अरुण पुरी
जासूसी शायद अनादिकाल से होती आ रही है. देश एक दूसरे की जासूसी करते हैं, सरकारें अपने नागरिकों की, राजनैतिक पार्टियां एक दूसरी की और कंपनियां औद्योगिक रहस्यों के लिए जासूसी करती हैं. टेक्नोलॉजी और खासकर इंटरनेट के आगमन के साथ अलबत्ता जासूसी इनसान पर कम और तकनीक पर ज्यादा निर्भर हो गई है. अब जब हम तमाम उपकरणों के जरिए आपस में इतने जुड़े हैं, अपनी निजी स्पेस में सेंध लगाए जाने को लेकर हम असुरक्षित भी हैं. मासूम-से दिखते एलेक्सा सरीखे उपकरण भी आपके बारे में आपसे ज्यादा जानते हैं. अलबत्ता जासूसी का ताजातरीन अंदेशा कहीं और से आया है और इसने सरकार को झकझोर दिया है.
जनवरी के आखिर में चीन का एक 'मौसमी गुब्बारा' अमेरिकी आसमान में ऊंचे उड़ता दिखा. ठेठ अलास्का से दक्षिण कैरोलिना तक 60,000 फुट की अविश्वसनीय ऊंचाई पर तेज हवाओं के साथ. मगर भारत के कूटनीतिक विशेषज्ञों को फिलहाल जो चीज परेशान कर रही है, वह करीब ही है: क्लोज्ड सर्किट टेलीविजन कैमरा या सीसीटीवी. वही जो एलिवेटर या एटीएम किओस्क में आपको हर वक्त ताड़ता है.
दुनिया के ज्यादातर सीसीटीवी चीनी मूल के हैं. दुनिया भर में इनकी अव्वल सप्लायर दो फर्म हिकविजन और डहुआ हैं, जिनकी कुछ मिल्कियत चीनी सरकार के पास है. क्या ये जासूसी के औजार हो सकते हैं? इसी फिक्र ने वाशिंगटन में खतरे की घंटी बजा दी और जवाबी कदम उठाने को उकसाया. 2019 में अमेरिका ने सरकार और बुनियादी ढांचे के अहम प्रतिष्ठानों में हिकविजन, डहुआ और हुवावे के उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी. पिछले साल ब्रिटेन ने भी यही किया. पिछले पखवाड़े ऑस्ट्रेलिया भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गया. बर्फीली ऊंचाइयों पर टकराव के बाद चीनी फुसफुसाहटें भारत भी आ पहुंचीं. अचानक आंख मलकर हमने यह हकीकत पहचानी कि हमारे बाजार में चीन निर्मित सीसीटीवी कैमरों का बोलबाला है. घरेलू इस्तेमाल में 80 फीसद तक और सैन्य परिसरों सहित सरकारी प्रतिष्ठानों में 98 फीसद से ज्यादा यही कैमरे हैं.
लंबे समय से जमीनी संदर्भ में सोचने के अभ्यस्त भारत के रणनीतिक प्रतिष्ठान को शायद देर से इलहाम हुआ कि युद्ध के तौर-तरीके अब बिल्कुल असामान्य किस्म के हो गए हैं. खतरा अब गलवान या यांग्त्से की बर्फीली ऊंचाइयों तक सीमित नहीं रहा. घुसपैठ जमीन पर होने की बजाए कहीं ज्यादा अमूर्त हो सकती है. हमारे ऊपर गड़ी चीनी नजर सर्वव्यापी है और यह कहीं ज्यादा गूढ़ और रहस्यमयी हो गई है. इस कहानी के डरावने पहलुओं को जस का तस मान लें तो महज एक नहीं बीस लाख आंखें सड़क-चौराहों से लेकर बेशकीमती रक्षा प्रतिष्ठानों तक हर जगह हमें ताक रही हैं.
करीब दस लाख कैमरे सरकारी प्रतिष्ठानों में लगे हैं और भारत की नागरिक जिंदगी दूसरे दस लाख की जद में है. निजी बंगलों से लेकर दिल्ली की सड़कों पर लगे 1,50,000 सीसीटीवी कैमरों को और दिल्ली मेट्रो तथा एसपीजी में इस्तेमाल कैमरों से लेकर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड तथा डीआरडीओ की ग्राहकी के मार्फत अत्यंत संवेदनशील रक्षा स्थलों पर लगे तमाम कैमरों तक सभी को गिन लीजिए. और जैसी कि इस हफ्ते की सीनियर एडिटर प्रदीप आर. सागर की आवरण कथा बताती है कि रक्षा मंत्रालय के मई 2021 के एक आंतरिक नोट में अनमनेपन से बताया गया कि भारत के तमाम नौसैन्य प्रतिष्ठानों में चीन निर्मित निगरानी कैमरे लगे हैं.
लगता है सीसीटीवी अपने कथित मासूम स्वरूप के चलते पहले दुनिया भर की रणनीतिक चौकसी से बच निकले. 'क्लोज्ड सर्किट टेलीविजन कैमरा' में सर्किट अगर उतने क्लोज्ड या बंद नहीं होते जितनी सबने कल्पना की थी, तो क्या होता? सीसीटीवी तेजी से लोकल एरिया नेटवर्क से जुड़े कैमरे से कहीं ज्यादा हो गया है. आज की वीडियो निगरानी प्रणालियां डेटा संग्रह के लिए अक्सर नेटवर्क वीडियो रिकॉर्डर (एनवीआर) पर निर्भर करती हैं और ये इंटरनेट प्रोटोकॉल कैमरों के साथ काम करते हैं, न कि पुराने एनालॉग कैमरों के साथ. हायर डेफिनिशन, वैरिफोकल या पैन-टिल्ट-जूम इमेजिंग और ऑनबोर्ड वीडियो एनैलिटिक्स सरीखी तकनीकी तौर पर उन्नत खूबियों की पेशकश करने के अलावा आइपी कैमरे नेटवर्क से जुड़ी डिवाइस हैं. वे कंट्रोल डेटा हासिल करने और विजुअल डेटा भेजने के लिए बनाई गई हैं. खासकर ये इनमें लगे परिष्कृत एकीकृत सर्किट के साथ आती हैं, जिसे सिस्टम-ऑन-चिप (एसओसी) कहा जाता है.
इसी एसओसी के वैश्विक बाजार में कुतूहल जगाने वाला एक नाम हाइसिलिकन है. यह हुवावे के पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है और इसने चीनी जासूसी के औजार के तौर पर काम करने के आरोपों के साथ कुख्याति हासिल की थी. इसीलिए भारत सहित कई 5जी बाजारों में इस पर पाबंदी लगा दी गई. 2004 में स्थापित हाइसिलिकन आरऐंडडी में भारी निवेश की बदौलत इस वैश्विक खेल के शिखर पर आ गई. यहां तक कि यह अमेरिका में बने हनीवेल कैमरों में भी पहुंच गई. मगर तभी अमेरिका के 2020 के निर्यात नियंत्रण आदेश ने इसे अमेरिकी चिप डिजाइन सॉफ्टवेयर और ताइवान स्थित ''फाउंडरियों'' तक पहुंचने से रोक दिया. मगर खामोशी से टिक-टिक करती हाइसिलिकन चिप हमारे बीच हर जगह मौजूद है. जानकार एक दशक से ज्यादा वक्त से चीनियों की साइबर ताक-झांक के तमाम रूपों की प्रेतछाया को लेकर आगाह करते रहे हैं. मगर इस माइक्रो डिवाइस को हाल ही में देर से बजी खतरे की घंटी के बीच संभावित नायक का ताज पहनाया गया है, जिसने संवेदनशील सैन्य डेटा के बीजिंग जाने के अंदेशों के साथ इस वक्त दिल्ली को अपनी चपेट में ले रखा है.
बेशक बीस लाख सीसीटीवी कैमरों को हमारी प्रणालियों पर आंच आने दिए बगैर रातो-रात अरब महासागर में तो नहीं फेंका जा सकता. तो समाधान क्या है? तिहरा रास्ता भारत के आगे है. सबसे पहले, उन्हें समेटने की शुरुआत हो चुकी है. दक्षिणी नौसेना कमान हिकविजन के सीसीटीवी चरणबद्ध तरीके से हटा रही है. हमें 'मेक इन इंडिया' भागीदारियों के जरिए पिछले दरवाजे से की जा रही डिजिटल ताक-झांक के खिलाफ कानूनी रक्षाकवचों की भी जरूरत है. साथ ही साइबर विशेषज्ञ भी टेक्नोलॉजी का मुकाबला सबसे पहले चीनी चिप की भारतीय सॉफ्टवेयर के साथ रीप्रोग्रामिंग करके कर रहे हैं. जब तक भारत अपने अत्यधिक गुणवत्ता के सीसीटीवी बना सके, ऐसी टेस्टिंग प्रणालियां स्थापित करनी चाहिए जो किसी भी विदेशी उपकरण में ताक-झांक करने वाली माइक्रो डिवाइस की मौजूदगी का पता लगा सकें, वे चीन की बनी हों या कहीं और की. जासूसी अब भी रहस्यमयी तमाशा है, पर चिप और नेट के साथ यह ज्यादा खतरनाक हो गया है.

