धवल कुलकर्णी
असल में किसी को हैरानी नहीं हुई जब 17 फरवरी को भारत के चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे की अगुआई वाले गुट को 'असली' शिवसेना के रूप में मान्यता दी और उसे पार्टी के मूल सिंबल—धनुष और तीर को अपने पास बनाए रखने की अनुमति दे दी. उद्धव ठाकरे को और तगड़ा झटका देते हुए आयोग ने फैसला सुनाया कि उद्धव 'शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)' नाम को इस महीने के आखिर में होने वाले दो विधानसभा उपचुनावों तक ही बरकरार रख सकते हैं. 'मशाल' सिंबल के लिए भी ऐसा ही कहा गया, जिसे चुनाव आयोग ने उन्हें 10 अक्तूबर, 2022 को आवंटित किया था.
इसका मतलब यह है कि उद्धव को अपनी पार्टी के लिए नए नाम और चुनाव चिह्न की तलाश करनी पड़ सकती है. उनके पास पार्टी के 56 विधायकों में से केवल 16 और 19 लोकसभा सांसदों में से छह ही बचे हैं. वहीं, भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र में सरकार की अगुआई कर रहे शिंदे अब 'आधिकारिक' शिवसेना के कर्ताधर्ता हैं.
आयोग ने विधायी बहुमत को देखते हुए शिंदे को वह सिंबल आवंटित किया. मुख्यमंत्री शिंदे को 67 विधायकों और एमएलसी में से 40 और 22 लोकसभा तथा राज्यसभा सांसदों में से 13 का स्पष्ट समर्थन हासिल है.
उम्मीद के मुताबिक, आयोग के फैसले को लेकर उद्धव कैंप में नाराजगी है. उद्धव ने आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उसे भंग करने तक की मांग कर डाली. राज्यसभा सांसद संजय राउत ने उस पर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी सिंबल और नाम को करीब 2,000 करोड़ रुपए में सौदा करके 'बेच' दिया गया. उद्धव गुट अब सुप्रीम कोर्ट चला गया है जो पहले से महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन की वैधता को लेकर कई याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है. वे सवाल कर रहे हैं कि मामला अभी जब विचाराधीन है तो आयोग फैसला कैसे ले सकता है.
आयोग का फैसला ऐसे वक्त में आया है जब शिंदे-भाजपा सरकार कस्बा पेठ और चिंचवाड़ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) के खिलाफ प्रतिष्ठा की जंग लड़ रही है. सत्तासीन भाजपा के खिलाफ एमवीए की ओर से दोनों जगहों पर क्रमश: कांग्रेस और एनसीपी चुनावी मुकाबले में हैं. दोनों पुणे बेल्ट में हैं जहां सेना का पारंपरिक मुंबइया प्रभाव बिखरा हुआ है, खासकर कस्बा पेठ में जो शहर के भीतर है.
लेकिन यह अपनी पार्टी का नाम और सिंबल—जो दशकों से सेना के प्रथम परिवार से कभी अलग नहीं माना जाता रहा है—खोने के उद्धव कैंप के सदमे के सामने कम मायने रखता है. उद्धव के दादा और कार्यकर्ता 'प्रबोधनकर' केशव सीताराम ठाकरे ने संगठन का नाम सुझाया था. 1989 में पार्टी को 'धनुष्यबाण' आवंटित किया गया था, और मुंबई के मतदाताओं के बीच उसका मजबूत असर था. मराठवाड़ा सरीखे इलाकों में, जहां धार्मिक दरारें गहरी थीं, वोटरों को परोक्ष रूप से भड़काया जाता था—'खान हवा, का बाण हवा (मुसलमानों की जीत चाहते हो या धनुष और बाण की?).' अब शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की सच्ची विरासत का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले शिंदे दोनों को साथ ले जा रहे हैं. ऐसे में उद्धव और उनके बेटे आदित्य को शून्य से शुरुआत करनी है.
वहीं, शिंदे खेमे में खुशी का माहौल है. अब शिंदे कैंप में शामिल एक पूर्व लोकसभा सांसद कहते हैं, ''शिवसेना की विरासत को लेकर चल रही जंग के नतीजे पर चुनाव आयोग के फैसले का सकारात्मक असर पड़ेगा. तटस्थ और दुविधा में रह रहे लोग अब हमारी तरफ आ जाएंगे.'' शिंदे गुट के ही एक अन्य लोकसभा सांसद इससे इत्तेफाक रखते हैं, ''जब असल चुनाव मुकाबलों की बात आती है तो पार्टी के सिंबल के प्रति लोगों में मजबूत निष्ठा और छाप होती है, खासकर मराठवाड़ा सरीखे इलाकों में. चाहे उम्मीदवार कोई भी हो, लोग धनुष और बाण को आंख मूंदकर वोट देते हैं. इसके नतीजतन उद्धवजी के कुछ लोग हमारे पास आ सकते हैं. इन घटनाक्रमों से कांग्रेस और एनसीपी पर उनकी निर्भरता भी बढ़ सकती है तथा यह सांप्रदायिक तनाव के इतिहास वाले इलाकों में उनके गुट की अपील को प्रभावित कर सकता है.''
तो क्या उद्धव और उनके बाकी बचे वफादारों के लिए सब कुछ खत्म हो गया है? शायद नहीं. शिंदे के पास विधायकों के समूह के बड़े हिस्से का समर्थन हो सकता है और अब उनके गुट को आधिकारिक शिवसेना की मान्यता भी मिल गई है, लेकिन पार्टी संगठन मोटे तौर पर ठाकरे परिवार के प्रति वफादार रहा है. मुंबई के इसके गढ़ के लिए यह खासकर सच है जहां इसकी राजनीति की शुरुआत हुई थी.
मुंबई में सेना के नेटवर्क की अधिकतर शाखाओं पर उद्धव का कब्जा बरकरार है. इनमें से कई शाखाओं और दादर में पार्टी मुख्यालय शिवसेना भवन को श्री शिवाई सेवा ट्रस्ट की ओर से नियंत्रित किया जाता है. ठाकरे परिवार के वफादार और पूर्व मंत्री सुभाष देसाई ट्रस्ट के प्रमुख हैं. पार्टी के मुखपत्र सामना, दोपहर का सामना और मार्मिक का प्रबंधन प्रबोधन प्रकाशन करता है. शिंदे के लिए इन मूर्त और अमूर्त संपत्तियों पर कब्जा हासिल करना आसान नहीं होगा.
अपने गढ़ ठाणे से बाहर उनकी संगठनात्मक शक्ति भी नहीं है. उनकी पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ने की खबरें आ रही हैं. कैबिनेट विस्तार में देरी और बड़ी सहयोगी भाजपा को अधिक फल देने की संभावना से भी विधायकों में बेचैनी पैदा हो रही है, जिन्होंने मंत्री पद के लिए पाला बदल लिया था. पुरानी शिवसेना के काडर का कहना है कि भारी दबाव के एहसास ने पार्टी कार्यकर्ताओं और मूल मतदाताओं को ठाकरे के साथ संगठित कर दिया है. ठाकरे कैंप के एक सूत्र बताते हैं, ''जब हमारी सरकार गिराई गई तो हमें सहानुभूति मिली. वह खत्म हो रहा था. लेकिन चुनाव आयोग के फैसले ने उस भावना को पुनर्जीवित कर दिया है.''
मध्य मुंबई के एक पुराने शिवसैनिक एक अन्य तथ्य का हवाला देते हैं जो ठाकरे कैंप का विश्वास बढ़ा सकता है. वे कहते हैं, ''पहली बार किसी पार्टी ने अपना सिंबल नहीं खोया है. ऐसा इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ भी हुआ था. वोटरों और काडरों की सहानुभूति के अलावा, ठाकरे की विरासत हमारी यूएसपी है... भारत में लोग विचारधाराओं को नहीं बल्कि शख्सियतों का समर्थन करते हैं.'' और, उनका मानना है कि शिंदे के पास उद्धव सरीखा कद नहीं है. उनका मानना है कि ठाकरे के पास बाकी बची पार्टी में पर्याप्त जान और ऊर्जा बची हुई है, खासकर देश की आर्थिक राजधानी में.
मुंबई की सियासत मराठी और गैर-मराठी बोलने वालों के बीच भाषाई आधार पर भी ध्रुवीकृत है—हालांकि मराठी भाषी बहुसंख्यक नहीं हैं, लेकिन वे सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं. और, भले ही कोई जाति, धार्मिक या भाषाई समूह एकमुश्त एकसाथ वोट नहीं करता, लेकिन पुरानी शिवसेना की वफादारी अब भी महाराष्ट्र के श्रमिक वर्ग को प्रभावित करती है. इसकी जमीनी-स्तर की शाखाओं का संपर्क गैर-मराठी क्षेत्रों—मुसलमानों और ईसाइयों के अलावा गुजराती, जैन, मारवाड़ी और दक्षिण भारतीयों तक भी फैला हुआ है. उद्धव की परीक्षा इस बात में होगी कि क्या वे अपने मूल वोटबैंक को नुक्सान पहुंचाए बगैर अपने आधार को बढ़ाते हुए, अपनी नरम, महानगरीय प्रवृत्ति को स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए प्रवासियों के विरोध वाले सेना के पुराने मूलमंत्र से तालमेल बिठा पाएंगे. इसके साथ ही, यह अंतर्निहित विरोधाभास शिंदे-भाजपा गठबंधन पर शायद ज्यादा साफतौर पर लागू होता है. भाजपा का आधार मुख्य रूप से जैनियों, गुजरातियों, मारवाड़ियों और उत्तर भारतीयों के बीच है—इन सभी का पुरानी शिवसेना के वोटरों के साथ असहज रिश्ता है.
लेकिन, इनमें से किसी से भी उद्धव कैंप के सामने खड़ी भारी चुनौती कम नहीं हो जाती. अगर, चुनाव आयोग उन्हें नया नाम और सिंबल आवंटित करता है तो पहले उन्हें उसे लोकप्रिय बनाना होगा—उसके बाद भी वोटर आदतन पुराने सिंबल का बटन दबा सकते हैं. शिवसेना के वह पुराने नेता कहते हैं, ''कुल मिलाकर, हमारे पास कानूनी जंग लड़ने और वोटरों तक पहुंचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.''
उद्धव के पक्ष में फिलहाल थोड़ी लोकप्रिय सहानुभूति हो सकती है, लेकिन कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि यह अभी भी उद्धव पर निर्भर है कि वे इस भावना का लाभ उठाएं और जमीनी स्तर पर उसे भुनाएं. वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले का भी कहना है कि उद्धव का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे इस भावना को वोट में किस तरह तब्दील कर पाते हैं. उनके सौम्य, सफेदपोश नेतृत्व ने शिवसेना की कई कमियों को दुरुस्त होते देखा है, लेकिन उद्धव को फिर से कड़क, बाहुबल वाली सड़क की सियासत पर लौटना पड़ सकता है, जिसके लिए पार्टी कभी मशहूर थी. उन्हें हाइकमान शैली से आगे बढ़ते हुए जमीनी स्तर के नेताओं और जनाधार वाले लोगों को भी तैयार करना पड़ सकता है.
और, यह सब आसान नहीं है. शिंदे के एक करीबी सहयोगी बताते हैं कि बाल ठाकरे ने अपने शिवसैनिकों पर भरोसा किया, और उनमें व्यक्तिगत वफादारी की मजबूत भावना भरी. उद्धव को अभी भी अपने आसपास वैसी ही व्यक्तिगत निष्ठा का भाव निर्मित करना है. आखिरकार, उद्धव ने ही शिंदे और उनके कई साथी बागियों को व्यक्तिगत रूप से तैयार किया था जो अंतत: उद्धव से ही अलग हो गए.
शिंदे बनाम उद्धव: किसमें कितना दम
बढ़त
उद्धव ठाकरे
शिंदे पार्टी संगठन में विभाजन के बीज बोने में असमर्थ
मुंबई में मजबूत जमीनी जुड़ाव, जो पुराने मराठी मानुष आधार, ठाकरे नाम और अलहदा लड़ाकू काडरों के इर्द-गिर्द निर्मित हुआ
उत्तर भारतीयों, बौद्ध दलितों/ बहुजनों तक पहुंच के साथ पुरानी सेना के सीमाओं से आगे बढ़ सकते हैं. मुसलमानों, ईसाइयों में उनके प्रति नरमी है जो उन्हें सौम्य, महानगरीय ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो हेट क्राइम पर लगाम लगा सकता है
धारणा है कि वे भाजपा के बदले की सियासत के शिकार हुए
एकनाथ शिंदे
सुलभ, मिलनसार, जमीन से जुड़े जन नेता की छवि जो नीचे से ऊपर उठा, राज्यभर में नेटवर्क, अपने गढ़ ठाणे और मुंबई तक सीमित नहीं
शिवसेना नाम और सिंबल के अलावा मूल शिवसेना के विधायक दल का बड़ा हिस्सा उनके पाले में है
भाजपा का समर्थन
मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी, पारंपरिक मराठी श्रमिक वर्ग के इलाकों में समृद्धि और बदलाव आया है, यह हिंदुत्व-समर्थक भाजपा-सेना गठबंधन के पक्ष में जा सकता है
कमी
उद्धव ठाकरे
सुलभ नहीं, मंडली से घिरे रहते हैं और शिंदे कैंप के जाने के बाद दूसरी पंक्ति के मजबूत नेताओं तथा जन आधार वाले भरोसेमंद नेताओं की कमी
उद्धव के सफेदपोश नेतृत्व में डर का कारक खत्म हो गया, तटस्थ लोग अब शिंदे खेमे की तरफ जा सकते हैं
अपने पिता बाल ठाकरे की तरह व्यक्तिगत और सामूहिक निष्ठा की भावना को प्रेरित करने में असमर्थ
कांग्रेस और एनसीपी सरीखी ''धर्मनिरपेक्ष'' पार्टियों के साथ पुराने हिंदुत्व वाली पार्टी के गठबंधन का विरोधाभास, खासकर मराठवाड़ा जैसे संवेदनशील इलाकों में
एकनाथ शिंदे
किसी राजनैतिक दल की बजाए अवसरवाद और जबरन जुड़े विधायकों के ढीले और बेलगाम गठजोड़ के रूप में देखा जाता है, किसी तरह की संगठनात्मक गहराई नहीं
प्रशासक के तौर पर रणनैतिक कौशल का अभाव, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की छाया में ढके
भाजपा के साथ बढ़ता तनाव. गठबंधन में विरोधाभास: सेना की श्रमिक वर्ग मराठी आधार और स्थानीय निवासियों के हितों की वकालत करने वाली राजनीति बनाम भाजपा की व्यापारिक, गुजराती नेतृत्व जो हिंदुत्व का एकाधिकार बनाए रखने के लिए शिंदे कैंप का शिकार कर सकता है
धारणा कि ठाकरे के बगैर कोई शिवसेना नहीं हो सकती

