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भारत@100 : जुड़ेगा तो बेहतर पढ़ेगा इंडिया

फास्ट ब्रॉडबैंड, एआई और लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम ने शिक्षा को बदल दिया है. भारत को अपनी डिजिटल खाई को पाटना चाहिए, शिक्षकों को प्रशिक्षित करना चाहिए और एक एडटेक नीति लानी चाहिए जिससे इंटरनेट की सामग्री को रेगूलेट करते हुए इस अवसर का अधिकतम लाभ उठाया जा सके

बाएं हाथ का खेल डॉ. श्रीधर जी. दीक्षा स्टेम स्कूल, बेंगलुरू में छात्रों के साथ
बाएं हाथ का खेल डॉ. श्रीधर जी. दीक्षा स्टेम स्कूल, बेंगलुरू में छात्रों के साथ
अपडेटेड 11 सितंबर , 2023

पिछले दो दशकों में, शिक्षा में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से एक क्रांति आ गई है जिससे शिक्षा पहले से कहीं अधिक सुलभ और इंटरएक्टिव हो गई है. शिक्षण प्रबंधन प्रणाली (एलएमएस), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ), मशीन लर्निंग (एमएल), ब्लॉकचेन, मेटावर्स, संवर्धित वास्तविकता (ऑग्मेंटेड रियल्टी या एआर) और आभासी वास्तविकता (वीआर) जैसी तकनीकों ने सीखने के अनुभवों को व्यक्तिगत जरूरतों के मुताबिक ढालकर एक नए युग की शुरुआत की है.

यह गेमचेंजर क्यों है 

यह एक गेमचेंजर है क्योंकि इंटरनेट, मोबाइल डेटा, स्मार्टफोन की पहुंच और एडटेक कंपनियों के उद्भव ने शिक्षा तक पहुंच को बिना किसी भेदभाव के सबके लिए सुलभ बना दिया है. पारंपरिक रूप से कक्षा में जाकर सीखने और ऑनलाइन माध्यम से सीखने के संयोजन से तैयार हुई 'मिश्रित शिक्षा’ की अवधारणा ने बाधाओं को तोड़ दिया है और ज्ञान प्रदान करने तथा उस तक पहुंच बनाने की लगातार विकसित होने वाली संरचनाओं के लिए द्वार खोल दिए हैं.

भारत में शिक्षकों की कमी है, ऐसे में प्रौद्योगिकी बहुत कारगर सिद्ध हो सकती है. एक डिजिटल शिक्षा कंपनी नवनीत टॉपटेक के उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत के सीबीएसई स्कूलों के शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के बीच किए गए एक अध्ययन में, 64 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि प्रौद्योगिकी का उपयोग सीखने में विविधता लाने के लिए किया जा सकता है. भारत अब एडटेक के लिए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है, जिसके भविष्य में लगभग 2.25 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है.

महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे 

डिजिटल खाई से लेकर खराब प्रशिक्षित शिक्षकों तक, डेटा गोपनीयता से लेकर ऊंची लागत तक, कई बाधाएं हैं जो शिक्षा में प्रौद्योगिकी एकीकरण को प्रभावित करती हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 55 प्रतिशत भारतीय स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा नहीं थी.

सरकार को इस डिजिटल खाई को पाटना होगा. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में भारतनेट परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए 1.39 लाख करोड़ रुपए की मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य सभी गांवों में फाइबर कनेक्शन प्रदान करना है.

अगर प्रौद्योगिकी के माध्यम से सीखने में क्रांति लानी है, तो शिक्षकों को फिर से प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा. हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने शिक्षकों के कौशल को सुधारने का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास की आवश्यकता होगी. शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए बजटीय आवंटन 2021-22 में 250 करोड़ रुपए से गिरकर 2022-23 में 127 करोड़ रुपए हो गया. चालू वित्तीय वर्ष के लिए इस मद में कोई आवंटन नहीं किया गया.

जहां एडटेक कंपनियां और ऑनलाइन स्रोत तेजी से बढ़े हैं, वहीं सामग्री की गुणवत्ता का कोई मानकीकरण नहीं हुआ है.

इसके अलावा, एडटेक कंपनियां छात्रों का डेटा स्टोर करती हैं, जिससे डेटा गोपनीयता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. कदाचार और बाल अधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टों से यह तो स्पष्ट है कि एडटेक उद्योग ने जिस स्व-नियमन का वादा किया था, वह उस पर खरा उतरने में विफल रहा है. सरकार को ई-लर्निंग को विनियमित करने के लिए एक एडटेक नीति लानी चाहिए. इसके अलावा, अधिकांश निजी एडटेक उत्पाद इतने महंगे हैं कि निम्न-आय समूह के छात्र उनका लाभ ले ही नहीं सकते.

मंत्रालय को सरकार प्रायोजित एडटेक सामग्री का विस्तार करना चाहिए. प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग का दायरा बढ़ाने के लिए एडटेक फर्मों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकार को एकजुट होना चाहिए.

बदलाव के अगुआ

1. लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टक्वस (एलएमएस) 

जैसे कि सनबर्ड, वाइज ऐप, विज-क्यू और टीवीएस एलएमएस. ये सॉफ्टवेयर ऐप्लिकेशन हैं जो यूजर को ऑनलाइन कॉन्टेंट उपलब्ध कराने के लिए फ्रेमवर्क और प्लेटफॉर्म देते हैं

2. एडटेक कंपनियां

बायजूज, अनएकेडमी, ईआइ-माइंडस्पार्क

3. सरकार समर्थित मूक्स

मूक्स (मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज) जैसे स्वयं और दीक्षा. ये वेब आधारित फ्री डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम हैं. छात्र इंटरनेट के जरिए इन तक एक्सेस हासिल कर सकते हैं

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