अब जब विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर रह गए हैं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने आरक्षित तबकों के भीतर छोटे-छोटे समूहों को रिझाने की कोशिशें तेज कर दी हैं. बहुत कुछ उसी तरह जैसे पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार कर रही है, जहां इसी साल नवंबर में चुनाव होने हैं.
ग्वालियर में 16 अप्रैल को एक रैली में बोलते हुए चौहान ने अनुसूचित जातियों (एससी) के भीतर दो उपजातियों—कोरियों और जाटवों—के लिए कल्याण बोर्ड बनाने के मंसूबे का ऐलान किया. इससे पहले 5 अप्रैल को सरकार ने अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में आने वाले रजक (धोबी), तेलघानी (साहू-राठौड़ या तेली समुदाय), विश्वकर्मा (बढ़ई) और स्वर्णकार (सोनी या 'जौहरी' समुदाय) के लिए चार कल्याण बोर्ड बनाने का फरमान जारी किया. घोषित लक्ष्य इन समुदायों के ''युवाओं के लिए रोजगार और स्व-रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना'' है. मगर ज्यादा अहम यह कि यह कदम इन सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े समूहों को राज्य की शासन व्यवस्था में नुमाइंदगी देगा, क्योंकि हर बोर्ड का अध्यक्ष उसी समुदाय से होगा और उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलेगा.
इनमें से कुछेक ओबीसी समूहों की छत्तीसगढ़ में अच्छी-खासी तादाद है. राज्य में भूपेश बघेल की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने दो समूहों की नजर-ए-इनायत हासिल करने के लिए दरअसल 2021 में ही तेलघानी बोर्ड और रजक कल्याण बोर्ड का गठन कर दिया था. विपक्षी भाजपा भी छत्तीसगढ़ में साहू समुदाय को रिझाने में जुटी है. मसलन, पिछले साल उसने समुदाय के नेता और बिलासपुर से लोकसभा सदस्य अरुण साव को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया.
हाल में अदालत में पेश राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश की आबादी में ओबीसी 50.1 फीसद हैं (2011 की जनगणना के आधार पर). मगर सामाजिक के बजाय आर्थिक गुट होने के नाते वे एक साथ एक ढंग से वोट नहीं देते. यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार की तरह मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार भी बिल्कुल छोटे-छोटे स्तरों पर ओबीसी वोटों को साध रही है. भाजपा के प्रवक्ता राहुल कोठारी कहते हैं, ''छोटे-छोटे ओबीसी धड़े काफी वक्त से प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे थे और भाजपा ने बोर्डों का गठन करके इन्हीं मांगों का सम्मान किया है.''
ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं है जो ओबीसी के भीतर निश्चित धड़ों की आबादी बताता हो. इसीलिए, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में विभिन्न ओबीसी समूहों की नुमाइंदगी करने वाले वकील रामेश्वर सिंह बताते हैं कि राजनैतिक पार्टियां वोटर लिस्ट में दर्ज नामों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र में हरेक समुदाय की संख्या और शक्ति के बारे में 'मोटा-मोटी अनुमान' निकालती हैं. इन अनुमानों के हिसाब से तीन सबसे बड़े धड़े यादव, लोधी और कुर्मी हैं. मगर राजनैतिक पार्टियां और भी आगे जाकर छोटे-छोटे धड़ों तक पहुंचने का जतन कर रही हैं. सिंह दावा करते हैं, ''यहां तक कि कांग्रेस ने भी अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाले छोटे-छोटे समूहों को टिकट देने का फैसला किया है ताकि विधानसभा में उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जा सके.''
रजक कल्याण बोर्ड के गठन से खासकर मध्य प्रदेश के धोबी समुदाय का दिल जीतने की उम्मीद है, जो एससी दर्जे की मांग कर रहा है. मगर ऐसा नहीं है कि भाजपा को अचानक इन ओबीसी धड़ों और उनकी आकांक्षाओं की सुध आई हो. मुख्यमंत्री के पद पर शिवराज चौहान का यह चौथा कार्यकाल है और अपने दूसरे कार्यकाल (2008-13) से ही वे अपने आवास पर समुदाय विशेष की बैठकें आयोजित करते रहे हैं. यहां तक कि चार ओबीसी बोर्ड बनाने के ऐलान से पहले भी उन्होंने मार्च में विश्वकर्मा सम्मेलन में हिस्सा लिया और 2 अप्रैल को साहू समुदाय को संबोधित किया.
मगर क्या यह कदम वोटों में तब्दील होगा? वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक टिप्पणीकार रशीद किदवई कहते हैं, ''मेरा अनुभव तो यही कहता है कि चुनाव के साल में ऐसी रेवड़ियों से सत्तारूढ़ पार्टी का कम ही भला होता है. लाभान्वित समुदाय का वोट तो कल्याण के मामले में सरकार के साफ और पुख्ता ट्रैक रिकॉर्ड से ही मिलता है.'' किदवई यह भी कहते हैं कि बोर्डों के गठन से एक और मौजूं सवाल पैदा होता है. सत्तारूढ़ पार्टी को यह कदम उठाने में 18 साल क्यों लगे?

