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भारत@100 : अन्न क्षेत्र में आत्मनिर्भरता

हमारा लक्ष्य 2047 तक विकसित देश की श्रेणी हासिल करना है. ऐसे में तब तक की अनुमानित 1.66 अरब आबादी के लिए पौष्टिक भोजन की पुख्ता व्यवस्था जरूरी है फिलहाल देश में 30 करोड़ टन अनाज पैदा होता है लेकिन 2030 तक मांग 34.5 करोड़ टन पहुंचने का अनुमान है. देश दूध, मसाले, दालें, चाय, काजू और जूट उगाने में आगे है. चावल, गेहूं, तिलहन, फल, सब्जी, गन्ना और कपास के मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बावजूद आयात एक मजबूरी है. इसे बदलना होगा. तकनीक, नीतियों में सुधार और जलवायु-अनुकूल खेती जैसी पहलकदमियों से भविष्य में पैदावार और बढ़ने की उम्मीद है. जरूरत इस बात की भी है कि सालाना 6.87 करोड़ टन तक हो रही खाद्य-पदार्थों की बर्बादी पर लगाम लगाई जाए.

हमारा लक्ष्य 2047 तक विकसित देश की श्रेणी हासिल करना है.
हमारा लक्ष्य 2047 तक विकसित देश की श्रेणी हासिल करना है.
अपडेटेड 11 सितंबर , 2023

हमारा लक्ष्य 2047 तक विकसित देश की श्रेणी हासिल करना है. ऐसे में तब तक की अनुमानित 1.66 अरब आबादी के लिए पौष्टिक भोजन की पुख्ता व्यवस्था जरूरी है. फिलहाल देश में 30 करोड़ टन अनाज पैदा होता है लेकिन 2030 तक मांग 34.5 करोड़ टन पहुंचने का अनुमान है. देश दूध, मसाले, दालें, चाय, काजू और जूट उगाने में आगे है. चावल, गेहूं, तिलहन, फल, सब्जी, गन्ना और कपास के मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बावजूद आयात एक मजबूरी है. इसे बदलना होगा. तकनीक, नीतियों में सुधार और जलवायु-अनुकूल खेती जैसी पहलकदमियों से भविष्य में पैदावार और बढ़ने की उम्मीद है. जरूरत इस बात की भी है कि सालाना 6.87 करोड़ टन तक हो रही खाद्य-पदार्थों की बर्बादी पर लगाम लगाई जाए.

सपना सच होने की ओर

देश में खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता के लिए तिलहन की पैदावार बढ़ानी होगी. इसकी खातिर मिशन मोड में काम करने पर जोर

भारत खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है. घरेलू खाद्य तेल उत्पादन में मजबूती लाने के लिए नई नीतियों और अत्याधुनिक नवाचारों पर जोर दिया जा रहा है. इन सबके बावजूद आयात है कि लगातार बढ़ता ही जा रहा है. जुलाई में भारत ने दुनिया भर के बाजारों से 17.6 लाख टन खाद्य तेल खरीदा. इसमें 2022-23 के पहले नौ महीनों में आश्चर्यजनक तेजी देखी गई. इस दौरान खाना पकाने के तेलों के आयात में 23 फीसद की वृद्धि हुई. यह पिछले साल इसी अवधि में 99.8 लाख टन से बढ़कर 1.23 करोड़ टन हो गई.

जून के मध्य में देश में ज्यादा विदेशी तेल मंगाने की अनुमति दी गई और चुनिंदा खाद्य तेलों के लिए आयात शुल्क कम कर दिया गया. अब दुनिया के कुल खाद्य तेल आयात का 15 फीसद अकेले भारत ही करता है. इससे आयात बिल बढ़ रहा है, जो अक्तूबर 2022 को समाप्त होने वाले तेल वर्ष (नवंबर से अक्तूबर) में 1.57 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को छू गया. भारत सबसे ज्यादा पाम तेल का आयात करता है और यह तेल इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है. सोयाबीन तेल सहित दूसरे तेल की एक छोटी मात्रा ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे मुल्कों से आती है, जबकि यूक्रेन और रूस सूरजमुखी तेल की आपूर्ति करते हैं.

यह गेमचेंजर क्यों है 

बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की महत्वाकांक्षा के साथ देश में 2021 में खाद्य तेलों पर अपना दूरदर्शी राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया. इसका उद्देश्य तिलहन की पैदावार और तेल की उपलब्धता को बढ़ाना है. इस मिशन के तहत देश में पाम की बागवानी के क्षेत्र को 2026 तक 10 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जो 2019 में 3,50,000 हेक्टेयर तक सीमित था. इसके अलावा, 18 राज्यों में इसके लायक लगभग 28 लाख हेक्टेयर उपयुक्त जमीन की पहचान की गई है. इस मामले में पूर्वोत्तर के क्षेत्र से खास तौर पर ज्यादा उम्मीद है.

पाम के वृक्ष मिट्टी में जड़ें जमा लेते हैं तो तीन से चार साल उनसे तेल निकलने में लगता है. ये वृक्ष 20 से 25 वर्षों तक फल देते हैं. यह कदम दूरदर्शिता के साथ उठाया जाए तो देश में खाद्य तेल की प्रचुरता की नई कहानी लिखी जा सकेगी.

महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे

जलवायु परिवर्तन देश में खाद्य तेल उत्पादन बढ़ाने की महत्वाकांक्षाओं की राह में एक महत्वपूर्ण चुनौती है. यह खासकर पाम वृक्षों के बागानों के संदर्भ में खास है, जिन्हें अक्सर परिपक्व होने और फसल तैयार होने में काफी समय लगता है. हालांकि, देश तिलहन की खेती के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) तकनीक को अपनाने के मामले में दुविधा में है. मिसाल के तौर पर जीएम सरसों पर देश में जारी बहस काफी जटिल है और कई तरह की चिंताओं को उजागर करती है. इसके अलावा, सोयाबीन, मूंगफली आदि के संशोधित संस्करणों की स्वीकृति में बहुत कम प्रगति हुई है.

नियामक निकायों और यहां तक कि न्यायिक हलकों में भी ऊंचे स्तर पर जारी विचार-विमर्श से आदमी की सेहत और पर्यावरण पर जीएम प्रौद्योगिकी के तरह-तरह के असर को लेकर कई प्रकार की शंकाएं हैं. इस मामले में स्पष्टता की कमी की वजह से लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति बनी रही. इससे उन्नत किस्म की कृषि पद्धतियों का दोहन करने की देश की क्षमता में बाधा ही उत्पन्न हुई.

बदलाव के अगुआ

1. अदाणी विल्मर 

• अदाणी समूह और सिंगापुर स्थित कुओक खून होंग के विल्मर इंटरनेशनल का संयुक्त उद्यम सोयाबीन तेल, पाम तेल, सूरजमुखी तेल, राइस ब्रान तेल, सरसों का तेल, मूंगफली तेल, बिनौला तेल और मिश्रित तेल जैसे खाद्य तेल बनाता है
• यह कच्चे खाद्य तेल के सबसे बड़े आयातकों में एक है
• गुजरात के मुंदड़ा में अदाणी विल्मर की फैक्ट्री हर दिन 5,000 टन तेल की प्रोसेसिंग करने की क्षमता वाली देश की सबसे बड़ी फैक्ट्रियों में से एक है

2. पतंजलि फूड्स

• पूर्व में रुचि सोया इंडस्ट्रीज के नाम से जाना जाने वाला पतंजलि फूड्स सोयाबीन खाद्य तेलों की एक व्यापक प्रोडक्ट लाइनअप है
• यह स्थानीय किसानों से कच्चा माल खरीदती है
• यह फर्म नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस मिशन का उद्देश्य अगले पांच वर्षों में 15-20 लाख एकड़ क्षेत्र में 1 करोड़ पाम के पौधे लगाना है

‘‘नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स सही दिशा में चल रहा है. लेकिन उसे और गति दिए जाने की जरूरत है, साथ ही उसे बड़े पैमाने पर नीतिगत समर्थन चाहिए.’’

—अश्विनी महाजन, राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच

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