
डिजिटल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल ने पूरे भारत में राजकाज के मॉडलों को आमूलचूल बदल दिया है. इसने न केवल भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंका बल्कि जनता से जुड़ी सेवाओं की समयबद्ध डिलिवरी और जवाबदेही भी पक्की की. भारत ने विशाल डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है. अब भविष्य इस पर निर्भर है कि कम लागत वाले ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर का हम कितनी चतुराई से इस्तेमाल करते हैं, मौजूद कॉमन बिल्डिंग ब्लॉक्स का समान वितरण किस तरह से करते हैं, एआइ, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन को एक-दूसरे से कैसे बेहतरीन ढंग से जोड़ते हैं. केंद्र और राज्य सरकारें इन औजारों को प्रयोग में लाते हुए कई नवाचार लेकर आई हैं. सरकारी और निजी क्षेत्र में साझेदारी की बदौलत ई-गवर्नेंस के ढांचों और कार्यप्रणाली की क्षमता भी तेजी बढ़ रही है और रफ्तार भी
भारत@ 100 ई-गवर्नेंस ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर
इसे आप ग्राम स्वराज 2.0 कह सकते हैं. कोई भी गांव, चाहे कितना भी दूरदराज क्यों न बसा हो, जनसेवाओं की पहुंच से बाहर नहीं है. जहां राज्यसत्ता और नागरिक एक सीधी-सादी हॉटलाइन यानी मोबाइल फोन से जुड़े हैं. इसे ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर (ओएसएस) मुमकिन बना रहे हैं, जो सस्ता, इस्तेमाल में आसान और जरूरत के हिसाब से ढाला जा सकने वाला प्लेटफॉर्म है. यही बात इसे सरकारों के लिए लीक-प्रूफ तरीकों से जनसेवाएं मुहैया करने का आदर्श जरिया बना देती हैं.
यह हमारे सरीखे मुल्क के लिए खास तौर पर उपयोगी है, जो इस साल चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया, और जिसके लोग भिन्न-भिन्न भूगोलों की माला में गुंथे हैं. भारत ने इतने बड़े पैमाने पर सावर्जनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है कि दूसरे देशों में जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना में 31 मिशन मोड परियोजनाएं हैं, जिनमें स्वास्थ्य से लेकर कृषि, बैंकिंग, कराधान और शिक्षा आदि तक सरकार और नागरिकों के बीच संवाद का समूचा तंत्र मौजूद है. चुनौती अब इसकी पहुंच बढ़ाकर पूरी तरह समावेशी बनाने की है.

यह गेमचेंजर क्यों है
ज्यादा तेज, सटीक और यूजर के अनुकूल डिजिटल सेवाओं के साथ ओएसएस पर आधारित प्लेटफॉर्म न केवल गुणवत्तापूर्ण सेवाएं दे सकते हैं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार उनका आकार बढ़ाया भी जा सकता है. साथ ही ये सेवाएं इतनी गतिशील और लचीली हैं कि मांग और टेक्नोलॉजी के विकास में किसी भी बदलाव का जवाब दे सकें.
भारत ई-गवर्नेंस देने के लिए ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म अपनाने में दुनिया के अग्रणी देशों में रहा है. भारत सरकार की एजेंसियां ओएसएस विकसित करने के लिए कई सार्वजनिक-निजी भागीदारियों में शामिल रही हैं. दरअसल ज्यादातर लोकप्रिय ई-गवर्नेंस सेवाएं, चाहे उमंग हो या आयुष्मान भारत, ओएसएस पर आधारित हैं. डिजिटल गवर्नेंस इकोसिस्टम तैयार करने में शामिल नॉन-प्रॉफिट संगठन ई-गव फाउंडेशन के संस्थापक विराज त्यागी कहते हैं, ''न्यूनतम खर्च में सार्वजनिक डिजिटिल बुनियादी ढांचा बनाने के काम में शामिल संगठन और सरकारी एजेंसियां माइक्रो सर्विसेज आर्किटेक्चर का निर्माण कर रही हैं, कुछ वैसा ही जिसका इस्तेमाल मेटा या गूगल ने किया है. एक बार इसके बन जाने पर हमारी विशाल आबादी को ई-गवर्नेंस देने के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र साथ आ सकते हैं.’’
ओएसएस की लोकप्रियता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि ये लचीले हैं और लागत में किफायती हैं. सरकारी एजेंसियां ओपन सोर्स उत्पादों को अपनी खास जरूरतों के अनुरूप आसानी से ढाल सकती हैं. यही नहीं, ओपन सोर्स लाइसेंस इसके इस्तेमाल को सीमित या प्रतिबंधित नहीं करते. न ही मुफ्त और खुले मानकों का इस्तेमाल करते समय विक्रेता का कोई एकाधिकार होता है. इसीलिए केंद्र और राज्य सरकारें डिजिटल सेवाएं मुहैया करने के लिए ओएसएस का विकल्प चुन रही हैं. अब तो ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में ओएसएस के तौर पर क्लाउड कंप्यूटिंग, बिग डेटा एनालिटिक्स और ब्लॉकचेन सरीखी विकसित होती टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. ओएसएस आधारित अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी की बदौलत सरकार तेजी से बदलाव ला पाई और डिजिटल सेवाओं का प्रयोग बढ़ा सकी, जैसा कि कोविड महामारी के देश में फैलते वक्त देखा गया. भारत उन इने-गिने देशों में था जो माउस के एक क्लिक पर टीके का प्रमाणपत्र दे सके.
महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे
ओएसएस को अपनाने से दूसरे ई-गवर्नेंस सॉल्यूशंस के साथ परस्पर कार्यक्षमता जरूर बढ़ जाती है, पर यह ज्यादा बड़े पैमाने पर नहीं हुआ. केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकारों की तरफ से दी जा रही विभिन्न ई-गवर्नेंस ऐप्लिकेशन को और खासकर एक ही क्षेत्र की ऐप्लिकेशन को आपस में जोड़ने की जरूरत है, ताकि सेवाएं आसान हों, उनकी गुणवत्ता बेहतर हो और दोहराव से बचा जा सके.
सरकार को चाहिए कि वह ओएसएस के मामले में निजी कंपनियों के साथ मिलकर काम करने के लिए नागरिक संगठनों को प्रोत्साहित करे. भारत में ओएसएस अपनाने की नीति मौजूद है. केंद्र ने किसी भी नई डिजिटल सेवा का निर्माण करते समय सभी केंद्रीय एजेंसियों के लिए प्रोप्राइटरी प्रोडक्ट्सर के साथ ओएसएस पर विचार करना अनिवार्य बना दिया है. राज्यों के लिए भी इस नीति को लागू करना अनिवार्य बना देना चाहिए.
बदलाव के अगुआ
ई-गवर्नेंस फाउंडेशन
• बेंगलूरू के इस स्वयंसेवी संगठन ने शहरी राजकाज का पूरा चेहरा बदलने के लिए एक टेक स्टैक विकसित करके काम पर लगाया था. इसका नाम है डिजिट (डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर गवर्नेंस, इंपैक्ट ऐंड ट्रांसफॉर्मेशन)
जनाग्रह
• बेंगलूरू का यह स्वयंसेवी संगठन नागरिक भागीदारी, म्युनिसिपल फाइनेंस और पॉलिसी तथा इनसाइट्स के क्षेत्र में काम करता है. इसकी पहलकदमियों में माइसिटीमाइबजट जैसी पहल भी शामिल हैं. यह सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के लिए

