तिरुवनंतपुरम के 36 वर्षीय राकेश बी.एस. 34 बरस के थे जब उनकी पत्नी ने स्थिति-विशेष में उनके गूंगे हो जाने का इलाज करवाने का फैसला किया. दरअसल, लोगों से मिलने-जुलने और बतियाने के डर से उन्हें घबराहट होती. इस वजह से कुछ खास मौकों पर वे बिल्कुल बोल ही नहीं पाते. उन्हें पता चला कि उनकी भी समझ में न आने वाले इस बर्ताव की एक वजह थी. बीते तीन दशकों से वे इन लक्षणों के साथ जी रहे थे और बरसों उन्होंने ''अजीब किस्म का बच्चा’’ कहलाने का दंश झेला था. उनकी वाक्शक्ति दूसरों जैसी ही नॉर्मल थी, इसलिए किसी को ज्यादा शक न हुआ. मगर फिर उनकी पत्नी ने उनके इस बर्ताव के बारे में जानकारियां जुटाईं और इस नतीजे पर पहुंचीं कि उन्हें मदद की जरूरत है. राकेश कहते हैं, ''पत्नी ने मेरे भीतर छिपी स्वाभाविक जरूरतों को सामने लाने में मदद की. उसी से डॉक्टर को समझने में मदद मिली कि मैं ऑटिस्टिक था.’’
एक ऑटिस्टिक बच्चे की मां और ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट मुग्धा कालरा के लिए इसे स्वीकार कर पाना बहुत बड़ी बात थी. वे कहती हैं कि पहली बार ऑटिज्म का पता चलने पर मां-बाप के ऊपर बहुत बुरी गुजरती है. ऑटिज्म यानी आत्मकेंद्रित, अपने में ही खोए रहने की बीमारी.'' यह एक सपने की मौत जैसी होती है. मेरी जिंदगी उसी पल बदल गई थी.’’ कालरा शुक्रगुजार हैं कि वे अपने बच्चे के इलाज और अलग तरह के स्कूल का खर्च उठा सकीं, जो वैसे खासा महंगा पड़ता है. अच्छी बात यह है कि परवरिश की खास जरूरतों के मामले में उनके पति भी बराबर हाथ बंटाते हैं. माधव को जो चीजें सबसे ज्यादा सुकून देती हैं, उसी हिसाब से मुग्धा ने चीजों का चुनाव किया है. ऑटिज्म एक्टिविस्ट दंपती के लिए इंस्टाग्राम ने इसके बारे में जागरूकता फैलाने और माधव के किस्से साझा करने का मंच दे दिया है. ऐसे बच्चों के माता-पिता के लिए पहले इस तरह की सहूलत हासिल नहीं थी. कालरा दंपती जैसे लोग ही हिंदुस्तान में न्यूरोडायवर्सिटी मूवमेंट चला रहे हैं. इनकी वजह से ही ऑटिज्म के शिकार बच्चों के मां-बाप को अपनी संतान के साथ तालमेल बिठाना और उसे ठीक ढंग से समझ पाना आसान हो पा रहा है.
ऑटिज्म असल में न्यूरोडेवलपमेंट डिसऑर्डर यानी तंत्रिका विकास से जुड़ा विकार है जो सामाजिक मेलजोल और संवाद के क्षमता पर असर डालता है. लंबे समय से न तो इसकी ठीक से पहचान की गई और न ही इस पर ध्यान दिया गया क्योंकि यह कोई विकार नहीं बल्कि कई लक्षणों का जोड़ है. यह भी जरूरी नहीं कि दो ऑटिस्टिक व्यक्तियों में लक्षण एक जैसे हों. इसलिए रोग की पहचान हरेक ऑटिस्टिक व्यक्ति के लक्षणों को दर्शाने वाले स्पेक्ट्रम यानी सतरंगी फलक पर की जाती है. इसी वजह से इसका औपचारिक नाम ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर या एएसडी पड़ा. गंभीर ऑटिस्टिक व्यक्तियों को दौरे पड़ सकते हैं, हिंसा के दौर आ सकते हैं या बोलना दूभर हो सकता है, जबकि बाकी दूसरों में हल्के और ज्यादा बारीक लक्षण हो सकते हैं, जैसे मुस्कराने से परहेज करना और आंखें मिलाने से कतराना, कुछ खास गंध या ध्वनियों के प्रति अरुचि, हाथ लहराना या बार-बार असामान्य हरकतें करना (उन्हीं हरकतों या आवाजों को दोहराना), या दूसरे बच्चों के साथ न घुलना-मिलना.
डायग्नोसिस भी मुश्किल होती है क्योंकि सामान्य आचार-व्यवहार के अनुसार सोचने और काम करने वाले यानी न्यूरोटिपिकल व्यक्ति में भी कुछ ऑटिस्टिक लक्षण दिख सकते हैं, मसलन सही उम्र में न बोलना या अंतर्मुखी होना. कहा ही जाता है न कि ''हर कोई थोड़ा ऑटिस्टिक है.’’ मगर न्यूरोटिपिकल व्यक्ति अंतत: सामान्यत स्थिति हासिल कर लेता है जबकि ऑटिस्टिक व्यक्ति अपने लक्षणों के जोड़ के साथ ताउम्र जीता है. लक्षण कितने हल्के या गहरे हैं, इसी उलझन ने इस परेशानी का पैमाना लंबे वक्त तक छिपाए रखा. 2016 में जाकर भारत में ऑटिज्म को कानून में विकलांगता के तौर पर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत शामिल किया गया. पहचान और इलाज के मौके से वंचित कइयों ने समाज के लायक बनने को लक्षणों पर परदा डालना सीख लिया और अपनी आंतरिक उलझन/उथल-पुथल को दबा दिया.
मगर इसके साफ-साफ लक्षण वाले मामले बढ़ रहे हैं. वजह? शायद सटीक डायग्नोसिस या फिर इसकी बुनियाद बनने वाले कारकों का तेजी से बढ़ना. जो भी हो, ऑटिज्म से प्रभावित लोगों की सहायता करने वाले कोलकाता स्थित एनजीओ ऐक्शन फॉर ऑटिज्म का अनुमान है कि 1.8 करोड़ भारतीय इस स्पेक्ट्रम पर आते हैं. साथ ही, ऑटिज्म की समझ और स्वीकृति भी बढ़ रही है. इसने न्यूरोडायवर्सिटी को लेकर पूरा एक आंदोलन खड़ा कर दिया है, जो मानता है कि कोई भी दो दिमाग एक ढंग से काम नहीं करते और प्रभावित लोगों को भी उसी संवेदना के साथ समझा जाना चाहिए. यह आंदोलन दूसरे वयस्क ऑटिस्टिक लोगों को भी अपनी कहानियां साझा करने को प्रेरित कर रहा है. राकेश कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि मेरा ऑटिज्म मेरी कोई कमजोरी है. बस दिमाग में तार अलग ढंग से जुड़े हैं, जिससे मैं पैटर्न पहचानने, प्रोग्रामिंग, गणित, तर्क सरीखी ढेरों चीजों में अच्छा हूं. मगर इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं क्योंकि दुनिया के बहुतसंख्य लोग तो अलग ढंग से देखते-सोचते हैं ना.’’ हालांकि उपचार से राकेश को वे क्षमताएं हासिल करने में मदद मिली जिनमें उन्हें लगता था कि वे समर्थ नहीं. ज्यादा न्यूरोडायवर्स दुनिया की उम्मीद युवा ऑटिस्टिक संतान वाली मांओं को उनके लिए जगह खोजने का हौसला दे रही है.
ऑटिज्म क्यों होता है?
दो दशक पहले बच्चा तीन साल तक बोलता नहीं था, भीड़ देखकर दुबक जाता था, या एक ही जुमला दोहराता था—सभी ऑटिस्टिक स्थिति के मुखर लक्षण—तो उसे महज शर्मीला या फिर यह कहकर खारिज कर दिया जाता कि वह ''स्मार्ट’’ नहीं है. कुछ तो इसलिए कि ऐतिहासिक रूप से लड़कियों के लिए समाज में घुलने-मिलने के सख्त कायदे थे. उनमें 'शर्मीला’ होने का गुण जरूरी था. इसकी आड़ में ऑटिज्म का होना छिपा लिया जाता था. हालांकि स्त्री-पुरुषों के बीच तंत्रिका से जुड़े फर्क होते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने डायग्नोसिस में भारी असमानता के संभावित कारक के रूप में सीधे-सादे पुराने पूर्वाग्रहों का अक्सर जिक्र किया है. अमेरिका में आज के आंकड़ों में भी हर 42 पुरुषों में से एक को और हर 189 महिलाओं में से एक को ऑटिज्म होना बताया जाता है. मगर दोनों ही मामलों में इसकी वजह क्या है?
आज वैज्ञानिकों को पता है कि ऑटिस्टिक मस्तिष्क में न्यूरॉन या स्नायु जिस तरह जुड़े होते हैं और एक दूसरे से प्रतिक्रिया करते हैं, वह सामान्य यानी न्यूरोटिपिकल मस्तिष्क से भिन्न होता है. अलबत्ता वे यह तय नहीं कर पाए हैं कि ये भिन्नताएं ठीक-ठीक हैं क्या. हमारे बोल-व्यवहार को और लोगों के बीच घुलने-मिलने की क्रिया को असंख्य नसें नियंत्रित करती हैं और हमारे दिमाग में 100 अरब से भी ज्यादा न्यूरॉन हैं. कोई मजाक है! एक थ्योरी यह है कि पहले दो साल में मस्तिष्क के विकास के दौरान तंत्रिका कोशिकाएं विकसित और नई दिशाओं में फैलते वक्त असामान्य रास्ता अपना लेती हैं. मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में कंसल्टेंट पीडिएट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट और एपिलेप्टोलॉजिस्ट डॉ. जिज्ञासा सिन्हा कहती हैं कि इससे ''बोलचाल और व्यवहार प्रभावित हो सकता है.’’
कुछ चीजें अलबत्ता साफ हो रही हैं. सबसे पहले यह कि ऑटिज्म मोटे तौर पर जेनेटिक यानी आनुवंशिक विकार है. मगर इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि आखिर मां-बाप या भाई-बहन को वह क्यों नहीं हुआ? दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में पीडिएट्रिक्स के डायरेक्टर डॉ. पी.एस. नारंग कहते हैं, ''आपके भीतर किसी विकार के प्रति पहले से झुकाव या प्रवृत्ति हो सकती है लेकिन परिवेश से जुड़े कारण भी भूमिका निभाते हैं. अभी तक ऑटिज्म के लिए हमने दुनिया में मौजूद हर चीज को दोषी ठहराया पर सचाई यह है कि हमारे पास जवाब नहीं. है तो बस यही कि ऑटिज्म कुछ जीन और परिवेश से जुड़े कारणों के मेल से होता है.’’
साइंस डायरेक्ट पत्रिका में छपे 2020 के एक अहम अध्ययन ने एएसडी के लिए 102 जींस की तरफ इशारा किया. पर इनमें से ज्यादातर जीन पहली बार देखे गए थे. किन्हीं व्यक्तियों में तो थे लेकिन उनके माता-पिता में नहीं. फिर 2022 में नेचर जेनेटिक्स में छपी सबसे बड़ी सीक्वेंसिंग स्टडी ने ऑटिस्टिक व्यक्तियों में चार जींस की पहचान की, जो माता-पिता में भी मौजूद थे. दोनों ही मामलों में आसपास के परिवेश से जुड़े कारकों ने ऑटिज्म की पहले से मौजूद आनुवंशिक प्रवृत्ति से ग्रस्त लोगों के न्यूरो सिस्टम में गड़बड़ियों का सूत्रपात किया. डॉ. सिन्हा कहती हैं, ''इसे जन्म देने वाले कुछ रिस्क फैक्टर हमें पता हैं: शुरुआत में ही जहरीले तत्व के संपर्क में आना, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, खराब मानसिक स्वास्थ्य या गर्भ की आखिरी तिमाही के दौरान मानसिक दशा.’’
अमेरिकी मेडिकल जर्नल जामा पीडिएट्रिक्स में 2022 में प्रकाशित 84,000 ऑटिस्टिक मां-बच्चों के विश्लेषण से एएसडी की वजह बनने वाला एक और तगड़ा विलेन सामने आया—स्क्रीन टाइम. पता चला कि लड़कों का एक साल की उम्र में ज्यादा लंबा स्क्रीन टाइम यानी टेलीविजन, कंप्यूटर, फोन के संपर्क में रहना तीन साल की उम्र में उनमें ऑटिज्म के उभार की बड़ी वजह बना था. लड़कियों के मुकाबले लड़कों को तीन गुना ज्यादा जोखिम का पता चला. दिल्ली के अपोलो अस्पताल में पीडिएट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट और रोज करीब 20 ऑटिस्टिक बच्चों को देखने वाली डॉ. वीणा कालरा कहती हैं, ''स्क्रीन टाइम को ऑटिज्म से बड़े पैमाने पर जोड़ा जा रहा है. मां-बाप के लिए नन्हे-मुन्नों को फोन पर राइम या कार्टून दिखाना आम बात है. बाल मस्तिष्क इतनी सारी जानकारियों को प्रोसेस करने का आदी नहीं होता. नतीजा: स्क्रीन की लत, जानकारियों की भरमार, अतिसक्रियता और शायद दिमाग के भीतर जबान और बातचीत की प्रोसेसिंग शुरू होने के तरीके को नुक्सान पहुंचने की शक्ल में सामने आता है.’’
कुछ छोटे अध्ययनों ने मां-बाप की उम्र सरीखे दूसरे पहलुओं की छानबीन की. पबमेड में छपे 2016 के अध्ययन से पता चला कि गर्भ धारण करने की उम्र के शुरू या अंत में कंसीव करने से ऑटिस्टिक बच्चे होने की ज्यादा संभावना होती है. जामा नेटवर्क के 2006 के अध्ययन के मुताबिक, 30 साल की उम्र से पहले पिता बनने वाले पुरुषों के मुकाबले 40 से ज्यादा उम्र में पिता बनने वाले पुरुषों की संतान के ऑटिस्टिक होने की संभावना छह गुना ज्यादा होती है. डॉ. नारंग कहती हैं, ''हमारे यहां चिंता की वजह इसलिए है क्योंकि इन दिनों लोग अधिक उम्र में बच्चे पैदा करना चाहते हैं. हैरानी नहीं कि हम एक दशक पहले के मुकाबले अब ज्यादा बच्चों में इसे होते देख रहे हैं.’’
अमेरिका में डायग्नोज किए गए ऑटिस्टिक व्यक्तियों की संख्या 2000 के दशक के बाद से करीब तिगुनी हो गई है. भारत में अलबत्ता ऑटिज्म सरीखी अदृश्य विकलांगताओं की गणना नहीं हुई. आइएनसीएलईएएन या इनक्लेन ट्रस्ट इंटरनेशनल के 2018 के अध्ययन में भारत में 10 साल से कम उम्र के 100 बच्चों में से एक में यह आंकी गई. न्यूरोलॉजी इंडिया पत्रिका में प्रकाशित भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के 2019 के एक अध्ययन ने भी इसी आंकड़े का हवाला दिया पर लिखा कि ऑटिज्म के फैलाव को समझने के लिए ज्यादा बड़े अध्ययन की तत्काल जरूरत है.
डायग्नोसिस में छलांग
बढ़ते बीमार लोगों और इसे लेकर जागरूकता की बदौलत शुरुआत में ही इसकी पहचान होने से ऑटिज्म की डायग्नोसिस दर में सुधार आया है. बेंगलूरू में सात वर्षीया सहाना की मां पारुल टंडन ने उसके ऑटिज्म को तभी डायग्नोज कर लिया जब वह दो साल की थी. हैदराबाद में चार वर्षीय रोहन की मां शिल्पी राव परिवार की इच्छा के खिलाफ उसे डेढ़ साल की उम्र में जांच के लिए लेकर पहुंच गईं.
डॉ. सिन्हा कहती हैं, ''माता-पिता कुछ संकेतों को पहचानकर पहले के मुकाबले अब जल्द ही जांच के लिए आ रहे हैं.’’ बोलने में देरी, नींद के मसले या पेट की परेशानियां, ठीक से आंख न मिलाना, बेचैनी और दोहरावपूर्ण व्यवहार कुछ शुरुआती संकेत हैं. वे कहती हैं, ''थोड़ा भी शक हो तो जांच करवाने में कोई हर्ज नहीं. ऐसा न हो कि फिर बहुत देर हो जाए.’’
अटककर बोलना ऑटिज्म का बेहद सामान्य संकेत है. डॉ. कालरा कहती हैं, ''एक या दो साल की उम्र तक कुछ अर्थपूर्ण शब्द बोलने लगना चाहिए. वाक्यों का दोहराव भी हो सकता है, जिसमें बच्चा भूल जाता है कि उसने क्या कहा था.’’ कई परिवार बोलने में देरी की वजह पारिवारिक पैटर्न में बताते हैं. डॉ. कालरा कहती हैं, ''संभव है, मां-बाप को हल्का ऑटिज्म रहा हो और डायग्नोज न हुआ हो. हमें इस पर सोचना शुरू करने की जरूरत है. अगर बच्चा विकास के अगले पायदान तक नहीं पहुंचता है तो हमें पक्का करना होगा कि कोई और मसला तो नहीं.’’ पहले साल में नींद का असामान्य पैटर्न एक और लक्षण है, जिसे समझने से मां-बाप चूक जाते हैं और गलती से इसे दूध की एलर्जी या पेट दर्द मान लेते हैं.
डॉक्टरों का जोर है कि अंतिम डायग्नोसिस कोई प्रोफेशनल ही करे न कि साधारण व्यक्ति या इंटरनेट. खुशकिस्मती से भारतीय शहरों में आज न्यूरोलॉजिकल बालरोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक बच्चे के विकास के पैटर्न का आकलन करके खतरे से आगाह कर सकते हैं. डॉ. सिन्हा बताती हैं, ''अगर हमें खतरे के संकेत पता हैं तो हम पूरा मनोवैज्ञानिक आकलन करते हैं. हमारे पास एक साल से कम उम्र के बच्चे के लिए भी साइकोलॉजिकल एसेसमेंट है.’’ यह बेहद जरूरी है कि ऐसी डायग्नोसिस जल्द हो क्योंकि ऑटिज्म पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, न ही पलटा जा सकता है, पर इसके बढऩे को रोका जा सकता है.
इलाज में तरक्की
49 वर्षीया सुकन्या घोष याद करती हैं कि 18 साल पहले जब वे अपनी साल भर की ऑटिस्टिक बेटी के लिए इलाज खोज रही थीं तो खुद को बंद गली के मुहाने पर खड़ा पाया. कोलकाता की यह गृहिणी बताती हैं, ''बेटी को बोलने में दिक्कत होती थी और अचानक दौरे पड़ते थे. कई इलाज बताए गए: जड़ी-बूटियां खिलाना, कमरे में बंद करके बोलने को मजबूर करना, दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय करने के लिए सिर की भयंकर मालिश वगैरह.’’ परिवार अंतत: इसके लिए अमेरिका गया.
आज मदद भारत में ही मुमकिन है. सभी उपायों का मकसद बच्चे को इतना आत्मनिर्भर बनाना है कि वह स्वस्थ जीवन जी सके. डॉ. सिन्हा कहती हैं, ''व्यवहार के मामले में हम इलाज नहीं तलाशते. इसे केवल रूपांतरित किया जा सकता है.’’ इसके लिए कुछ इलाज मिलाकर इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें ऑक्यूपेशनल थेरेपी, डेवलपमेंटल थेरेपी, बिहैवियरल थेरेपी, ग्रुप थेरेपी, सेंसरी इंटीग्रेशन, स्पीच थेरेपी और खास तरह की शिक्षा शामिल है. डॉ. सिन्हा के शब्दों में, ''चीजों को एक साथ काम करना होता है. हमारे स्पीच थेरेपी करने से पहले जरूरी है कि बच्चे थोड़ी देर के लिए ध्यान एकाग्र होने लगें. यह काम ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के जरिए मुमकिन है. एक के बिना दूसरा बेकार. इसमें पूरी टीम को लगना होगा.’’ एप्लाइड बिहैवियरल एनालिसिस (एबीए) भी होता है, जिसमें भाषाई, सामाजिक और रोजमर्रा के जीवनयापन के हुनर विकसित करने को व्यक्ति विशेष के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
इसके अलावा, डॉक्टर सामान्यत: घर पर इलाज जारी रखने की सिफारिश करते हैं. बेंगलूरू के फोर्टिस अस्पताल में चाइल्ड ऐंड एडोलसेंट साइकिएट्री की कंसल्टेंट डॉ. मेघा महाजन कहती हैं, ''केंद्र में आपको हफ्ते में महज एक घंटे का इलाज मिल सकता है. मगर ऑटिस्टिक बच्चों को 36 घंटों के इलाज की जरूरत होती है. मां-बाप की कोशिशों के बिना हम कामयाब नहीं हो सकते.’’ अच्छी तरह तय दिनचर्या, संतुलित आहार और अचानक कुछ उलटा-पुलटा न कर डालने से इलाज का असर बढ़ाने में मदद मिलती है. डॉ. महाजन ऑटिस्टिक बच्चों के माता-पिता को आगाह करती हैं कि सब कुछ खुद-ब-खुद करने की कोशिश न करें. ''कुछ ऑनलाइन कक्षाओं में चले जाते हैं और घर पर ही पूरा इलाज करने की कोशिश करते हैं, जो ठीक नहीं. न ही अप्रामाणिक इलाज करना ठीक है, जैसे यह मिथ कि ऊंट के दूध से मदद मिलती है.’’
हकीकत यह है कि ऑटिज्म का कोई इलाज नहीं. दवाइयां केवल ऑटिस्टिक मरीजों की ध्यान एकाग्र करने की क्षमता बढ़ाने की मंशा से दी जाती हैं. डॉ. नारंग कहते हैं, ''जब ध्यान एकाग्र करने की अवधि कम होती है, जब ऑटिस्टिक व्यक्तियों को सोने में दिक्कत होती है या उन्हें मिर्गी के दौरे पड़ते हैं, तो उन्हें अस्थायी दवाओं की जरूरत होती है.’’ केवल हल्के लक्षण वाले मामलों में स्थिति को लगभग पूरी तरह संभाला जा सकता है.
चाहिए न्यूरोडायवर्स स्कूल
समावेशी और स्कूली परिवेश में ऐसी दिक्कतों को लेकर सहज रवैया अपनाया जाना जरूरी है. ऑटिज्म सामाजिक मेलजोल और बात-व्यवहार की योग्यता न होने के रूप में सामने आता है. यह बुद्धि या अक्लमंदी का पैमाना नहीं है. कई ऑटिस्टिक लोगों का इंटेलिजेंस कोशेंट या आइक्यू काफी ज्यादा होता है. उन्हें जरूरत है तो बस स्कूलों में न्यूरोडायवर्स वातावरण की. पारिवारिक चिकित्सक और लेखिका डॉ. शैलजा सेन कहती हैं, ''अगर स्कूल न्यूरोडायवर्सिटी को गले लगाते हैं, तो एकजुटता, समावेशन और भिन्नताओं को समझने की भावना ज्यादा होती है. कुछ शिक्षक बच्चे के फलने-फूलने के लिए ज्यादा सुरक्षित जगह बनाते हैं.’’ बच्चे को समाज के लायक न होने के लिए दोषी ठहराने का जमाना काफी पहले बीत गया. डॉ. सेन जोड़ती हैं, ''मगर हर स्कूल यह नहीं समझते कि अलग-अलग बच्चे अलग-अलग रफ्तार से सीखते हैं.’’
कुछ लोग ही इस बारे में की जाने वाली कोशिशों को आगे बढ़ा रहे हैं. बदकिस्मती से भारत में खास किस्म की शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है. मुंबई के बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल की प्रिंसिपल सुनीता जॉर्ज कहती हैं, ''शिक्षकों को ऑटिस्टिक बच्चों को संभालने का हुनर सिखाना होगा. मसलन, उन्हें चीजें आराम से करने देना जरूरी है. हमारे यहां ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने उनके लिए विशेष परीक्षा कार्यक्रम तैयार किए, ताकि उन्हें बीच-बीच में ब्रेक मिल सके. कुछ संवेदनशील हैं और कोशिश करते हैं, पर दूसरे नहीं करते.’’
एक और चुनौती समाज में घुल-मिल न पाने की है. कई न्यूरोडायवर्स बच्चों को तो डराया-धमकाया जाता है. जॉर्ज कहती हैं, ''यह आम तौर पर कक्षा 5 और 6 के आसपास होता है. इसे संभालना मुश्किल हो जाता है. बड़े होकर तो वे ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं.’’ अभिभावक भी उन्हें डराते-धमकाते, धौंस देते हैं. दिल्ली के एक निजी स्कूल की प्रिंसिपल स्वीकारती हैं कि माता-पिता के कुछ व्हाट्सऐप ग्रुपों में कही गई बातों से वे कभी-कभी भयभीत हो जाती हैं. ''यहां तक कि अगर किसी ऑटिस्टिक बच्चे ने कुछ गलत नहीं किया, तब भी वे मुरव्वत नहीं दिखाते.’’ वे सवाल करती हैं, ''अगर माता-पिता ही इतने असंवेदनशील हों तो हम बच्चे को कैसे जोड़ें?’’ वे यह भी कहती हैं कि कई मां-बाप बच्चे को विशेष जरूरत वाले बच्चों के साथ बिठाने पर एतराज करते और अक्सर शिक्षकों को डराते-धमकाते हैं.
दूसरे मामलों में कोशिशों के बेहद संभावनाशील नतीजे मिले. दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर दिनेश सिंह कहते हैं, ''दिल्ली विश्वविद्यालय में हम विशेष जरूरत प्रकोष्ठ चलाते थे, जो एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत विशेष जरूरत वाले बच्चों को हर साल विदेश भेजा करता था. इससे उन्हें काफी आत्मविश्वास मिलता था और समाज में घुलने-मिलने की क्षमता बढ़ जाती थी.’’ ज्यादातर शिक्षाविद् मानते हैं कि स्कूलों को न्यूरोडायवर्स बनाने के लिए हमें ढांचे की जररूत है. सिंह कहते हैं, ''मैं समझता हूं यह भविष्य में होगा. मगर जब इतनी बड़ी तादाद हो तो समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते.’’
कई माता-पिता बच्चों को खास किस्म की शिक्षा वाले स्कूलों में भेजते हैं. ये संस्थाएं बोर्ड का प्रमाणपत्र नहीं देतीं, लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग से डिग्री लेना आसान बना सकती हैं. इंदौर के 18 वर्षीय समर मिलन की मां कहती हैं, ''कई माता-पिता बच्चे पर नियमित स्कूल में जाने के लिए दबाव डालते हैं, जहां उन पर जरूरत के मुताबिक ध्यान नहीं दिया जाता. लोग क्या सोचते हैं, यह मायने क्यों रखना चाहिए? तुम्हारे बच्चे में सुधार आ रहा है, तो ध्यान इसी पर होना चाहिए.’’ चिकित्सक भी समावेशन और एकीकरण के बीच फर्क बताते हैं. समावेशन में बच्चा स्कूल में न्यूरोटिपिकल या कहें कि सामान्य बच्चों के बीच बैठ सकता है. पर एकीकरण वह है जिसमें उन्हें अपने आसपास की दुनिया के साथ सीखने और बातचीत करने में मदद दी जाती है. ज्यादातर नियमित स्कूल दोनों ही नहीं दे पाते क्योंकि ऑटिस्टिक बच्चों को सबके लिए अलग किस्म के शिक्षण कार्यक्रमों, विशेष शिक्षकों और संवेदनशील साथियों की जरूरत होती है.
सहायता के नए क्षेत्र
रोग की पहचान और इलाज में सुधार के बावजूद ऑटिस्टिक बच्चों और उनके माता-पिता का संघर्ष जारी है. पहली बात तो यही कि उन्नत इलाज खासा महंगा है. इलाज, विशेष शिक्षा की फीस और अक्सर नियमित स्कूल में शैडो टीचर के लिए भुगतान करना होता है. कोई भी बीमा पॉलिसी भारत में इसका इलाज कवर नहीं करती. इम्तिहान में रियायत हासिल करने को ऑटिस्टिक बच्चे को सरकारी अस्पताल से प्रमाणपत्र लेना होता है. 13 वर्षीय माधव की मम्मी मुग्धा कालरा कहती हैं, ''ऑटिज्म इतने अलग-अलग तरीकों से प्रकट होता है कि इसे ऑटिज्म के रूप में प्रमाणित करने के लिए उन्हें कई बैठकें करनी पड़ती हैं. माधव ने इस प्रक्रिया में 14 बैठकें कीं.’’ वयस्क होने के बाद बच्चों को सहारा देने की अपनी प्रक्रिया है. ज्यादातर मां-बाप अपने कानूनी अभिभावक होने या ट्रस्ट फंड बनाने को अर्जी देते हैं, जिसके लिए उनके 18 साल का होने के बाद फिर विकलांगता प्रमाणपत्र की जरूरत होती है.
ऑटिस्टिक व्यक्तियों और उनकी देखभाल करने वालों को भारी भावनात्मक कीमत भी चुकानी पड़ती है. माताएं कई गुना ज्यादा अपराध बोध ढोती हैं. उन्हें दोषी ठहराया, शर्मिंदा किया जाता है. रोहन की मां शिल्पी कहती हैं, ''मुझे हमेशा लगता था कि मैं पर्याप्त कोशिश नहीं कर रही हूं. एक अरसे तक तो मेरा पूरा समय एक से दूसरे डॉक्टर तक दौड़ते बीता. पति ने इस जिम्मेदारी में हाथ बंटाने की सोची ही नहीं, बल्कि मेरी नाकामियां गिनाईं.’’ मां-बाप को तनाव में देखकर बच्चे की भावनात्मक उलझन और बढ़ जाती है. माता-पिता और ऑटिस्टिक बच्चे दोनों के अक्सर अवसाद से पीड़ित होने का पता चलता है.
अलबत्ता भारत और विदेश दोनों में एक सुसंगठित ऑटिस्टिक समुदाय उन लोगों के लिए उपयोगी सहायता समूह बन गया है जिनका बच्चा ऑटिस्टिक है या जो खुद ऑटिस्टिक हैं. शिल्पी कहती हैं, ''मैं ऑटिस्टिक बच्चों की मांओं से कहती हूं कि खुद का ख्याल रखें. इसकी वजह आप बिल्कुल नहीं हैं. आपको भी आराम करने का और अपने पूरे काम पर गर्व करने का हक है.’’ न्यूरोडायवर्स कम्युनिटी से जुड़कर राकेश को मनोबल बढ़ाने में मदद मिली. वे कहते हैं, ''मैं उनमें से हरेक में अपना अंश देखता हूं और अपनेपन का यह एहसास ही भला-चंगा बनाता है.’’
कई संगठन रोजगार खोजने में ऑटिज्म से ग्रस्त लोगों की मदद करते हैं और उन्हें एक मकसद के साथ जीने का एहसास देते हैं. ऐक्शन फॉर ऑटिज्म के पास 600 लोगों को प्रशिक्षण देने और फिर उन्हें नौकरी दिलवाने के लिए कोलकाता के पास आवासीय परिसर है. उसकी सीनियर प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर सखी सिंघी कहती हैं, ''हम ऑटिस्टिक लोगों की मदद करने और उन्हें संभालने का प्रशिक्षण देने के लिए कंपनियों और नियमित तथा विशेष स्कूलों में भी जाते हैं.’’ वहां सीखे कुछ लोग अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कला केंद्रों में काम कर रहे हैं.
पश्चिम ने ऑटिज्म के इर्द-गिर्द पसरे कलंक और लांछन से दशकों संघर्ष किया, ताकि न्यूरोडायवर्सिटी के लिए सकारात्मक जगह बना सके. टीका-विरोधी आंदोलन (जो ऑटिज्म को टीकाकरण के मुख्य जोखिमों में से एक बताकर प्रचारित करते थे) और ऐसी कई चीजों ने न्यूरोडायवर्सिटी के प्रति एक किस्म का डर पैदा दिया. उसमें इसे बुनियादी तौर पर अवांछित स्थिति के रूप में देखा जाता था, एक ऐसी 'बीमारी’ के रूप में, जिसका उन्मूलन कर दिया जाना था. ऑटिज्म के हिमायती समूहों पर भी 'समर्थवादी’ विमर्श में हिस्सा लेने और उसे बल देने का आरोप लगा. मगर अब यह एहसास बढ़ रहा है कि सभी लोगों में न्यूरोलॉजिकल वायरिंग एक-सी नहीं होती और सभी को जगह और सम्मान देने की जरूरत है. भारत भी उस दिशा में बढ़ता दिख रहा है. यही ऑटिस्टिक बच्चों के मां-बाप को कुछ उम्मीद बंधाता है.

