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आफत में तब्दील हो गए अन्ना

निराश्रित गोवंश संरक्षण की सरकारी योजनाएं असर नहीं दिखा पा रहीं, फसलों को नुक्सान पहुंचाने के साथ लावारिस जानवर लोगों की जान के दुश्मन बने हुए हैं

जाएं तो जाएं कहां : उत्तर प्रदेश में विभिन्न मार्गों पर छुट्टा पशुओं के इस तरह के झुंड सामान्य रूप से दिख जाते हैं. इनकी वजह से सड़क हादसे भी होते रहते हैं
जाएं तो जाएं कहां : उत्तर प्रदेश में विभिन्न मार्गों पर छुट्टा पशुओं के इस तरह के झुंड सामान्य रूप से दिख जाते हैं. इनकी वजह से सड़क हादसे भी होते रहते हैं
अपडेटेड 4 फ़रवरी , 2023

नए साल का सूरज मेरठ के रोहटा इलाके के मीरपुर गांव में रहने वाले किसान नीटू कुमार के लिए बेशुमार दुख लेकर आया. गांव के बाहर रासना मार्ग पर नीटू का फार्म हाउस है जिसमें उनके पशु रहते हैं. रोज की तरह 1 जनवरी को उनकी पत्नी गीता दोपहर तीन बजे फार्म हाउस में पहुंचीं तो देखा कि एक छुट्टा सांड़ मवेशियों को परेशान कर रहा था. गीता ने उसे डंडे से भगाने का प्रयास किया लेकिन सांड़ नें अपने सींग से उन्हें हवा में उछाल दिया. वे औंधे मुंह जमीन पर गिर गईं. उनकी चीख सुनकर दौड़े लोग घायल गीता को रोहटा बाइपास पर निजी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषि‍त कर दिया. इस तरह सांड़ ने चार मासूम बच्चों के सिर से मां का साया हटा दिया. मेरठ में एक हफ्ते के भीतर छुट्टा जानवरों की वजह से हुई दुर्घटनाओं में गीता की मौत तीसरी थी. 

बाराबंकी-बहराइच हाइवे पर मसौली इलाके में 15 जनवरी की देर रात मवेशियों को बचाने में अनियंत्रित हुई रोडवेज बस और ट्रक में टक्कर हो गई. हादसे में बस पर सवार 19 यात्री घायल हो गए जिनमें चार की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है. बुलंदशहर के गांव हजरतपुर के रहने वाले विनोद सिंह 17 जनवरी की रात को जिला मुख्यालय से घर लौट रहे थे. जब वे एनएच-91 पर मधुसूदन डेयरी के पास पहुंचे तभी पीछे से आ रही एक कार सड़क पर बैठे जानवर को बचाने में अनियंत्रि‍त हो गई. कार ने विनोद की बाइक में टक्कर मारी. अस्पताल पहुंचने से पहले उनकी मौत हो गई. 

ये कुछ घटनाएं बानगी हैं कि किस तरह छुट्टा घूम रहे जानवर सड़क पर चल रहे वाहनों का काल बन रहे हैं. बीते एक महीने के दौरान पुलिस विभाग को प्रदेश में विभि‍न्न हिस्सों में बेसहारा पशुओं के चलते हुई 50 से अधिक दुर्घटनाओं की जानकारी मिली है जिनमें 15 से अधिक लोगों की मौत हो गई. हालांकि दर्ज न होने वाली घटनाओं की संख्या इनसे कई गुना ज्यादा है. छुट्टा जानवरों से सबसे ज्यादा पीड़ित बुंदेलखंड के जिले झांसी में यातायात विभाग के आंकड़े भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. यहां जून, 2021 से दिसंबर, 2022 के बीच अन्ना (बेसहारा छोड़े गए पशु) के कारण 348 लोगों की जान चली गई. इनमें 16 अक्तूबर, 2022 को चिरगांव में हुई दर्दनाक घटना शामिल है जिसमें ट्रैक्टर-ट्रॉली के सामने अन्ना जानवर आने से हुए हादसे में सात महिलाओं समेत चार बच्चों की मौत हो गई थी. मवेशियों के कारण लगातार बढ़ रही सड़क दुर्घटनाओं का मसला अक्तूबर, 2022 में आयोजित भारतीय रोड कांग्रेस परिषद की लखनऊ में आयोजित 224वीं बैठक में भी छाया रहा. काउंसिल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एस.बी. वासवा ने गाय-भैंसों के कानों को रेडियम पेंट करने का सुझाव दिया ताकि सड़क पर जानवर दूर से पहचाने जा सकें. हालांकि इस दिशा में अभी कोई कारगर सरकारी प्रयास सामने नहीं आया है. 

प्रदेश में आवारा घूम रहे पशुओं के आतंक से ग्रामीण और किसान दहशत में हैं. फसलों को नुक्सान पहुंचाने के साथ ये जानवर लोगों की जान के दुश्मन बन गए हैं. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान छुट्टा पशु एक बड़ा मुद्दा थे. लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 फरवरी, 2022 को फतेहपुर के मंडी समिति मैदान में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए यूपी में दोबारा भाजपा सरकार बनने पर छुट्टा जानवरों की समस्या का स्थाई निदान करने का वादा किया था. प्रधानमंत्री मोदी के वादे के करीब एक साल बाद भी छुट्टा जानवरों की समस्या यथावत बनी हुई है. सरदार वल्लभभाई पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर ऐंड टेक्नोलॉजी, मेरठ के सेवानिवृत्त प्रोफेसर संदीप चौधरी बताते हैं, ''छुट्टा जानवरों की समस्या और इसके नियंत्रण की योजना बनाने से पहले प्रदेश सरकार ने कोई अध्ययन नहीं कराया. इससे यह नहीं पता चल पाया कि किस इलाके में छुट्टा जानवरों से जुड़ीं कैसी समस्याएं हैं और उनका समाधान क्या है? केवल गोशालाएं बनाने और उनमें मवेशियों को बंद कर देने से ही समस्या का निराकरण नहीं हो सकता.''  

योगी सरकार ने 2 जनवरी, 2019 को निराश्रि‍त गोवंश योजना के तहत गोवंश संरक्षण की नीति लागू की थी. इसके तहत किसानों की फसलों की सुरक्षा और आवारा पशुओं की वजह से सड़क दुर्घटनाओं से बचाव के लिए गोशालाएं (देखें-बॉक्स) स्थापित की गईं. गोशालाओं को 30 रुपए प्रति गोवंश की दर से सहायता देने का प्रावधान किया गया. योगी सरकार ने प्रदेश में बेसहारा गोवंश संरक्षण का लक्ष्य 11,13,035 रखा है जिसके सापेक्ष 6,507 गोशालाओं में 10,18,615 गोवंश संरक्षि‍त हैं. गोवंश संरक्षण योजना की जमीनी हकीकत देखने के लिए मुख्यमंत्री के निर्देश पर गोशालाओं की जांच के लिए जनवरी के दूसरे हफ्ते में विशेष सचिव स्तर के अधि‍कारियों को नोडल अधिकारी बनाकर सभी 75 जिलों में रवाना किया गया. इन अधिकारियों ने कई जगहों पर गो संरक्षण केंद्रों में गड़बड़ी पकड़ी.

वहीं चित्रकूट मंडल के आयुक्त आर.पी. सिंह और डीआइजी विपिन मिश्र 22 जनवरी को बांदा के नरैनी ब्लॉक की ग्राम पंचायत गुढ़ाकला सियार पाखा में मौजूद कान्हा गोशाला का निरीक्षण करने पहुंचे. उन्हें पता चला कि इस गोशाला में 1 नवंबर से अब तक 32 पशुओं की मृत्यु हो चुकी है लेकिन इसे कहीं दर्ज नहीं किया गया. मौके पर मौजूद पशु चिकित्साधिकारी ने पशुओं की स्वभाविक मौत की जानकारी दी लेकिन मृत पशुओं के दफनाने में हुई गड़बड़ी पर वे बगलें झांकने लगे. इस पर अधिकारियों ने खंड विकास अधिकारी, पशु चिकित्साधिकारी समेत कई लोगों पर कार्रवाई के आदेश दिए. इसी प्रकार कानपुर में भीतरगांव के बिरहर गांव स्थित गो आश्रय स्थल पर पशुओं की अनदेखी और उनकी मौत का रिकॉर्ड न रखने पर जिलाधि‍कारी विशाख जी. ने प्रधान उमादेवी के वित्तीय अधिकार सीज करते हुए पशु चिकित्साधिकारी से जवाब मांगा है. 

कानपुर मंडल में तैनात रहे पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रमेश वर्मा बताते हैं, ''गोशालाओं में मरने वाले पशुओं की वजह बीमारी नहीं बल्कि भूख है. समय पर चारे की पर्याप्त व्यवस्था न होने से पशुओं की मौत हो रही है.'' मुजफ्फरनगर के चरथावल में सरकारी मदद से गो आश्रय केंद्र चलाने वाली एक निजी संस्था के संचालक वीर सिंह को 200 गोवंश पशुओं की देखभाल करना काफी भारी पड़ रहा है. भोजन के लिए सरकार की तरफ से 30 रुपए प्रति गोवंश पशु मिलते हैं लेकिन इतने में काम नहीं चलता. वीर सिंह बताते हैं, ''एक गाय को दिन भर में कम से कम चार किलो भूसा, हरा चारा, खली, आटे की जरूरत होती है जो 80 रुपए में मिलता है. पशु आहार और दवाएं मिलाकर यह खर्च औसतन 150 रुपए तक पहुंच जाता है. इस हिसाब से सरकार की मदद बहुत कम है.'' इसी कारण गोशाला संचालक अधिक पशुओं को रखने में कतरा रहे हैं. बारिश के महीने में चारे के दाम में बढ़ोतरी हो जाने से गोशाला संचालकों की दिक्कतें बढ़ जाती हैं. पशुपालन विभाग के विशेष सचिव देवेंद्र पांडेय बताते हैं, ''गोशालाओं के संचालन में धन की कमी को दूर करने के लिए स्टेट फाइनेंस कमिशन (एसएफसी) फंड पूलिंग व्यवस्था लागू की गई है. इसके तहत अगर किसी पंचायत के पास अतिरिक्त धन उपलब्ध हो तो वह उसे दूसरी जरूरतमंद पंचायत को ट्रांसफर कर सकती है.''

गोशाला के संचालन और नियंत्रण में अलग-अलग व्यवस्था लागू होने से भी दिक्कतें हैं. पशुपालन विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ''ग्रामीण इलाकों में गोशालाओं की व्यवस्था पंचायत के हवाले है तो नगरीय इलाकों में स्थानीय निकाय के. पशुपालन विभाग महज इन गोशालाओं के लिए एक नोडल विभाग ही है. गोशालाओं के संचालन और इनके नियंत्रण की कोई केंद्रीकृत व्यवस्था न होने से सरकारी योजनाएं सख्ती से लागू नहीं हो पा रही हैं.'' गोशालाओं की स्थापना को लेकर लोग रुचि नहीं ले रहे हैं. गो सेवा आयोग में पंजीकृत गोशालाओं की संख्या 588 हैं, जिनमें से 292 ही सक्रिय हैं. इनमें से भी केवल 136 को ही पिछले वर्ष अनुदान मिल पाया.

हरदोई में निजी गोशाला और डेयरी चलाने वाले राजेंद्र प्रसाद बताते हैं, ''एक गोशाला को रजिस्टर्ड कराने के लिए कम से कम आठ विभागों के चक्कर काटने पड़ते हैं. लखनऊ के बाबूगंज स्थि त पशुपालन निबंधन के कार्यालय में पंजीकरण होता है तो वहां से तीन किलोमीटर दूर अशोक मार्ग पर मौजूद इंदिरा भवन में गो सेवा आयोग के दफ्तर पर अनुदान पाने के लिए चक्कर लगाना पड़ता है. इसके बाद ही कम से कम 20 जानवर होने पर 70 फीसद के लिए ही अनुदान मिलता है.'' गोवंश की सुरक्षा और संवर्धन के लिए बने गो सेवा आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष, दो सदस्य के पद हैं जो पिछले एक साल से अधिक समय से खाली हैं. इसका असर आयोग के कामकाज पर पड़ रहा है. इस वर्ष केवल नौ गोशालाओं को ही अनुदान मिला है क्योंकि 60 के प्रपत्र शासन के पास हैं और आयोग के सचिव हरि शंकर के पास 20 आवेदन लंबित हैं. 

गोशाला संचालन में निजी भागीदारी के लगातार कम होने से भी छुट्टा पशुओं की समस्या बढ़ रही है. सीतापुर जिले के प्रगतिशील किसान महेंद्र वर्मा बताते हैं, ''सरकार के 30 रुपए प्रति गोवंश प्रति दिन अनुदान की घोषणा करने के बाद संपन्न लोग निकट की निजी गोशालाओं की मदद करने सामने नहीं आ रहे. वे समझते हैं कि सरकार से फंड मिलने के बाद गोशाला को और जरूरत नहीं है. ऐसे में सरकार को गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की व्यवाहारिक योजनाएं लागू करनी चाहिए. गाय के दूध का एक न्यूनतम सरकारी खरीद मूल्य तय होना चाहिए.'' गो पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कन्नौज जिले में बढ़नपुर वीरहार उमर्दा में 140.39 करोड़ रुपए की लागत से बने देश के इकलौते सरकारी काऊ मिल्क प्लांट का ऑनलाइन लोकार्पण किया था.

कानपुर, कन्नौज, फिरोजाबाद, आगरा, मैनपुरी, बरेली समेत 14 जनपदों में 140 दुग्ध संग्रह केंद्र स्थापित कर गाय के दूध की खरीद शुरू की गई. प्लांट में रोजाना एक लाख लीटर दूध का प्रसंस्करण होता था. गाय के दूध को टेट्रा पैक में उपलब्ध करवाने का यह इकलौता प्लांट बजट के अभाव में पिछले अक्तूबर से बंद पड़ा है.  कन्नौज के जिलाधि‍कारी शुभ्रांत शुक्ल ने प्रादेशिक कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन को पत्र लिखकर प्लांट को चालू करने को कहा है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है. सहकारिता विभाग के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार जे.पी.एस. राठौर बताते हैं, ''यूपी में सभी डेयरी दुग्ध विभाग के तहत संचालित होती हैं. काऊ मिल्क प्लांट को शुरू करवाने के लिए प्रयास किया जाएगा.'' 

पशुधन विभाग के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह ने प्रदेश को पश्चिमी और पूर्वी दो जोन में बांटकर 20 जनवरी से 20 फरवरी तक युद्ध स्तर पर निराश्रित गोवंश संरक्षण का अभियान चलाने का आदेश दिया है. इस अभि‍यान की सफलता इस बात पर निर्भर है कि जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधि‍कारी इस सरकारी आदेश को कितनी सख्ती से लागू करवा पाते हैं.

भांति-भांति की गोशाला

वृहद गो संरक्षण केंद्र (बीजीएसके) ग्रामीण इलाकों में स्थाई रूप से एक करोड़ 20 लाख रुपए की लागत से वृहद गो संरक्षण केंद्र बनाए गए हैं. इनके निर्माण और निगरानी का जिम्मा जिलाधिकारी के पास है. इनकी संख्या 258 है और इनमें 1,22,222 संरक्षि‍त गोवंश होने का दावा है 

अस्थाई गोवंश आश्रय स्थल (एजीएसके) जरूरत के हिसाब से पंचायत की निधि से गांव में बनाई गई है. प्रदेश में 5,694 ऐसी गोशालाएं हैं और इनमें 8,03,503 गोवंश के होने का दावा है

निराश्रित गोवंश आश्रय स्थल जिला पंचायत के अंतर्गत चल रहे कांजी हाउस को निराश्रित गोवंश आश्रय स्थल में तब्दील किया गया है. इनकी कुल संख्या 346 है और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनमें कुल संरक्षि‍‍त गोवंश 15,665 है 

कान्हा गोशाला शहरी इलाकों में निराश्रि‍त गोवंश को रखने के लिए स्थानीय निकायों ने कान्हा गोशाला का निर्माण कराया है. प्रदेश में इनकी संख्या 209 है और इनमें 77,225 गोवंश के होने का दावा है 

मुख्यमंत्री सहभागिता योजना मुख्यमंत्री बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना के तहत निराश्रि‍‍त गोवंश की देखभाल करने पर प्रति दिन 30 रुपए के हिसाब से मदद राशि‍ दी जा रही है. इसके तहत 1,61,151 पशुओं के संरक्षण का दावा है 

पंजीकृत गोशाला गो सेवा आयोग निजी पंजीकृत गोशालाओं की संख्या 588 हैं जिनमें 292 ही सक्रिय हैं. पंजीकृत गोशालाओं में कम से कम 20 पशु रखने पर 70 फीसद के लिए अनुदान की व्यवस्था है. लेकिन पिछले साल केवल 136 गोशालाओं को ही अनुदान मिला

योजनाओं पर भारी पड़ रहे जानवर

स्लॉटर हाउस: 2017 में पहली बार सत्ता संभालते ही भाजपा सरकार ने अवैध बूचड़खानों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया. स्लॉटर हाउस की निगरानी के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति बनी

गोवध निवारण: योगी सरकार ने प्रदेश में 1956 में लागू हुए गोवध अधिनियम में बदलाव कर सजा को सात साल से बढ़ा कर 10 साल कर दिया है ताकि आरोपी जमानत पर‍ रिहा न हो सकें 

काऊ सफारी: निराश्रित गोवंश को आश्रय दिलाने के लिए प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी काऊ सफारी योजना प्रदेश के 20 जिलों में शुरू की जानी है लेकिन इनके निर्माण में जमीन की उपलब्धता सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है 

कृत्रिम गर्भाधान: प्रदेश सरकार ने वर्गीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान कराकर बछिया पैदा करने की योजना लागू की है. यह योजना प्रजनन योग्य देसी नस्ल के गोवंशीय पशुओं पर लागू है

टैक्स: गोसंरक्षण योजनाओं की खातिर धन जुटाने के लिए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में आबकारी पर 'गो कल्याण सेस' लगाने के साथ मंडी शुल्क पर लगने वाला एक फीसद सेस बढ़ाकर तीन फीसद कर दिया

कॉर्पस फंड: प्रदेश सरकार ने 'गो संरक्षण एवं संवर्धन कोष नियमावली-2019' लागू कर छुट्टा गोवंश के पुनर्वास के लिए कॉर्पस फंड जुटाने और उसके खर्च के लिए नियम तय किए हैं

ईयर ट्रैंकिग: गोवंश के अवैध परिवहन और छुट्टा पशुओं की समस्या पर नजर रखने के लिए सभी गायों और अन्य गोवंश के ईयर टैगिंग का प्रावधान किया गया था. यह लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है 

गरीबों को गोवंश: मुख्यमंत्री योगी ने गरीबों को सरकारी आवास देने के साथ इन्हें कुपोषण से बचाने के लिए एक स्वस्थ गोवंश देने की भी घोषणा की थी जो पूरी तरह हकीकत में नहीं उतर पाई है 

बजट: 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले छुट्टा पशुओं से निजात दिलाने के लिए योगी सरकार ने अक्तूबर, 2021 में पेश किए गए अनुपूरक बजट में 300 करोड़ रुपए की व्यवस्था की थी 

निगरानी: गोशालाओं की निगरानी, संचालन, देखरेख के लिए सभी जिलों में डीएम की अध्यक्षता में गो संरक्षण समितियां गठित की गई हैं

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