पश्चिम बंगाल के हावड़ा और हुगली जिलों में 29 और 30 मार्च को रामनवमी समारोहों के दौरान हिंसा के बाद भाजपा ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर 'हिंदुओं की भावनाएं आहत करने' का आरोप लगाया. ऐसा करके भाजपा दरअसल ममता पर अपने पुराने आरोप यानी 'मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति' की ओर इशारा कर रही थी. टीएमसी ने न केवल इन आरोपों का खंडन किया बल्कि भाजपा पर सांप्रदायिक हिंसा फैलाने का आरोप लगाया और खासकर जुलूसों में हथियारबंद 'अपराधियों और बाहरी लोगों' को घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया.
आरोप-प्रत्यारोप के इस ताजा दौर के बावजूद अपने विरोधियों पर अहम सियासी बढ़त हासिल करने के लिए ममता की नजरें बंगाल की 27.5 फीसद मुस्लिम आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) पर टिकी हैं. अल्पसंख्यक केंद्रित योजनाओं के लिए बजट में भारी-भरकम आवंटन से लेकर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ आंदोलनों के खुलकर समर्थन से ममता ने अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के हरसंभव प्रयास किए हैं. भाजपा का उग्र हिंदुत्व भी बंगाल में ताकत बढ़ाने की उसकी कोशिशों में एक बाधा बना हुआ है. पर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही 65 मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों, जिसमें 13 बंगाल के हैं, में मोदी मित्र अभियान और स्नेह सम्मेलनों के जरिए मुस्लिमों में पहुंच बढ़ाने के प्रयास कर रहे हों, ममता उनसे कहीं बेहतर स्थिति में दिख रही हैं.
दरअसल, बीते एक साल के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा का चुनावी ग्राफ गिरा है और एक के बाद एक उपचुनावों में उसका वोट शेयर 2021 के विधानसभा चुनावों में 38 फीसद से घटकर लगभग 14-15 फीसद पर पहुंच गया है. लेकिन कमजोर होती भाजपा भी टीएमसी के लिए चिंता का विषय ही है क्योंकि उसका मुस्लिम वोट शेयर भाजपा की संभावित ताकत के अनुपात में ही बढ़ता-घटता है. सीएसडीएस लोकनीति के चुनाव-बाद सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य में साल 2016 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा कोई फैक्टर नहीं थी तब टीएमसी को कुल मुस्लिम वोटों का 51 फीसद हिस्सा हासिल हुआ था.
वहीं साल 2019 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाली मजबूत और आक्रामक भाजपा के साथ मुकाबला होने पर टीएमसी को क्रमश: 70 फीसद और 75 फीसद मुस्लिम वोट हासिल हुए. कोलकाता स्थित टीपू सुल्तान मस्जिद के पूर्व शाही इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती कहते हैं, ''हमारे लिए चुनना आसान हो गया है. अल्पसंख्यक उस पार्टी की तरफ जाते हैं जो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है. और ममता इसकी गारंटी देने में कामयाब रही हैं.''
वहीं, 61 फीसद मुस्लिम आबादी वाले मुर्शिदाबाद जिले की सागरदिघी सीट पर उपचुनाव में टीएमसी की हार और वाम-समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी की जीत के बाद मुस्लिम वोटबैंक के कांग्रेस और वाम दलों की ओर खिसकने की आशंकाओं से घिरी ममता तुरंत ऐक्शन में आ गईं. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री पद से गुलाम रब्बानी को हटाकर यह प्रभार खुद मुख्यमंत्री ने संभाल लिया. फिलहाल, ममता उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना जिलों के बांग्लादेश सीमा से लगे इलाकों में अवैध आधार कार्ड रद्द करने संबंधी हालिया केंद्रीय अधिसूचना के नाम पर एनआरसी और सीएए को लेकर आशंकाओं को हवा देने की कोशिशों में जुटी हैं. वे सवाल उठाती हैं, ''कार्ड को अपडेट और रद्द करने के लिए उन्होंने खास जगहों को ही क्यों चुना है?'' अपने महत्वपूर्ण वोट बैंक को बनाए रखने के लिए यह उनकी नई रणनीति है.

