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फिर भी संतुलन कायम

अस्थिरता दिखी पर अदाणी समूह की फर्मों के संकट में होने के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में टिकाऊपन कैसे बना हुआ है? मौजूदा दौर कब तक जारी रहेगा?

चलता बाजार : मुंबई में 27 जनवरी को बीएसई की बिल्डिंग के सामने से गुजरते लोग
चलता बाजार : मुंबई में 27 जनवरी को बीएसई की बिल्डिंग के सामने से गुजरते लोग
अपडेटेड 1 मार्च , 2023

अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च ने 24 जनवरी को एक छोटा-मोटा भूचाल सा ला दिया जब इसने भारत के सबसे बड़े व्यापारिक समूहों में से एक अदाणी समूह के बारे में एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकशित की. इस रिपोर्ट में हिंडनबर्ग ने कई आरोप लगाए हैं जिनमें टैक्स हेवन माने जाने वाले देशों में स्थित शेल फर्मों के माध्यम से और बही-खातों में गड़बड़झाला करके, ग्रुप की ओर से अपनी कंपनियों के शेयरों में हेरफेर करना शामिल था. अदाणी एंटरप्राइजेज जिस समय अपने फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर को लॉन्च करने की योजना बना रहा था, उसके ठीक पहले हुए इस खुलासे के बाद समूह की नौ सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों की बिकवाली तेज हो गई. इससे उनकी कीमतें भारतीय बाजारों में औंधे मुंह गिर गईं. इसने न केवल निवेशकों को 120 अरब डॉलर (लगभग 10 लाख करोड़ रुपए) का नुक्सान हुआ, बल्कि एक सप्ताह के भीतर कंपनियों की बाजार पूंजी भी घटकर आधी हो गई. हालांकि अदाणी समूह ने बाद में अपने स्टॉक की कीमतों में भारी गिरावट को रोक लिया क्योंकि समूह की फर्मों ने मजबूत तिमाही परिणाम दिखाए और समूह की तीन फर्मों—अदाणी पोर्ट्स विशेष आर्थिक क्षेत्र (एपीएसईजेड), अदाणी ग्रीन एनर्जी और अदाणी ट्रांसमिशन—में गिरवी शेयर छुड़ाने के लिए 1 अरब डॉलर (लगभग 8,280 करोड़ रुपए) से अधिक का भुगतान किया लेकिन कुछ कंपनियों के शेयर की कीमतें गिरती रहीं.

जब इतने बड़े आकार का स्टॉक संकट, जिसने एक कॉर्पोरेट दिग्गज, जिसका बुनियादी ढांचे और हरित ऊर्जा—दोनों मोदी सरकार के प्रिय क्षेत्र हैं—में भारी निवेश के साथ विविध क्षेत्रों में निवेश है, उसे इतना बड़ा आघात पहुंचा तो लोगों ने शेयर बाजारों में तगड़ी गिरावट की आशंका जताई. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद दिखी शुरुआती गिरावट के बाद और केंद्रीय बजट पेश किए जाने के दौरान भारतीय बाजार सकारात्मक रहे. यहां तक कि हिंडनबर्ग विस्फोट के बाद बीएसई पर रिकॉर्ड किए गए दो सप्ताह के शेयर कारोबार के आंकड़ों ने बेंचमार्क सेंसेक्स में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाई. इस तरह की बड़ी आर्थिक घटनाओं के बाद बाजार आम तौर पर जो प्रतिक्रिया देते हैं, यह उसके उलट था. उदाहरण के लिए, जब 2000 में डॉटकॉम बुलबुला फूटा था, भारतीय शेयर बाजार दो सप्ताह में 4.7 प्रतिशत गिर गया था.

एक साल बाद, चुनिंदा शेयरों की कीमत में हेरफेर करने का केतन पारेख घोटाला हुआ तब बाजार में एक पखवाड़े के भीतर 13 फीसद की गिरावट देखी गई थी. 2001 में जब न्यूयॉर्क में ट्विन टावर गिरे, तो भारत में दो सप्ताह में बाजार 11.3 फीसद तक गिर गया. 2018 में नीरव मोदी घोटाले में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट देखी गई और उसी साल आइएलऐंडएफएस संकट, जिसमें बुनियादी ढांचाक्षेत्र के ऋणदाता के भुगतान में चूकने का सेक्टर पर दूरगामी प्रभाव हुआ और एक पखवाड़े में बाजार में 9.5 प्रतिशत की गिरावट देखी गई (नकारात्मक प्रतिक्रिया देखें). इसके उलट, बीएसई सेंसेक्स 20 फरवरी को 60,672 अंक पर था, जो 24 जनवरी के 60,978 अंक से मामूली नीचे था. 
 
सब कुछ पहले जैसा चल रहा है 

हिंडनबर्ग विस्फोट के लगभग एक महीने बाद, 20 फरवरी तक अदाणी समूह की कंपनियों के कुल इक्विटी मूल्य में लगभग 135 अरब डॉलर (11 लाख करोड़ रुपए से अधिक) की गिरावट देखी गई, जिसमें सबसे अधिक मार अदाणी टोटल गैस को पड़ी. अदाणी समूह की नौ सूचीबद्ध फर्मों का कुल मार्केट-कैप 20 फरवरी को 8.27 लाख करोड़ रुपए था, जो 24 जनवरी को 19.18 लाख करोड़ रुपए के आधे से भी कम था. अदाणी टोटल गैस के शेयर जो 24 जनवरी को 3,885.45 रुपए पर थे वे 20 फरवरी को गिरकर 925.10 रुपए पर कारोबार कर रहे थे, यानी उनमें 76 फीसद की गिरावट दर्ज की गई. फर्म का बाजार पूंजीकरण या एम-कैप 24 जनवरी को 4.27 लाख करोड़ रुपए से गिरकर 20 फरवरी को 1.01 लाख करोड़ रुपए हो गया.

अदाणी के शेयरों में इतनी गिरावट के बावजूद, बाजार के सूचकांक संकट से दूर क्यों दिखाई दे रहे हैं? पहला कारण तो यह कि निवेशक अदाणी की समस्याओं को केवल अदाणी समूह तक सीमित देखते हैं और उसका पूरे कॉर्पोरेट जगत पर कोई खास प्रभाव नहीं होने वाला. इसके अलावा, कुछ साल पहले की तुलना में अदाणी ग्रुप के बड़े परिसंपत्ति आधार और भारतीय बैंकों के कम जोखिम सहित, समूह की बुनियादी स्थिति (फंडामेंटल्स) पर अधिक तथ्यों को जानने के बाद, बड़े संस्थागत निवेशक धीरे-धीरे अधिक आश्वस्त नजर आ रहे हैं. देश के मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल भी मजबूत बने हुए हैं. हालांकि महंगाई का खतरा पूरी तरह से कम नहीं हुआ है, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) इसे 6 फीसद की ऊपरी सीमा के करीब रखने में सफल रहा है. 2022-23 के लिए अनुमानित भारत की 7 फीसद की विकास दर को दुनिया भर के अधिकांश बड़े देशों की तुलना में बेहतर माना जाता है और अर्थव्यवस्था लचीली लगती है. हाल के आर्थिक सर्वेक्षण में 2023-24 में विकास दर 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है.

एक अन्य कारण सूचकांकों पर अदाणी के शेयरों का कम भारांक (वेटेज) है. केजरीवाल रिसर्च ऐंड इन्वेस्टमेंट सर्विसेज के संस्थापक अरुण केजरीवाल कहते हैं, ''अदाणी समूह की नौ सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण, बेंचमार्क सूचकांकों—निफ्टी या सेंसेक्स—के बाजार पूंजीकरण का एक प्रतिशत भी नहीं है.'' एक ही कंपनी है जिसकी मार्केटकैप बड़ी है, वह अदाणी एंटरप्राइजेज है. लेकिन हमें अदाणी एंटरप्राइजेज के मूल्य में गिरावट को इसलिए ज्यादा तरजीह नहीं देनी चाहिए क्योंकि यह मुख्य रूप अदाणी के परिवार और प्रमोटर की कंपनी है. कंपनी में प्रमोटर और परिवार की करीब 72.6 फीसद हिस्सेदारी है. इसलिए, इसमें आई गिरावट से निवेशक प्रभावित नहीं होंगे.'' इसका मतलब यह है कि खुदरा निवेशक इन कंपनियों के साथ होने वाली घटनाओं से अछूते हैं. अदाणी एंटरप्राइजेज के अलावा, चार अन्य फर्मों—अदाणी ट्रांसमिशन, अदाणी टोटल गैस, अदाणी ग्रीन एनर्जी और अदाणी पावर—ने 24 जनवरी से बहुत ज्यादा बाजार पूंजी गंवाई है. अदाणी पावर और अदाणी ट्रांसमिशन में प्रमोटरों की क्रमश: 75 फीसद और 74.2 फीसद हिस्सेदारी है.

दूसरी ओर, एपीएसईजेड व्यापक रूप से निवेशकों के पास है जिसमें परिवार का स्वामित्व 65 फीसद है. केजरीवाल कहते हैं, ''एपीएसईजेड के शेयरों ने अपना स्तर पा लिया है. दो सीमेंट कंपनियों को हाल ही में (स्विस फर्म होल्सिम से) अधिग्रहीत किया गया था और जिस कीमत पर उनके शेयर ट्रेड कर रहे हैं वह उनके अधिग्रहण मूल्य से अधिक हैं. इस बीच, अदाणी विल्मर की कीमत गिर गई है, लेकिन अब इसकी ट्रेडिंग सहज तरीके से हो रही है. अदाणी पावर के पास भी महत्वपूर्ण खुदरा निवेशक हैं.'' मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खुदरा निवेशकों के 24 जनवरी को अदाणी समूह की सूचीबद्ध फर्मों (पिछले साल अधिग्रहीत एनडीटीवी सहित) में 54,066 करोड़ रुपए लगे थे. अदाणी पावर में खुदरा निवेशक दिसंबर के अंत में सबसे अधिक 5.7 फीसद थे.

अन्य विशेषज्ञ भी समूह की कंपनियों में कम खुदरा हिस्सेदारी की ओर इशारा करते हैं. एक प्रमुख म्यूचुअल फंड के प्रमुख कहते हैं, ''अदाणी की सूचीबद्ध फर्मों के शेयरों की शायद ही कोई सार्वजनिक हिस्सेदारी है और हिंडनबर्ग ने जो आरोप लगाए थे, उनमें एक यह भी था. अगर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सही है, तो शेयर बाजार में अतीत में हुए सभी लाभ अदाणी को गए हैं, और सभी नुक्सान भी उन्हें ही झेलने पड़े हैं.'' अदाणी के शेयरों में गिरावट का असर खुदरा निवेशकों पर बहुत कम पड़ा है.

बहरहाल, जब नौ सूचीबद्ध कंपनियों वाले एक बड़े औद्योगिक समूह में हलचल होती है, तो क्या उसके झटके नीचे महसूस नहीं किए जाते हैं? आखिर अदाणी समूह देश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट संचालक है जो 25 फीसद यात्री परिवहन और 40 फीसद हवाई कार्गो को संभालता है; 30 फीसद बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा बंदरगाह और लॉजिस्टिक संचालक; सबसे बड़ी एकीकृत ऊर्जा कंपनी, दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट निर्माता और सबसे बड़ा खाद्य तेल निर्माता है.

बुनियादी रूप से मजबूत  

अगर अदाणी के झमेले का बाजार पर असर पड़ा भी है, तो विशेषज्ञों की नजर में यह अल्पावधि का था. बाजार के खिलाड़ी ऐसे तीन कारकों को रेखांकित करते हैं जो शेयर बाजार को चलाते हैं—फ्लो यानी प्रवाह (धन का आना और जाना), सेंटिमेंट यानी भावना और फंडामेंटल्स यानी बुनियादी स्थिति. पहले दो (फ्लो और सेंटिमेंट) का बाजार पर अल्पकालिक प्रभाव पड़ता है, फंडामेंटल्स का दीर्घकालिक प्रभाव होता है. एक सूत्र का कहना है, ''अदाणी समूह महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्र में है, लेकिन 3.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान एक प्रतिशत भी नहीं है.'' उनका यह भी कहना है कि अदाणी की कंपनियों का 17,000 करोड़ रुपए का मुनाफा भारतीय कॉर्पोरेट्स के कुल 10 लाख करोड़ रुपए के मुनाफे का बहुत छोटा हिस्सा है. जहां तक सेंटिमेंट्स की बात है, निवेशक अदाणी के झटके से बच गए हैं क्योंकि कई लोगों ने अदाणी के शेयरों में निवेश के जोखिमों को भांप लिया था. म्यूचुअल फंड उद्योग के सूत्रों का कहना है कि अदाणी समूह के शेयरों में उनका कोई निवेश नहीं है क्योंकि स्थानीय निवेशक अपना पैसा कंपनी के शेयरों में लगाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे.

इस बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स यानी बुनियाद मजबूत है, जो बड़े पैमाने पर सकारात्मक शेयर सूचकांकों में दिखता है. डेलॉयट इंडिया की डायरेक्टर और मैक्रोइकोनॉमिस्ट रुमकी मजूमदार का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की बैलेंस शीट में सुधार हुआ है, जिसका अर्थ है कि यह खर्च बढ़ाने के लिए तैयार है और जो निवेश चक्र के व्यवस्थित होने पर पूंजीगत व्यय को बढ़ा सकता है. जनवरी में डेलॉयट की ''भारत-आर्थिक दृष्टिकोण'' रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए वे बताती हैं, ''उच्च वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) और प्रत्यक्ष कर संग्रह ने सरकार को खर्च करने और आसन्न वैश्विक मंदी का असर घटाने और अर्थव्यवस्था को उछाल देने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान किया है.''

संपन्न वर्ग के बीच उपभोक्ता मांग मजबूत बनी हुई है जो खुदरा उद्योग में मजबूत वृद्धि और हाल की तिमाहियों में मुख्य उपभोक्ता सामग्री और कंज्यूमर डिस्क्रीशनरी (महंगी उपभोक्ता वस्तुओं) कंपनियों द्वारा बेहतर लाभ के प्रदर्शन से साफ है. चुनौतियों की बात करें तो मजूमदार के मुताबिक महंगाई और वैश्विक मंदी की आशंका बड़ी चिंताएं हैं क्योंकि केंद्रीय बैंकों के ब्याज दरें बढ़ाने पर यह असर सामने आता है और इसके अलावा श्रम बाजार में सुधार की जरूरत है.

आगे क्या होगा 

शेयर बाजारों का यह टिकाऊपन कब तक जारी रहेगा है? हालांकि ऐसा लगता है कि शेयर बाजार अदाणी प्रकरण के चलते पैदा हुए तात्कालिक संकट से बच गए हैं, लेकिन आने वाले हफ्तों और महीनों में यहां काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. कोटक महिंद्रा ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी के एमडी नीलेश शाह कहते हैं, ''अगले 12 से 18 महीनों के लिए शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव चलता रहेगा.'' उनके मुताबिक, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और वृद्धि, मई 2024 में भारत के आम चुनाव, कोविड के बाद चीन के दुनिया के लिए फिर से खुल जाने और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का शेयर बाजार पर प्रभाव पड़ेगा. अगर यूक्रेन युद्ध और तेज नहीं होता, या 2024 में भारत में एक स्थिर सरकार आती है, तो बाजार सकारात्मक बने रहेंगे. शाह कहते हैं, ''भारत की विकास गाथा से जुड़ी सकारात्मक धारणा का शेयर बाजार को फायदा मिलता है.''

केजरीवाल इस तर्क का समर्थन करते हैं. वे कहते हैं, ''अगर हम अदाणी प्रकरण के बावजूद इतनी मजबूत स्थिति में हैं, तो यह हमारे बाजार की अंतर्निहित ताकत को दर्शाता है. एसआइपी के जरिए पैसे आने से म्यूचुअल फंड मजबूत हो रहे हैं और म्यूचुअल फंड में निवेशकों का योगदान उच्चतम स्तर पर है. महीने-दर-महीने, हम भारी मात्रा में आवक देखते हैं और विदेशी जो कुछ भी बेचते हैं उसे घरेलू संस्थान खरीद लेते हैं.'' हालांकि आरबीआइ ने पिछले एक साल में कई बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है, फिर भी वे अमेरिका की बढ़त की तुलना में केवल आधी थीं. यह भी एक सकारात्मक बात है.

भारतीय बाजारों ने दिखाया है कि वे सबसे बड़े संकट से बच सकते हैं. उन्हें अनिश्चितता से भरी दुनिया में आकर्षक बनाना चाहिए. लेकिन आत्मसंतोष में भरकर ढिलाई के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि देश और दुनिया के निवेशक भी आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति को बहुत गहराई से परखेंगे. 

बाजार क्यों डटा रहा

निवेशकों को लगता है कि अदाणी संकट सिर्फ इस कॉर्पोरेट समूह का मामला है, इसका असर पूरे कॉर्पोरेट जगत पर नहीं पड़ेगा 

भारत के मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं. वित्त वर्ष 2023 के लिए भारत की विकास दर 7 फीसद रहने का अनुमान है, जो कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर है 

सूचकांकों पर अदाणी के शेयरों का वेटेज कम है. समूह की नौ सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण शेयर बाजारों के कुल पूंजीकरण का एक फीसद से भी कम है 

अदाणी समूह की कुछ कंपनियों में प्रमोटरों की ऊंची हिस्सेदारी (करीब 75 फीसद तक) का मतलब है, खुदरा निवेशकों की कम हिस्सेदारी, यानी कुल मिलाकर निवेशकों पर कम असर 

कई निवेशकों ने अदाणी की कंपनियों में निवेश का जोखिम भांप लिया और ऊंची प्रमोटर हिस्सेदारी व ज्यादा जोखिम वाली कंपनियों से दूरी बना ली है

''भारत की विकास गाथा से उपजे सेंटिमेंट से शेयर बाजारों को मजबूती मिल रही है''  
नीलेश शाह
एमडी, कोटक महिंद्रा ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी

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