश्चिमी देश आम सहमति कायम करने के भारतीय दबाव के आगे झुक रहे हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि जी20 का उद्देश्य मुख्य रूप से भूराजनैतिक मुद्दों को सुलझाना नहीं है. कई विशेषज्ञों ने कहा कि भू-राजनैतिक मुद्दों को कम अहमियत देकर जी20 समूह ने अपना कद काफी कमजोर कर लिया है.

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने तो जी20 को पूरी तरह भंग करने का आह्वान कर डाला. वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने लेख में बोल्टन ने तर्क दिया, ''प्रेस विज्ञप्तियां, संयुक्त बयान और आखिर में जारी दस्तावेजों के ढेर सिर्फ दुनिया को बर्बाद करने में योगदान देने वाले नजर आते हैं, और कुछ नहीं." बोल्टन ने आलोचनात्मक लहजे में कहा कि दिल्ली घोषणापत्र में ''रूस के बिना उकसावे वाले आक्रमण पर केवल एक दयनीय टिप्पणी थी, जो इस समूह के 2022 (बाली शिखर सम्मेलन) के बयान से भी कमजोर थी."

कांत ने इस आरोप को नकारते हुए दावा किया कि नई दिल्ली घोषणापत्र एक मजबूत दस्तावेज है, जिस पर कड़े संघर्ष के बाद आम सहमति बनी है. उन्होंने कहा कि इस घोषणापत्र ने न केवल बाली में कही गई बातों को दोहराया, बल्कि रूस और अन्य देशों को क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन न करने का स्पष्ट संदेश भी दिया. कांत कहते हैं, ''हमने भूराजनैतिक विरोध में कुछ हद तक कमी लाने में सफलता दर्ज की. हमने यूक्रेन युद्ध के राजनयिक समाधान पर जोर दिया."

कई विदेश नीति विशेषज्ञ इससे सहमत हैं कि भारत की जी20 अध्यक्षता एक अप्रतिम सफलता थी, न केवल मिश्रा की निगरानी में पीएमओ की ओर से शिखर सम्मेलन के लिए की गई उत्कृष्ट व्यवस्थाओं के कारण, बल्कि इसलिए भी कि भारत ने जी20 को यूक्रेन मुद्दे पर पटरी से नहीं उतरने दिया और इस पर राजनैतिक खेल रोका. रूस में भारत के पूर्व राजदूत डी.बी. वेंकटेश वर्मा कहते हैं, ''दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन प्रतीकात्मकता और सार, दोनों ही लिहाज से भारत और प्रधानमंत्री मोदी के लिए शानदार सफलता है. यह एक तरह का शक्ति परीक्षण था जिसमें भारत न केवल पूरी तरह खरा उतरा बल्कि इसकी बदौलत शीर्ष लीग में जगह बनाने में सफल रहा, और वह भी खुद अपने बलबूते. जी20 ग्लोबल साउथ की उम्मीदों-आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने का एक मंच बना और भारत उसकी अगुआई की कमान संभाले नजर आया."

वर्मा यह भी कहते हैं कि यह भारत के लिए एक अवसर है तो चुनौती भी कम बड़ी नहीं है. भारत ने जी20 के जरिए अपनी जो साख कमाई है, उसे बचाकर रखना होगा. साथ ही आयोजन की दौरान महाशक्तियों का दबाव झेलने की जो क्षमता दिखाई, उसे भी आगे बरकरार रखना होगा. इस लिहाज से आने वाले कुछ साल भारतीय कूटनीति के लिए कड़ी परीक्षा की घड़ी होंगे. जैसा, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, ''जी20 ने भारत को विश्व के लिए तैयार होने और दुनिया को भारत के लिए तैयार करने में काफी योगदान दिया."

दिल्ली जी20 सम्मेलन ने एक नई और उभरती वैश्विक व्यवस्था को गति देने का भी काम किया है. पिछले दशक में वैश्विक अव्यवस्था चरम पर रही है और मुक्त बाजार, निजीकरण और वैश्वीकरण आदि में वाशिंगटन का एकाधिकार टूटा है. आज दुनिया गैर-वैश्वीकरण, घटते अमेरिकी दबदबे, बढ़ते संरक्षणवाद, चीन की आक्रामकता और व्यापार संबंधी चुनौतियों के अलावा आतंकवाद और यूक्रेन युद्ध जैसे समस्याओं से घिरी है. ऐसे में दुनियाभर के देशों को लग रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में अस्थिरता की इस खतरनाक स्थिति पर काबू पाना जरूरी है.

इस बीच, चीन एक प्रमुख वैश्विक ताकत के तौर पर उभरा है. हालांकि सैन्य शक्ति के मामले में चीन क्षेत्रीय ताकत ही बना हुआ है लेकिन आर्थिक रूप से वह सुपरपावर बनता जा रहा है और अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है. अमेरिका भी चीन पर नकेल कसने के लिए कई समूहों को एकजुट करने की दिशा में सक्रिय है, और भारत भी उसकी योजना का एक अभिन्न हिस्सा है. 

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जून में पीएम मोदी की मेजबानी कर इसमें बड़ी राजनैतिक पूंजी तो झोंकी ही, हाइ-टेक सैन्य-सामग्री बेचने पर भी सहमति जताई जो कि वह अपने कुछ बेहद करीबी सहयोगियों को भी नहीं देता है. जी20 शिखर सम्मेलन से इतर भी दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक हुई और बाइडन ने मोदी की नेतृत्व क्षमता की जोरदार तारीफ की.

वैसे भी, भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को संतुलन साधने में माहिर खिलाड़ी की तरह पेश कर रहा है. यही वजह है कि उसने चीन की चुनौती को साधने के लिए अमेरिका से घनिष्ठता बढ़ाना जारी रखा है, लेकिन रूस के साथ भी अपने संबंधों को पटरी से नहीं उतरने दिया. यही नहीं, पश्चिम एशिया, खासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को साथ लाने में सफल रहा है, जो शिखर सम्मेलन के दौरान आर्थिक एकीकरण के लिए बेहद अहम माने जा रहे भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारे पर हस्ताक्षर से जाहिर है.

वहीं अफ्रीकी संघ को जी20 में शामिल कराने में कामयाबी हासिल कर भारत ने ग्लोबल साउथ के नेता के तौर पर अपनी छवि चमका ली है. अब, विदेश नीति के मोर्चे पर बात करें तो मोदी सरकार ने चीन के साथ संबंधों में तगड़े झटके झेलने के बावजूद अपने पत्ते अच्छी तरह खेले. जयशंकर ने जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि ग्लोबल साउथ पर सबसे ज्यादा जोर इसलिए दिया जा रहा क्योंकि यह समाज असाधारण तनाव से गुजर रहा है, खासकर कोविड महामारी के बाद से.

इससे उनकी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुक्सान पहुंचा और व्यापार भी बाधित हुआ, यूक्रेन युद्ध की वजह से ईंधन और उर्वरक की कमी ने हालात और बदतर कर दिए हैं. जयशंकर ने चेताया, ''अगर इस पर ध्यान न दिया गया तो आगे चलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ही गंभीर दबाव उत्पन्न होगा. इस पर विचार करें कि चाहे उत्तर हो या दक्षिण इस मंदी का पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार अथवा सुरक्षा मोर्चे पर क्या प्रभाव होगा."

दिल्ली जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत ने उन मुद्दों को उठाने के वैश्विक दक्षिण के प्रयासों को साकार करने में अहम भूमिका निभाई जो उनके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते हैं. वर्मा कहते हैं, ''जिन तथ्यों और तरीकों के साथ वैश्विक कल्याण को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है, उसमें ग्लोबल साउथ की छाप है और भारत ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई है. उदाहरण के तौर पर दिल्ली से पहले हुई जी20 बैठक सामने है और अब दिल्ली के बाद भी एक जी20 होना है." अकबरुद्दीन इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, ''इसको यूं भी कह सकते है कि लिलिपुटियनों ने अब गुलिवर को बांध लिया है और अब उसके साथ अपने-अपने मुद्दे सुलझाने की सौदेबाजी कर रहे हैं." कांत इस पर तर्क देते हैं, ''भारत ने जी20 में जो हासिल किया, वह यह कि बहुपक्षवाद केंद्र में आ गया."

यह कहना तो जल्दबाजी होगा कि उभरती विश्व व्यवस्था कैसे आकार लेगी लेकिन भारत वैश्विक कल्याण के लिए उन्हें एकजुट करने में तो सफल ही रहा है. आगे चलकर उनकी एकजुटता में धन और शक्ति के मुकाबले यह ज्यादा प्रभावशाली ताकत साबित होगी.

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