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जीत के बाद भी जद्दोजहद जारी

वास्तव में दिल्ली के मेयर का चुनाव अगर इतनी जल्दी हो सका तो उसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही है

आखिरकार... आप की नेता शैली ओबेराय मेयर (सफेद शर्ट और काली जैकेट में) चुनाव जीतने के बाद नगर निगम में खुशी जाहिर करते हुए
आखिरकार... आप की नेता शैली ओबेराय मेयर (सफेद शर्ट और काली जैकेट में) चुनाव जीतने के बाद नगर निगम में खुशी जाहिर करते हुए
अपडेटेड 1 मार्च , 2023

नगर निगम चुनाव जीतने के करीब ढाई महीने बाद चौथी बैठक में आम आदमी पार्टी ने मेयर चुनाव में जीत हासिल की. आम आदमी पार्टी के नेता आदिल अहमद खान एस्केलेटर के पास खड़े होकर पुलिस और सुरक्षा बलों के सामने जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, ''विजेंद्र गुप्ता (भाजपा नेता) को नीचे लाओ, गुप्ता को किस हैसियत से जाने दिया?'' और वहां पार्टी कार्यकर्ता भी उनकी आवाज बुलंद कर रहे थे. यह नजारा 22 फरवरी को सुबह 11 बजे जवाहरलाल नेहरू मार्ग स्थित दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के मुख्यालय सिविक सेंटर का जहां था, जहां मेयर का चुनाव हो रहा था.

खान का सुरक्षाबलों से झगड़ना यह बता रहा था कि आम आदमी पार्टी किस तरह आने-जाने वालों पर सतर्कता से नजर रख रही थी. हालांकि मेयर चुनाव बिल्कुल शांति के साथ हुआ लेकिन उसके बाद पूरी रात मारपीट और हुंगामा हुआ. 39 वर्षीया शैली ओबेराय के मेयर चुने जाने की सूचना आई तो 'जीत गए भई जीत गए, झाड़ू वाले जीत गए, हार गए भाई हार गए, सारे गुंडे हार गए' नारा लगाते हुए कैमरों से घिरे 10-12 लोग बाहर निकले. इसके बाद वहां मौजूद मीडियाकर्मियों को बयान देने वाले नेताओं की लाइन लग गई.

लेकिन असली कहानी ओबेराय की है जो सियासी जिंदगी में एक नए मुकाम पर पहुंचीं. कुल पड़े 266 वोटों में से ओबेराय को 150 और भाजपा की मेयर प्रत्याशी रेखा गुप्ता को 116 वोट मिले. कांग्रेस मतदान से गायब रही. 

जीत के बाद ओबेराय ने कहा, ''मैं सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद करना चाहती हूं जिनके निर्णय की वजह से शांतिपूर्वक चुनाव हो पाया और दिल्ली को मेयर मिला. यह लोकतंत्र और संविधान की जीत है.'' वास्तव में यह सब इतनी जल्दी हो सका है तो उसकी वजह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है. 7 दिसंबर, 2022 को चुनाव नतीजे आने के बाद नगर निगम की तीन बैठकें हुईं, लेकिन हंगामे की वजह से मेयर-डिप्टी मेयर का चुनाव नहीं हो सका. बहुमत के नाते चुनाव नतीजों के बाद पहली बैठक में ही आप के मेयर, डिप्टी मेयर चुने जाने चाहिए थे. एमसीडी के 250 वार्डों के चुनाव नतीजों में आप को 134, भाजपा को 104 और कांग्रेस को नौ सीटें हासिल हुईं.

असली हंगामा उस वक्त बरपा जब उपराज्यपाल (एलजी) ने 10 पार्षद मनोनीत कर दिए और सदन में उनसे मतदान कराने की कोशिशें दिखने लगीं. इससे मेयर का चुनाव टलता रहा. ओबेराय की याचिका पर 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मेयर चुनाव में एलजी की ओर से नियुक्त 10 मनोनीत सदस्य (एल्डरमैन) मतदान नहीं करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 293 आर का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि मनोनीत पार्षद वोट नहीं दे सकते. कोर्ट ने 24 घंटे के भीतर मेयर चुनाव की तारीख बताने का आदेश भी दिया. इसके बाद दिल्ली सरकार और एलजी ने मेयर चुनाव के लिए 22 फरवरी की तारीख तय की. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा, ''एलजी साहब और भाजपा असंवैधानिक तरीके से भाजपा का मेयर बनाने का षड्यंत्र कर रहे थे, उसको सुप्रीम कोर्ट ने नाकाम कर दिया है.''

भाजपा के पास मेयर बनाने लायक संख्याबल नहीं था लेकिन माना जाता है कि दलबदल कानून नगर निगम या स्थानीय निकाय में लागू न होने की वजह से उसकी उम्मीदों को पंख लगे क्योंकि पार्षदों के दलबदल करने से उसकी सदन की सदस्यता पर कोई खतरा नहीं होता. अगर 10 मनोनीत सदस्य वोट डाल देते तो शायद भाजपा अपनी उम्मीदों को सिरे चढ़ाने का प्रयास कर भी लेती लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया. मेयर चुनाव के लिए सुबह साढ़े दस बजे सिविक सेंटर में भाजपा प्रत्याशी रेखा गुप्ता ने अपनी जीत का दावा तो किया लेकिन संख्या के बिना वे कैसे जीतेंगी, इस सवाल पर उन्होंने कहा, ''पार्षद अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर वोट देंगे.'' जाहिर है हालात का अंदाजा उन्हें था. भाजपा सांसद हंसराज हंस और मनोज तिवारी भी जब वोट डालकर निकले तो उन्होंने कहा कि आज दिल्ली को मेयर मिल जाएगा. आप के तीनों राज्यसभा सांसद चुनाव तक सदन में ही रहे. बता दें कि मेयर चुनाव के मतदाताओं में दिल्ली के सात लोकसभा सांसद, तीन राज्यसभा सांसद और 14 विधायक (सदन की संख्या का पांचवां हिस्सा) शामिल हैं और इन्होंने भी अपना वोट डाला. 13 विधायक आप के और एक भाजपा का.

बीस साल बाद दिल्ली को तीन के बजाए एक मेयर मिला है. 19 अप्रैल, 2012 को नगर निगम तीन भागों में बांट दिया गया था. इसके बाद दिल्ली में 2020 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी. आप की सरकार बनने के बाद से ही उसका केंद्र की तत्कालीन यूपीए और बाद में भाजपा की सरकारों से लगातार टकराव होता रहा. बाद में हुए एमसीडी चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की. लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में आप की जीत से भाजपा परेशान हो गई. निगम चुनाव को परिसीमन के नाम पर पहले तो टाला गया और तीन टुकड़ों में बंटे दिल्ली नगर निगम को 2022 में केंद्र सरकार ने फिर से एक कर दिया और अचानक ही नगर निगम चुनाव भी करवा दिया.

इन कोशिशों की बावजूद चुनाव नतीजे भाजपा के लिए बेहतर नहीं हुए. निगम भाजपा के हाथ से निकल गया. फिर मेयर चुनाव पर विवाद शुरू हुआ. पार्षद ओबेराय के मेयर और आले इकबाल के डिप्टी मेयर बनने के बाद स्थायी समिति सदस्यों के चुनाव के लिए 22 फरवरी को पूरी रात पार्षदों के बीच लात-घूंसे, बोतलें चलीं और सुबह साढ़े आठ बजे तक 14 बार कार्यवाही स्थगित हुई. ताकतवर स्थायी समिति पर भाजपा और आप दोनों काबिज होना चाहती हैं. 

बहरहाल, मेयर चुनाव के बाद भी टकराव कम नहीं होने वाला. दर्शनशास्त्र में पीएचडी ओबेराय का कार्यकाल मेयर रोस्टर के मुताबिक 31 मार्च तक यानी 38 दिन का है. अप्रैल में फिर मेयर का चुनाव होगा और उसमें सियासी पैंतरेबाजी और टकराव के अंदेशे से इनकार नहीं किया जा सकता.

पर आम जनता को फिक्र है कि राजनैतिक दबदबे की लड़ाई में दिल्ली के कूड़े के पहाड़ कहीं और ऊंचे न हो जाएं.

सुप्रीम कोर्ट ने दी व्यवस्था

❶ दिल्ली नगर निगम में मनोनीत पार्षद (एल्डरमैन) मेयर, डिप्टी मेयर और स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव में वोट नहीं डालेंगे

❷ मेयर चुनाव की अधिसूचना 24 घंटे में जारी की जाए

❸ चुने जाने के बाद मेयर ही डिप्टी मेयर और स्टैंडिंग कमेटी के छह सदस्यों का चुनाव कराएगा

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