हर परिवार में सालाना औसतन 50 किलो भोजन बर्बाद होता हो तो सोचिए, 1.4 अरब की आबादी वाले देश में नुक्सान का पैमाना कितना बड़ा है. यह नुक्सान 1.03 लाख करोड़ रु. (12.4 अरब डॉलर) मूल्य की फेंकी गई उपज से कहीं ज्यादा का है; इससे जीडीपी की वृद्धि भी प्रभावित होती है. देश में मांस और अनाज के प्रसंस्करण में थोड़ी प्रगति तो हुई है, लेकिन फल और सब्जी के मामले में यह बेहद सीमित है. फिर भी मोटे अनाजों पर जोर देकर देश में नई क्रांति की उम्मीद की जा रही है.
मौजूदा वर्ष को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. दुनिया में सबसे ज्यादा मोटा अनाज भारत में ही पैदा होता है. आइटीसी, ब्रिटानिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियों से लेकर पंजाब के जैतो और छत्तीसगढ़ के रायपुर में छोटे उद्यमी तक मोटा अनाज के अपने उत्पादों को बाजार में उतारने की तैयारी कर रहे हैं. पिछले वित्त वर्ष में देश का प्रसंस्कृत खाद्य/प्रोसेस्ड फूड का निर्यात $2 लाख करोड़ रु. (24 अरब डॉलर) से कम था. फिर भी अनुमान है कि देश में अगले दो वर्षों में घरेलू बाजार 44.5 लाख करोड़ रु. (535 अरब डॉलर) तक बढ़ जाएगा. इस बढ़ोतरी में बाजरे की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की उम्मीद है.
फलों, सब्जियों और मांस जैसे जल्दी खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थों के उलट, मोटे अनाज को 15 साल से भी ज्यादा समय तक रखा जा सकता है. भंडारण की यह आसानी प्रसंस्करण योजना को सुविधाजनक बनाती है. अच्छी सेहत के लिए इसकी उपयोगिता को देखते हुए खासकर कोविड के बाद के दौर में प्रोसेसिंग इकाइयों की मांग में वृद्धि की उम्मीद है. मोटा अनाज फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया है. पिछले साल देश में मोटा अनाज आधारित रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट उत्पाद तैयार करने और उसकी बिक्री को प्रोत्साहित करने के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना शुरू की गई थी. करीब 30 कंपनियां इस क्षेत्र में सक्रिय हैं.
यह गेमचेंजर क्यों है
दरअसल, 2020-21 में कृषि क्षेत्र के सुधारों को लागू करने में नाकामी और बड़े पैमाने पर खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए निवेश आकर्षित करने में मामूली उपलब्धियों के बाद देश अब सहकारी नेटवर्क और किसान उपज संगठनों को मजबूती मुहैया करने की ओर बढ़ रहा है. इस कोशिश में मदद के लिए विभिन्न स्तरों पर सुधारों की पूरी एक शृंखला है, जिनमें राज्यों के सहकारी कानूनों में बदलाव, भारतीय रिजर्व बैंक के कंट्रोल को सीमित करने के अलावा राज्यों को अपने कानून बदलने को प्रोत्साहित करना शामिल है. किसान समूहों की स्थापना और प्रबंधन के लिए प्रोत्साहनों से भी इस कोशिश को बल मिलता है.
महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे
देश में 2020-21 में कृषि क्षेत्र के जिन सुधारों को रद्द करना पड़ा, उनमें कॉर्पोरेट-किसान संबंधों को गहरा करने की क्षमता थी. फिलहाल देश भर में अनुबंध खेती कानून मौजूद हैं लेकिन खाद्य वस्तुओं की आवाजाही पर प्रतिबंध हैं. इससे उन कंपनियों को चुनौती पेश आती है, जिनका लक्ष्य प्रसंस्करण-अनुकूल अनाज की खेती के लिए किसानों के साथ सहयोग करना है. हालांकि, मोटे अनाज की खेती प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से की जा सकती है और उसमें प्रगति अभी भी शुरुआती चरण में है. उपज बढ़ाने और किसानों के मद में अधिकतम लाभ मुहैया करने के लिए अनुसंधान और नई विधियों में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है.
बदलाव के अगुआ
1. आइटीसी
• देश की यह प्रमुख एफएमसीजी कंपनी फूड प्रोसेसिंग के बिजनेस पर काफी जोर दे रही है
• यह नए उत्पाद उतारने, टेक्नोलॉजी लाने और किसानों (जिनसे वे अपने उत्पादों के लिए कच्चा माल प्राप्त करते हैं) की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए ट्रेंड-सेट कर रही है
2. सहकारी समितियों और खेती-किसानी वाले संगठनों का नेटवर्क
• देश इन समूहों के नेटवर्क को मजबूत कर रहा है, उन्हें अनाजों की खरीद, भंडारण और प्रसंस्करण के लिए नेटवर्क विकसित करने को प्रेरित कर रहा है
आणंद मिल्क यूनियन
• देश की प्रमुख डेयरी सहकारी संस्था दुग्ध उत्पादों के लिए मानक तय करती है और अब इसकी अंतरराष्ट्रीय पहुंच है. यूनियन में 18 सदस्य हैं और यह 18,600 ग्राम दुग्ध सहकारी समितियों से लगभग 2.63 करोड़ लीटर दूध खरीदती है और इसके गुजरात के 33 जिलों से 36.4 लाख दूध उत्पादक सदस्य हैं. अमूल के उत्पादों की 26 श्रेणियां हैं, जिनमें मक्खन, दही, पनीर, घी, पेय पदार्थ आदि शामिल हैं.

