अरुण पुरी
हमारे आसपास के चुहलबाज चुटकी लेते हुए कह सकते हैं कि हम सब खुश होंगे पर पता तो हो कि खुशी को आखिर परिभाषित कैसे करें. वैज्ञानिक इसे मस्तिष्क में कुछ रसायनों की कीमियागीरी बताकर इसकी अहमियत कम कर सकते हैं. प्रेमियों को लगेगा कि खुशी उनकी प्रेमातुर भावनाओं में है. धर्म शायद कहें कि यह दुनिया ही दुख और उदासी से बनी है और लो, ये रहे आत्मा को ऊंचा उठाने के नुस्खे. मगर खुशी का राज आखिर है क्या—और हम इसे कैसे हासिल करते हैं?
यह विशेष अंक इसी मायावी गुण, भावना या एहसास की पड़ताल करता है ताकि अवधारणा और व्यवहार दोनों स्तरों पर इसके इर्द-गिर्द फैले रहस्यों को सामने लाया जा सके. असलियत में ऐसा बंटवारा करना आसान नहीं—मसलन, आध्यात्मिकता में अभ्यास ही सिद्धांत है. इस अंक में हम लाए हैं उन गुरुओं के ज्ञान के मोती, जो खुशी से जुड़े आध्यात्मिक सत्य की गहराई में गोता लगाते हैं और जिन्होंने इन्हें जाना और समझा है.
उनका लिखा पढ़ते हुए विचारों का अद्भुत मेल हमारे सामने कौंधता है. ज्यादातर तो जोर देकर कहते हैं कि खुशी आंतरिक रूप से उत्पन्न अवस्था है जो दुनिया की पारे जैसी चंचल फितरत से प्रभावित नहीं होती. जैसा कि स्वामी गौर गोपाल दास कहते हैं, ''जब आपकी मनोदशा नकारात्मक होती है, अच्छी से अच्छी चीजों से भी खुशी नहीं मिलती. जब मनोदशा सही होती है, तो मामूली से मामूली चीजें आनंद दे पाती हैं. मनोदशा स्वर्ग को नरक में और नरक को स्वर्ग में बदल सकती है.'' इसे सिस्टर बी.के. शिवानी की इस बात से मिलाकर देखें: ''जब मेरे मन के ग्राफ में उतार-चढ़ाव नहीं आते, तब मैं पूरे दिन खुश रहती हूं...सच यह है कि खुशी हमारा स्वभाव है, हमारे होने का तरीका है.'' या उससे जो माता अमृतानंदमयी अपनी पहली ही भाव-भंगिमा में प्रस्तुत करती हैं, ''खुशी कोई वस्तु या लक्ष्य नहीं है. यह हमारे भीतर है. यही जीवन का उद्देश्य है.'' योग गुरु बाबा रामदेव इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ''आप खुशी कमाते नहीं हैं. आप खुश तब रहते हैं जब आपका होना किसी अन्य के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है.'' आध्यात्मिकता की राह पर क्या भौतिक, क्या सांस्कृतिक और क्या धार्मिक—तमाम दूरियां तिरोहित हो जाती हैं.
वह अवस्था प्राप्त करने की तलाश महज ऋषियों का नहीं बल्कि हरेक व्यक्ति का काम है. इसलिए गुरुओं के साथ हमने कई सारे भिन्न-भिन्न प्रमुख व्यक्तियों से खुशी के साथ उनके अनुबंधों के बारे में पूछा. नृत्यांगना मल्लिका साराभाई से केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल तक, पैरालिंपियन भाविना पटेल और ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा से यूट्यूबर कैरी मिनाती और धरतीपुत्र किसान कार्यकर्ता राकेश टिकैत तक, शेफ सुवीर सरण से अदाकारा सनी लियोनी तक, जायडस के पंकज आर. पटेल सरीखे कारोबारी प्रमुखों से लेकर सियासतदान महुआ मोइत्रा तक, हमने जिंदगी का समूचा इंद्रधनुष समाहित किया. उनमें से कुछ हस्तियां गुरुओं से काफी सहमत मालूम देती हैं. बायजूज की सह-संस्थापक दिव्या गोकुलनाथ उसी कथानक से पढ़ती दिखाई देती हैं जब वे कहती हैं, ''मेरी खुशी बाहरी वैधता की मोहताज नहीं, बल्कि मेरे भीतर से आती है.'' विचारों की विविधता में रोजमर्रा के रंग भी शामिल हैं. अभिनेत्री भूमि पेडणेकर कहती हैं, ''मुझे खुशी-संतुष्टि तब मिलती है जब लोगों को मेरा काम अच्छा लगता है, वे उसे मान्यता और प्यार देते हैं.'' टीवी, रंगमंच और फिल्मों की अदाकारा शेफाली शाह के लिए इसका अर्थ है ''प्रियजनों के साथ होना, जहां हम सब सुरक्षित, स्वस्थ और खुश हों. खाना, हंसी-मजाक, ठहाके, म्यूजिक, डांस... या फिर बिल्कुल कुछ न कर रहे हों''.
प्रकृति और भौतिक जगहों के साथ दैहिक एकता का एहसास प्रबल थीम की तरह उभरकर आया है. केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया के लिए काम के साथ जिंदगियां बदलने का आनंद अहम है, पर साइकिल चलाना और अपने पैतृक गांव जाना, उसके खेतों और सड़कों पर घूमना भी. वास्तुकार नीलांजन भोवाल ''भीगी मिट्टी की सौंधी महक'' को चुनते हैं. बंगाल के दो सांसदों ने भोजन का जिक्र किया, जो खुशी की यादों का एक और साझा भंडार है. मोइत्रा ''दयालु और प्रेमपूर्ण अवस्थाओं, जहां कोई नकारात्मक ऊर्जा न हो'' के अलावा ''अदरक की चाय, टोस्ट और भुजिया'' का भी जिक्र करती हैं. वहीं मिमी चक्रवर्ती अपने किसी अन्य की खुशी का कारण होने पर जोर देते हुए ''पिज्जा के एक बड़े टुकड़े'' का जिक्र करने से कतरातीं नहीं.
हमने कामकाजी दायरे की 13 शख्सियतों और संस्थाओं को भी यहां संजोया है—वे जो सामाजिक क्षेत्र में अपने कामों और दखल से दूसरों और खुद अपने लिए खुशियां ला रहे हैं. बस दो को ही लें. छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में पुरुष के रूप में जन्मी ट्रांसजेंडर विद्या राजपूत ने बरसों की बदसुलूकी के बाद ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड बनाने में मदद की और पक्का किया कि तीसरे लिंग के लोगों को सस्ता अनाज मिले. लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला के प्रयासों का आधारभूत तत्व था पोषण: उनका मूल शहर कोटा 2019 में शिशु मृत्यु की अत्यधिक घटनाओं से हिल उठा था. उनके सुपोषित मां अभियान का लक्ष्य इसी की जड़ों पर कुठाराघात करना है.
खुशी के समूचे सवाल को सही परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र हर साल वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट प्रकाशित करता है. इस रिपोर्ट के एक के बाद एक संस्करणों में भारत लगातार 146 देशों में काफी पीछे रहा है. 2022 में हम थोड़ा सुधार करके 139 से 136वें पायदान पर आए, पर अब भी दक्षिण एशियाई देशों में तालिबान के मातहत अफगानिस्तान अकेला देश है जो भारत से बदतर रहा. नेपाल (84) सबसे ऊपर, और उसके बाद बांग्लादेश (94) और पाकिस्तान (121) हैं; यहां तक कि संघर्षों से तार-तार श्रीलंका (127) भी बेहतर रहा.
हम जानते हैं कि भारतीय मुश्किल से मुश्किल हालात में भी खुश रह सकते हैं. मगर शायद हमें उस परिभाषा को ही बदलने में गंभीरता से जुटने की जरूरत है. राष्ट्रों की रैंकिंग तय करते समय सर्वे करने वाली एजेंसी ने सामाजिक-आर्थिक मानदंडों की छानबीन के अलावा उत्तरदाताओं से पूछा कि क्या उनकी जिंदगी ''संतुलन में है'', वे ''शांति महसूस करते हैं'', और ''दूसरों या खुद अपनी परवाह करने'' पर ध्यान देते हैं. इसकी बदौलत फिनलैंड, डेनमार्क, आइसलैंड और स्वीडन सरीखे स्कैंडेनेवियाई देश शीर्ष पायदानों पर आए. बेशक उन्हें भौतिक प्रचुरता और संपूर्ण सामाजिक जनकल्याण से वहां पहुंचने में मदद मिली. मगर 2018 में नॉर्डिक देशों के एक आंतरिक सर्वे से ''मानसिक रुग्णता और अकेलेपन की महामारी'' का भी पता चला.
खुदकुशी की ऊंची दरों की भी अक्सर चर्चा की जाती है—1960 के दशक में विकसित दुनिया में स्वीडन शीर्ष पर था, और बीते दशक के मध्य में नंबर 1 हैपी कंट्री फिनलैंड में 16-24 के आयु समूह में यह मृत्यु की तीसरी बड़ी वजह थी. तो अपने नागरिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में हम सुधार तो लाएं ही, पर इस अंक में प्रस्तुत गुरुओं के दिखाए रास्ते में भी काफी बुद्धिमानी है. इंडिया टुडे इस थीम के प्रति हमेशा की तरह प्रतिबद्ध है: खुशी की इस तलाश में हमारे सहभागी आरपीजी एंटरप्राइजेज के साथ अपने अगले
प्रयास में हम सर्वे के जरिए भारत के सबसे खुश कार्यस्थल तय करने और विजेताओं को पुरस्कृत करने का मंसूबा बना रहे हैं. उससे पहले और सबसे ज्यादा, आप सबको खुशी के अपने रहस्य खोज पाने में कामयाबी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

