scorecardresearch

उपलब्ध हैं उद्धव ठाकरे

1990 में राजनीति में उनके आधिकारिक प्रवेश के समय से ही सामान्य लोगों के लिए ठाकरे की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती रही है

मोर्चे पर आगे मुंबई में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान ठाकरे
मोर्चे पर आगे मुंबई में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान ठाकरे
अपडेटेड 3 जनवरी , 2023

धवल कुलकर्णी

इन दिनों उद्धव ठाकरे हर तरफ नजर आ रहे हैं. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) अध्यक्ष बीते शनिवार को सामाजिक महापुरुषों पर राज्यपाल बी.एस. कोश्यारी की टिप्पणी जैसे मुद्दों के खिलाफ महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) के मोर्चे में भाग लेते हुए तीन किलोमीटर से ज्यादा पैदल चले. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता का कहना है कि ''पैदल मार्च ने उनके स्वास्थ्य पर उठती अफवाहों को खत्म कर दिया है.'' कहा जा रहा है कि उद्धव अपनी सेना को एकजुट करने के लिए जल्द ही राज्यव्यापी दौरे पर निकलेंगे. पिछले महीनों में ठाकरे ने बेमौसम बारिश से प्रभावित औरंगाबाद जिले के दौरे के अलावा विदर्भ के चिखली, बुलढाणा में एक जनसभा की. ठाकरे अपने आवास 'मातोश्री' और पार्टी मुख्यालय 'शिवसेना भवन' में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं और दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल भी कर रहे हैं. 

सार्वजनिक मेल-मुलाकात बढ़ाकर वे अपने संगठन को और नुकसान से बचाने के अलावा सत्ता गंवाने से पैदा हुई सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. एमवीए के मुख्यमंत्री के रूप में लोगों के लिए ठाकरे की अनुपलब्धता और समस्याओं को अपने स्तर पर न निबटाने के उनके रवैये को शिवसेना के आंतरिक असंतोष का दोषी ठहराया गया था, जिसकी परिणति अचानक तख्तापलट में हुई थी. 

एकनाथ शिंदे और भाजपा से मुंह की खाने के बाद शिवसेना की चोटें सहलाने के लिए ठाकरे अब मैदान में हैं. शिवसेना के एक नेता ने चुहल करते हुए कहा कि ''ठाकरे की सार्वजनिक सक्रियता का श्रेय एकनाथ शिंदे को जाता है.'' 

हालांकि, 1966 में स्थापना के बाद से ही शिवसेना में टूट-फूट होती रही है, लेकिन शिंदे का विद्रोह बंदू शिंगरे, डॉ. हेमचंद्र गुप्ते, छगन भुजबल, नारायण राणे या यहां तक कि राज ठाकरे से अलग है. जून में न सिर्फ एमवीए की सरकार गिरी बल्कि 39 विधायक और 13 लोकसभा सांसद भाजपा में शमिल हो गए. ठाकरे के पास सिर्फ 16 विधायक और छह सांसद रह गए. शिंदे खेमे ने ''असली'' शिवसेना होने का भी दावा किया. नतीजतन चुनाव आयोग तक पहुंची लड़ाई में शिवसेना का मूल नाम और 'धनुष-बाण' प्रतीक जब्त हो गए. मजबूरन, ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम और मशाल चुनाव चिह्न स्वीकार करना पड़ा. शिंदे ने अपने गुट का नाम 'बालासाहेबांची शिवसेना' रखा और 'ढाल-तलवार' चुनाव चिह्न लिया. कुल मिलाकर, इसने ''मूल'' शिवसेना के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया.

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता मानते हैं कि मुंबई नागरिक निकाय चुनाव उनके लिए लिटमस टेस्ट होंगे. गौर तलब है कि 1985-1992 और 1997-2022 के बीच बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) पर शिवसेना का नियंत्रण रहा है. इसकी मदद से पार्टी अपनी ''इनाम अर्थव्यवस्था'' का लाभ अपने  कैडर तक पहुंचाती है.

मुंबई में ठाकरे की शिवसेना भाषाई और क्षेत्रीय गौरव के आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण पर काम कर रही है. इसमें महाराष्ट्र को 1.54 लाख करोड़ रुपए के वेदांता-फॉक्सकॉन सेमीकंडक्टर प्लांट जैसे निवेश से वंचित कर उसे गुजरात ले जाए जाने का ''अन्याय'' शामिल है. शिवसेना का दावा है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार महाराष्ट्र की कीमत पर गुजरात को लाभ पहुंचा रही है और मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहती है. मुंबई को महाराष्ट्र से अलग किया जाना महाराष्ट्र के लिए भावनात्मक मुद्दा रहा है और शिवसेना ने 1985 तथा 2012 के चुनावों में इस का सफल उपयोग किया था.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार अभय देशपांडे का कहना है कि ''ठाकरे अगर खुद को 'अन्याय का शिकार' बता कर लोगों की सहानुभूति हासिल करना चाहते हैं, तो उन्हें जनता तक पहुंचने की पहल करनी चाहिए. पार्टी का पुनरुद्धार तभी संभव है जब वे बीएमसी पर नियंत्रण बनाए रखें.''

शिवसेना के अंदरूनी सूत्र स्वीकार करते हैं कि अप्रैल 1990 में राजनीति में औपचारिक प्रवेश करने के बाद से ही ठाकरे तक लोगों की पहुंच का मुद्दा लगातार मौजूद रहा है. इसकी वजह लंबे समय से खराब रहे उनके स्वाथ्य के अलावा इसे भी माना जा सकता है कि सड़कों पर उतर कर हंगामेदार राजनीति में शामिल होने के बजाए वे पीछे बैठे रणनीतिकार के रूप में ज्यादा जाने जाते रहे हैं.

Advertisement
Advertisement