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शांति की धुंधलाती उम्मीद

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह अब राज्य की सत्ता को संभालते दिख भी नहीं रहे. बागडोर केंद्र के ही हाथों में है

आगे की राह इंफाल वैली से सटे हिंसाग्रस्त इलाकों में गश्त करते सुरक्षाबल के जवान
आगे की राह इंफाल वैली से सटे हिंसाग्रस्त इलाकों में गश्त करते सुरक्षाबल के जवान
अपडेटेड 9 जून , 2023

सिद्धांत मोहन, इंफाल में

मई, 29. रात के 9 बजकर 5 मिनट पर जब देश के गृहमंत्री अमित शाह का हवाई जहाज मणिपुर में उतरा तो इंफाल में बैठे एक पत्रकार के फोन की घंटी बजी. उठाने पर दूसरी ओर से छितराई हुई हिंदी में आवाज आई, ''अमित शाह कुछ बोला क्या? इंटरनेट कब चालू होगा?''

गृहमंत्री के हवाले से इस सवाल का जवाब तो नहीं मिला, लेकिन 1 जून की अपनी प्रेसवार्ता में उन्होंने साफ कर दिया कि मणिपुर में हो रही हिंसा की जांच हाइकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में गठित आयोग करेगा. इसके साथ उन्होंने शांति की अपील भी की. लेकिन गृहमंत्री के बयानों के सापेक्ष देखें तो मैतेई और कुकी समुदायों के बीच बीते एक महीने से भी ज्यादा समय से हो रही हिंसा का अभी कोई अंत नहीं दिख रहा. जिस समय वे मणिपुर में थे, उसी समय राजधानी इंफाल में कुकी समुदाय के एक घर में आग लगा दी गई. किसने लगाई? किसी ने नहीं देखा.

इस दौरान शाह ने प्रभावित सभी गुटों से मिलने की कोशिश की. लेकिन गृहमंत्री और उनकी टीम का सामना इनकी कई मांगों से हुआ. मैतेई समुदाय की सबसे अहम मांग है कि राज्य में एनआरसी लागू किया जाए ताकि गैरकानूनी शरणार्थियों की शिनाख्त हो सके. दूसरी ओर कुकी समुदाय एक अलग कुकीलैंड की मांग कर रहा है. एक अलग राज्य की. क्यों अलग राज्य? चुराचंद्रपुर में रहने वाले अध्यापक डीलन कहते हैं, ''दोनों समुदायों के बीच विभाजन की फांक इतनी गहरी है कि हमारा एक साथ रह पाना लगभग असंभव है. कुकी कहते हैं कि उन्हें एक अलग प्रशासन चाहिए. मणिपुर से अलग.''

लेकिन घाटी में मौजूद मैतेई इससे अलग तरीके से सोचते हैं. 28-29 मई के दिन चंदेल इलाके के सुगनू में कुकी और मैतेई के बीच हिंसा शुरू हुई. लोग घर छोड़कर भागने लगे. सुगनू से मोइरांग इलाके में कई सारे मैतेई भीड़ लगाकर सुगनू से बचकर आ रहे मैतेई लोगों का स्वागत करते हुए दिखते हैं. इनके बीच मौजूद सरिता कहती हैं, ''मणिपुर बस मैतेई लोगों का है. सब कुकी लोगों को यहां से भगा दो.'' उसी समय उनके पीछे मैतेई लड़कों का हुजूम वापस सुगनू की ओर जा रहा था. सुगनू तो पूरी तरह से जल चुका था तो वापस वहां जाने की क्या जरूरत थी? सरिता ने जवाब दिया, ''ये हमारा मैतेई लड़का लोग लड़ाई करने जा रहा है.'' शरणार्थियों को दिलासा देने वाली भीड़ फ्रंटलाइन पर जाने वाले लड़कों का साहस भी बढ़ा रही थी.

मैतेई और कुकी समुदाय के लोग एक दूसरे पर अत्याधुनिक हथियार होने के आरोप लगा रहे हैं. हालिया हिंसा में यह बात जाहिर भी हुई है लेकिन उपद्रवियों के पास ये हथियार आए कहां से? दरअसल एक अरसा पहले कुकी समुदायों के बीच पहाड़ियों में कुछ उग्रवादियों ने कब्जा कर लिया. इनमें से अधिकांश गैर-कानूनी तरीके से म्यांमार से आए थे. वे मणिपुर की पहाड़ियों पर अफीम की खेती करने लगे तो उग्रवाद और ड्रग्स का एक घातक कॉकटैल तैयार हो गया. फिर नशे की सुरक्षा के लिए हथियार आए तो और स्थिति और घातक हो गई. तो कुकी उग्रवादियों के पास थे अत्याधुनिक हथियार. और आम कुकी समुदाय के पास हैं 12 बोर की बंदूकें, कुछ तमंचे, कुछ हैंडमेड तोपें और गुलेल. गुलेल के बारे में कहा जाता है कि गोली से तो बचा भी जा सकता है, मणिपुरी की गुलेल से बचना नामुमकिन है.

लेकिन मैतेई समुदाय के पास हथियार कैसे आए? 3-4 मई की हिंसा के बाद इंफाल में लूट हुई. मैतेई समुदाय के लोगों ने मणिपुर पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, पुलिस थानों और इंडिया रिजर्व बटालियन (आईआरबी) के कैंप से हथियार लूट लिए. कुकी-मैतेई युद्ध में दोनों ही पक्ष दांत-नाखूनों तक हथियारबंद हैं.

फिर जब बीरेन सिंह की सरकार ने 'नशे पर हमला' और 'अवैध लोगों को निकालने' का दावा किया तो स्थिति और घातक हो गई. अफीम के खेत उजाड़े जाने लगे और कुकी समुदाय के लोगों को अवैध शरणार्थी करार देकर पहाड़ियों से बेदखल किया जाने लगा. इधर हाइ कोर्ट ने मैतेई समुदाय के लोगों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए सर्वे कराने का आदेश भी दे दिया तो कुकी समुदाय को उनके इलाकों में मैतेई आबादी के बसने का डर सताने लगा. इन्हीं बातों को लेकर 3 मई को छात्र संगठन ऑल ट्राइबल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर ने 3 मई को 'आदिवासी एकजुटता मार्च' का आह्वान किया. मार्च के समर्थन में हजारों लोगों ने रैली निकाली. अलग-अलग इलाकों में रैली निकाली गई. कई जगह रैली शांतिपूर्ण रही और कई जगह इसने हिंसक रूप ले लिया.

अब सारी लड़ाई इस बात पर आकर टिक गई है कि कैसे इन समुदायों को हथियारों से मुक्त किया जाए ताकि हिंसा रोकी जा सके. इसको लेकर हर पक्ष की निगाह केंद्र सरकार और केंद्रीय बलों पर जाकर टिक गई है. कुकी और मैतेई समुदाय के लोग ही नहीं, अब तो कई विधायक भी कहने लगे हैं कि बीरेन सिंह से यदि स्थिति नहीं संभाली गई तो राष्ट्रपति शासन लगाकर शांति लानी चाहिए. निर्दलीय विधायक निशिकांत सपम कहते हैं, ''एक विधायक के तौर पर मुझे राष्ट्रपति शासन सही फैसला नहीं लगेगा, लेकिन स्थिति नहीं संभाली जाती तो चारा ही क्या बचता है?'' और घटनाक्रम देखें तो बीरेन सिंह अब राज्य की सत्ता को संभालते दिख भी नहीं रहे. चीजें मुख्यत: केंद्र के पास चली गई हैं. अधिकतर फैसले राजभवन से किए जा रहे हैं. फील्ड में सीआरपीएफ, असम राइफल्स और इंडियन आर्मी की टुकड़ियां ज्यादा दिखती हैं. कुकी और मैतेई दोनों ही इन आर्म्ड फोर्सेस पर सामने वाली पार्टी के साथ मिले होने का आरोप लगाते हैं.

केंद्र सरकार से तेज उपाय की उम्मीद करना भी बेमानी नहीं है क्योंकि अशांति फैलाने वालों की नजर उखरुल और सेनापति के इलाकों पर कभी भी जा सकती है; ये इलाके 1993 के नगा-कुकी संघर्ष में जल चुके हैं और गनीमत है कि हालिया तनाव से अछूते हैं. 

ऐसे में केंद्रीय गृहमंत्री के दौरे में कितनी उम्मीद देखी जा सकती है, लोग कितने बेसब्र हैं एक आरामदेह और कर्फ्यू मुक्त मणिपुर के लिए, उसका जवाब स्थानीय ड्राइवर रॉनल्ड देते हैं: ''मेरे को रोज फोन पर ये आंसर नहीं देना है कि मैं जिंदा है. मेरे को इंस्टाग्राम पर आराम से रील देखना है.''

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