राजनीति में किस बात का कितना गहरा असर हो सकता है, भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद यह बात अच्छी तरह समझते हैं. 12 फरवरी को उन्होंने भोपाल में ओबीसी, दलित और आदिवासी समूहों की एक विशाल रैली का आयोजन किया.
उन्होंने ऐलान किया कि उनकी आजाद समाज पार्टी (एएसपी) मध्य प्रदेश में सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अगर जीतती है तो वंचित तबके से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री चुनेगी. पिछले महीने भोपाल में करणी सेना परिवार का एक आरक्षण विरोधी मार्च निकाला गया था जिसमें जाति-आधारित आरक्षण जारी रखने के लिए भाजपा की आलोचना की गई थी. उसी मार्च के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के इरादे से यह रैली आयोजित की गई थी.
विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं, और आजाद पिछड़ों, अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को लामबंद करने की कोशिश में जुटे हैं. बसपा उनकी राह में एक प्रमुख चुनौती है, जो खुद को वंचित समूहों की मुखर आवाज बताती है. वहीं, कांग्रेस-भाजपा के लिए मुश्किलें थोड़ी बढ़ गई हैं. पिछले महीने करणी सेना की रैली ने जहां कांग्रेस को खुश कर दिया, वहीं भोपाल में आजाद की रैली ने भाजपा की बांछें खिला दीं क्योंकि इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगने का खतरा उत्पन्न हो गया है.
प्रदेश में किंगमेकर की भूमिका में आने के लिए आजाद को एससी-एसटी वोटबैंक का बड़ा हिस्सा अपनी मुट्ठी में करना होगा. उनकी रैली भले कितनी भव्य क्यों न दिखी हो, पर असल में कोई बदलाव इसी पर निर्भर करेगा कि उनकी पार्टी चुनाव से पहले जमीनी स्तर पर क्या करती है.

