
मेडिकल क्षेत्र के संस्थान -
राजधानी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) 67 साल से भारत में चिकित्सा अनुसंधान की यात्रा में अग्रिम मोर्चे पर रहा है. आज कोविड के बाद की दुनिया में चिकित्सा क्षेत्र में बढ़-चढ़कर अनुसंधान और हर तरह से चाकचौबंद पब्लिक हेल्थ सिस्टम की जरूरत और अहमियत ने बुरी तरह से हमारा ध्यान खींचा है. ऐसे में संस्थान की यह भूमिका भारत के लिए और भी ज्यादा स्पष्ट और निर्णायक हो गई है.
एम्स दिल्ली ने अपने डॉक्टरों के लिए कई आंशिक यात्रा अनुदान और फेलोशिप शुरू की हैं ताकि वे अपने शोध-अनुसंधान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर पेश कर सकें. इस अनुदान के लिए पैसा विभिन्न कंपनियों के सीएसआर के जरिए आता है. संस्थान ने साथ मिलकर अनुसंधान करने के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन और आइआइटी दिल्ली के साथ भी हाथ मिलाया है और शोधकर्ताओं को ज्यादा सहारा देने के लिए कैंपस में सेंट्रलाइज्ड कोर फैसिलिटी स्थापित की है.
एम्स में रजिस्ट्रार एकेडमिक्स डॉ. समीर लालवानी कहते हैं, ''हम युवा संकाय सदस्यों को अनुसंधान में हिस्सा लेने के लिए विभिन्न प्रतिस्पर्धी अनुदानों के जरिए बढ़ावा देने को लालायित हैं. हम एम्स के विभागों को साथ आकर और मिलकर अनुसंधान करने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहे हैं.’’ अनुसंधान के विषय और उसकी खूबियों के बल पर छात्र भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर), जैवप्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और दूसरी सरकारी एजेंसियों से और भी पैसे ले सकते हैं. डॉ. लालवानी यह भी कहते हैं, ''हम हर तरीके से उनका मार्गदर्शन करते हैं और सहारा देते हैं.’’ संस्थान अगले साल नए फेलोशिप प्रोग्राम शुरू करने की योजना भी बना रहा है. इरादा टार्गेटेड फेलोशिप प्रोग्राम के जरिए उन छात्रों को समर्थ बनाना है जिन्होंने अपनी डॉक्टर ऑफ मेडिसिन पूरी कर ली है और जिन्हें खास क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन करने वाले सीनियर रेजीडेंट के रूप में तीन साल का व्यावहारिक अनुभव है.
चिकित्सा क्षेत्र में तेजी से विस्तार के मद्देनजर संस्थान ने कई नए विषयों में पढ़ाई शुरू कराई है. ऐसे विषय जिनकी स्वीकृति और दिलचस्पी बीते कुछ सालों में बढ़ी है. इनमें ऑन्कोलॉजी एनेस्थेसिया, संक्रामक रोग, प्रशामक (पैलिएटिव) चिकित्सा, प्रजनन चिकित्सा, भ्रूण चिकित्सा, मिनिमल एक्सेस सर्जरी, गुर्दा प्रत्यारोपण आदि शामिल हैं. डॉ. लालवानी कहते हैं, ''हम जो फेलोशिप कोर्स चलाते हैं, उम्मीद है कि उनमें से कुछ को जल्द डीएम (डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन) प्रोग्राम में बदल लेंगे. (देश के टॉप मेडिकल संस्थानों की सूची, नीचे)

हम अपने पीजी प्रोग्राम्स में मौके बढ़ाने को बेताब हैं और रजिस्ट्रार के तौर पर मेरे पिछले आठ साल के कार्यकाल में सीटें लगभग दोगुनी हो गई हैं.’’ गौरतलब है कि अस्पताल के आइसीयू में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस का खतरा एम्स के लिए अध्ययन का अहम क्षेत्र है. एम्स का एक रोमांचक पहलू यह है कि उसकी साहसी पहल की बदौलत छात्रों को चिकित्सा क्षेत्र की अहम खोज और सफलताएं प्रत्यक्ष देखने को मिलती हैं. इस साल जून में एम्स ने अपना पहला जीवित डोनर लीवर ट्रांसप्लांट किया. डॉ. लालवानी कहते हैं, ''यह कामयाब रहा और इससे युवा छात्रों को बेशक अनूठा अनुभव मिला.’’
छात्रों की स्वास्थ्य-सुविधा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है. कैंपस में काउंसलिंग सेंटर चलाने से एम्स के ही मनोचिकित्सा विभाग का अहम रोल है. छात्र वहां सलाह और सहायता के लिए जा सकते हैं. डॉ. लालवानी कहते हैं, ''मेडिसिन का सफर आसान नहीं है और इसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. छात्रों को एकेडमिक और प्रोफेशनल दवाबों को संभालने के लिए जरूरी सहायता मिलना जरूरी है.’’ नए छात्रों को भी सात दिनों के ओरिएंटेशन कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से हिस्सा लेना होता है जिससे उन्हें अपने संगी-साथियों और कैंपस से परिचित होने में मदद मिलती है.
भविष्य के बारे में सोचते हुए संस्थान अपने फायदे के लिए एआइ सरीखी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का मंसूबा बना रहा है. एक समिति इसकी तमाम संभावनाओं और खासकर डायग्नोस्टिक तरीकों पर विचार कर रही है. शिक्षण के नतीजों का विस्तार करने के लिए वैज्ञानिक तरक्की का भी फायदा उठाया जा रहा है. संस्थान ने न केवल एक ई-लर्निंग मॉड्यूल विकसित किया है, बल्कि ऐसे प्रोग्राम भी तैयार किए हैं जिनका इस्तेमाल दूसरी चिकित्सा संस्थाएं भी कर सकती हैं. प्राथमिकता अब भी हुनर विकसित करना ही है ताकि ऐसी सुविधाएं छात्रों और संकाय दोनों के लिए शुरू की जा सकें. डॉ. लालवानी के शब्दों में, ''चिकित्सा के क्षेत्र में कहीं पर भी नई बीमारियां और इलाज सामने आते हैं, एम्स में तुरत उनकी झलक देखी जा सकती है.’’ यही वजह है कि संस्थान तकरीबन सात दशक बाद भी चिकित्सा शिक्षा की शानदार मिसाल बना हुआ है.