बायोसिमिलर
आजादी के बाद से स्वास्थ्य क्षेत्र में अगर कोई ऐसा लक्ष्य है जिस पर भारत ने लगातार सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है, तो वह है सबको समान रूप से स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना. लेकिन यह ऐसा लक्ष्य है, जिसे पूरा करना बेहद मुश्किल है क्योंकि कई बीमारियों के इलाज पर आने वाला खर्च बहुत महंगा पड़ता है. ऐसे में अगर बायोसिमिलर की बात करें तो यह महज एक बड़ा कदम भर नहीं बल्कि एक लंबी छलांग साबित हो रही है. बायोसिमिलर का आशय ऐसी दवाओं से है, जो 'बायोलॉजिक्स' की श्रेणी (मसलन, स्टेम-सेल, इंसुलिन थेरेपी आदि) में आने वाली महंगी दवाओं का विकल्प होती हैं. ये एक तरह से उनका प्रतिरूप होती हैं.
अपनी कम लागत के कारण बायोसिमिलर अपार संभावनाएं जगाती हैं और आने वाले दशकों में देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का चेहरा बदलने की क्षमता रखती हैं. इसका घरेलू बाजार लगातार बढ़ रहा है. भारत आज न केवल कुछ उन चुनिंदा देशों में शुमार है, जहां विश्वस्तरीय मानक वाले अधिकांश बायोसिमिलर उपलब्ध हैं, बल्कि जो अनुसंधान और उत्पादन स्थल के स्तर पर भी बतौर प्रतिस्पर्धी उभरे हैं. एक अनुमान के मुताबिक, 2022 तक बायो-टेक्नोलॉजी स्टार्ट-अप की कुल संख्या 5,365 है और 2024 तक इसके 10,000 तक पहुंचने की उम्मीद है.
> यह गेम चेंजर क्यों है?
बायोसिमिलर बायोलॉजिक्स का एकदम सटीक प्रतिरूप तो नहीं होतीं लेकिन मूल दवा के सक्रिय घटक की नकल होती हैं. इनका उत्पादन तब किया जाता है जब कोई जैविक पदार्थ पेटेंट-मुक्त हो जाता है. जाहिर है, यह पक्का करने के लिए गहन शोध और गुणवत्ता नियंत्रण की जरूरत पड़ती है कि बायोसिमिलर अपनी संरचना और उपयोग में मूल जैविक दवा जैसी ही असरकारी हों. लेकिन बायोकॉन, रिलायंस लाइफ साइंसेज, डॉ. रेड्डीज लैब्स, जाइडस कैडिला, ल्यूपिन और इंटास जैसी कई फार्मा कंपनियों के ठोस प्रयासों की बदौलत भारत अब इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद खिलाड़ी बनकर उभर रहा है.
जेनेरिक्स ऐंड बायोसिमिलर इनिशिएटिव के मुताबिक, यूरोप और अमेरिका जैसे सख्त विनियमन वाले बाजारों में बायोसिमिलर के विकास पर अनुमानत: 10-20 करोड़ डॉलर (843-1,666 करोड़ रु.) खर्च आता है. दूसरी तरफ, भारत में सस्ते श्रम, सेवा शुल्क और मरीजों की उपलब्धता और ट्रायल की सहज सुविधा की वजह से समान दवा विकसित करने की लागत दस गुना कम है. डॉ. रेड्डीज के एक प्रवक्ता का कहना है, ''अभी हमारे पोर्टफोलियो में भारतीय बाजार में बेचे जाने वाले छह वाणिज्यिक उत्पाद शामिल है. हम तकरीबन 11 बायोसिमिलर पर काम कर रहे हैं.''
> महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे
मार्केट रिसर्च फर्म इनसाइट्स10 के मुताबिक, भारत का बायोसिमिलर बाजार 2022 में 34.9 करोड़ डॉलर (2,906 करोड़ रु.) था और 2030 तक यह करीब 210 करोड़ डॉलर (17,480 करोड़ रु.) का हो जाएगा. आने वाले सालों में करीब 10 बायोलॉजिक्स पेटेंट से मुक्त हो जाएंगे, जो भारतीय कंपनियों के लिए अपनी वैश्विक बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने का एक बड़ा मौका है. लेकिन, खासकर एक विश्वसनीय नियामक ढांचा तैयार करने को लेकर चुनौतियां बरकरार हैं.
भारत ने पिछले कुछ समय में 60 से ज्यादा बायोसिमिलिर को मंजूरी दी है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मंजूरी प्रक्रिया को कड़ा बनाया जाना चाहिए और केवल बड़े पैमाने पर क्लिनिकल डेटा के आधार पर ही स्वीकृति दी जानी चाहिए. एक अन्य तर्क है कि विनियामक मंजूरी के दौरान ऐच्छिक प्रतियों, जिन्हें बायोमिमिक्स या नॉन-कंपेयरेबल बायोलॉजिक्स भी कहा जाता है, को बायोसिमिलिर से अलग किया जाना चाहिए ताकि डॉक्टरों और मरीजों में किसी तरह का भ्रम न पनपे.
बदलाव के अगुआ
1. रिलायंस लाइफ साइंसेज
> विश्व स्तर पर सबसे बड़ी संख्या में बायोसिमिलर उत्पाद बेचने वाली कंपनी. फिलहाल यह भारत और दूसरे देशों में 21 बायोसिमिलर उत्पाद बेचती है और जल्द ही दो और लॉन्च करने वाली है.
> यह आँकोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, कार्डियोलॉजी, पल्मोनोलॉजी, हेमेटोलॉजी, न्यूरोलॉजी, ऑर्थोपीडिक्स के लिए 15 और बायोसिमिलर विकसित कर रही है
2. बायोकॉन
> बाजार में इसके आठ कमर्शियलाइज्ड प्रोडक्ट हैं. ग्लार्जिन इंसुलिन बायोसिमिलर के लिए एफडीए मंजूरी हासिल करने वाली यह विश्व स्तर की पहली कंपनी थी
> 20 बायोसिमिलर मॉलीक्यूल्स उतारना इसकी योजना में है, जिसका लक्ष्य वित्त वर्ष 2027 तक 70 अरब डॉलर से अधिक का बाजार खड़ा करना है
3. डॉ. रेड्डीज
> बायोसिमिलर बाजार के एक अपेक्षाकृत नए खिलाड़ी डॉ. रेड्डीज ने इस साल अपने रीटक्सिमैब बायोसिमिलर कैंडीडेट का क्लिनिकल अध्ययन पूरा किया है. इसे कई तरह के विकारों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा. उत्पाद को भारत और 25 से ज्यादा उभरते बाजारों में उतारने की मंजूरी पहले ही मिल चुकी है

