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फीका पड़ता उम्मीद का फल

सेब किसान कई मोर्चों पर मुश्किलों से जूझ रहे हैं, जिनमें सप्लाइ चेन की रुकावटें और कोल्ड स्टोरेज तथा मजदूरों की कमी शामिल है

संकट में सेब शोपियां मंडी में ट्रकों पर लादे गए सेब
संकट में सेब शोपियां मंडी में ट्रकों पर लादे गए सेब
अपडेटेड 7 नवंबर , 2022

मोअज्जम मोहम्मद

कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों एक अजीब-सी मायूसी पसरती जा रही है. दिन में अपने सेब के बागान से बाहर आपको शायद ही कोई मिले. इस साल बंपर फसल हुई है और किसान उसे तोड़ने में मसरूफ हैं. जम्मू-कश्मीर के बागवानी महकमे और किसानों का भी दावा है कि इस बार सेब की पैदावार ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है. लेकिन किसान अपनी मेहनत के फल का पूरा फायदा न उठा सकेंगे. 10,000 करोड़ रुपए का बागवानी क्षेत्र कई समस्याओं से घिरा है, जिसमें सप्लाइ चेन में आ रहीं रुकावटें, महंगाई, कोल्ड स्टोरेज और कामगारों की कमी के साथ ईरानी सेब का आयात भी शामिल है. सेब की खेती में सीधे तौर पर 7,00,000 परिवार और परोक्ष रूप से यही कोई 35 लाख परिवार जुड़े हैं. यह कश्मीर की स्थानीय अर्थव्यवस्था में अहम रोल अदा करता है.

घाटी में सेब की टोकरी कहे जाने वाले दक्षिण कश्मीर के शोपियां के सेब किसान मुश्ताक अहमद मलिक कामगारों की कमी और ढुलाई में देरी जैसी दोहरी मार झेल रहे हैं. मलिक के पास उनके गांव पन्नू में 40 कनाल का बाग है लेकिन उन्हें सेब तोड़ने, छांटने और पैक करने के लिए 10 मजदूरों को रोज 10,000 रुपए का भुगतान करना पड़ रहा है. लगभग 1,000 पेड़ों से मलिक सेब के 4,000 बक्से (17 किलो प्रत्येक) तैयार कर लेते हैं. इस साल फसल में 150 फीसद की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. हालांकि वे इससे उत्साहित नहीं हैं. वे कहते हैं, ''फिलहाल एक युद्ध जैसी स्थिति दिखती है. मजदूरों और पैकेजिंग सामग्री आदि के लिए मारामारी है. कीमतें आसमान छू रही हैं पर मुनाफा उम्मीद के मुताबिक नहीं है.'' इस महीने की शुरुआत में उनकी दो खेप दिल्ली में औने-पौने दामों पर बिकीं.

सितंबर में जैसे ही तुड़ाई शुरू हुई, फलों से लदे हजारों ट्रक घाटी से भारत के विभिन्न राज्यों के लिए रवाना हुए. लेकिन उन्हें जोखिम भरे पहाड़ी श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के किनारे अधिकारियों ने कई दिनों तक रोक दिया. मलिक की खेप को दिल्ली की आजादपुर मंडी तक पहुंचने में सात दिन लगे. वैसे, 900 किमी से कम की दूरी तय करने में दो दिन ही लगते. फल खराब हो गए थे; इसलिए उन्हें एक बॉक्स के केवल 650-700 रुपए ही मिले. आमतौर पर इसके 1,200 रुपए या उससे अधिक मिलते हैं. उत्पादकों के अनुसार, सेब का एक बॉक्स तैयार करने पर 500 रुपए का खर्च आता है जिसमें माल भाड़ा शामिल नहीं है. कीमतों में गिरावट क्यों आई? सेब रास्ते में सड़ गए और एक ही दिन मंडियों में सेब से लदी बहुत ज्यादा गाड़ियों के पहुंचने से भी मांग में कमी आई.

किसानों का आरोप है कि उन्हें नुक्सान पहुंचाने के लिए ट्रकों को 'जान-बूझकर' रोका गया. विरोधस्वरूप उन्होंने 25 सितंबर से दो दिन के लिए पूरे कश्मीर की मंडियों को बंद कर दिया. जम्मू-कश्मीर प्रशासन हरकत में आया और राजमार्ग के रामबन सेक्टर के एसएसपी (यातायात) को हटा दिया. हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि ट्रकों को कश्मीर के काजीगुंड में रोका गया था क्योंकि संकरे इलाके और चल रहे निर्माण के कारण दोनों तरफ से वाहनों की आवाजाही को सुचारु रखने के लिए किसी भी दिन एक साथ दोनों तरफ का रास्ता नहीं खुलता बल्कि बारी-बारी से एक दिन के लिए रास्ता खोला जाता है. 
कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स-कम-डीलर यूनियन (किसान सह विक्रेता संघ) के अध्यक्ष बशीर अहमद बशीर का कहना है कि इस साल किसानों, खरीदारों और कारोबारियों को जितना बड़ा झटका लगा है, उतना शायद ही कभी लगा हो. उनके अनुसार, फल की कोई मांग ही नहीं है क्योंकि मंडियों में पहले से ही काफी स्टॉक पड़ा है. वे कहते हैं, ''हम यकीन से नहीं कह सकते कि राजमार्ग की नाकाबंदी ने या मौसम या फिर अत्यधिक पैदावार ने हमें इस स्थिति में ला खड़ा किया है. नुक्सान की भरपाई में कई साल लगेंगे.''

बशीर की मांग है कि सरकार को कम गुणवत्ता वाले सेब खरीदने चाहिए ताकि किसानों को कुछ राहत मिल सके. उन्होंने इस मुद्दे पर ध्यान खींचने के लिए 4 अक्तूबर को श्रीनगर में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. तब से उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाले प्रशासन की ओर से कई उपाय किए गए हैं और मुख्य सचिव अरुण कुमार मेहता नियमित रूप से स्थिति की निगरानी कर रहे हैं. 

एनएच पर लंबे समय तक ट्रकों के रुकने का असर निर्यातकों पर भी पड़ा है. फ्रूट मास्टर एग्रो फ्रेश जेएंडके फर्म चलाने वाले पुलवामा के 28 वर्षीय उद्यमी इजहान जाविद ढुलाई में देरी से दुखी हैं, उनका यूएई स्थित रिटेल दिग्गज लूलू समूह के साथ सेब सप्लाइ का एक करार है. वे बताते हैं कि उन्होंने इस सीजन में यूएई को छह कंटेनर भेजे हैं, जबकि 2-3 अभी भी रास्ते में हैं. एक कंटेनर को मुंबई पोर्ट तक पहुंचने में 8-10 दिन लग गए. वे श्रीनगर राजमार्ग पर देरी को कीमतों में गिरावट के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार मानते हुए बताते हैं, ''कंटेनरों को मुंबई तक पहुंचने में इतना समय लग गया जबकि वे दुबई केवल चार दिन में पहुंच गए.'' जाविद मुक्त व्यापार समझौते के तहत ईरान से आयात किए जा रहे शुल्क मुक्त सेब और महामारी के बाद की वैश्विक मंदी को नुक्सान की दूसरी वजहें मानते हैं. समुद्री मार्गों और अफगानिस्तान के रास्ते अटारी-वाघा सीमा से बड़ी खेप भेजी जा रही है, जिससे घरेलू बिक्री प्रभावित हो रही है. 

जाविद का कहना है कि किसान फलों का स्टॉक कर सकते थे ताकि कीमतें बढ़ने (मार्च-अप्रैल) पर इसे बेचकर मुनाफा बना सकें लेकिन पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज न होने से यह संभव नहीं हो पा रहा. कश्मीर को 4 लाख मीट्रिक टन कोल्ड स्टोरेज क्षमता की जरूरत है, पर इसकी आधी से भी कम उपलब्ध है.
कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज ऐंड टेक्नोलॉजी के प्लांट पैथोलॉजिस्ट डॉ. तारिक रसूल का कहना है कि हाइवे नाकेबंदी से ज्यादा, मैकेनाइज्ड बागवानी तकनीकों की कमी और बागों का पारंपरिक तरीके से बना होना किसानों का नुक्सान करा रहा है.

यूरोप में एक किसान उन्नत कृषि मशीनरी का उपयोग करके लागत कम रखता है और एक यूरो प्रति किलो से कम पर सेब बेचता है. उन्हें प्रति हेक्टेयर 200-800 लीटर पानी के छिड़काव की जरूरत होती है जबकि कश्मीर में यह 4,000-8,000 लीटर है. पैदा करने की लागत ज्यादा होने की वजह से किसान 50 रुपए प्रति किलो से ज्यादा के रेट पर सेब बेचने को मजबूर हो जाते हैं. रसूल कहते हैं, ''लागत कम करने के लिए हमें मशीनों का प्रयोग करना चाहिए और छिड़काव के लिए ड्रोन जैसी तकनीक अपनानी चाहिए. ये तकनीकें लागत 45 फीसद तक घटाकर व्यापार को फायदेमंद बना सकती हैं.''

बागवानी विभाग के नियोजन और विपणन के उप निदेशक मंजूर अहमद मीर का कहना है कि हाइवे की दिक्कतों के अलावा, बाजारों में ज्यादा सप्लाइ और उचित छंटाई (आकार और गुणवत्ता के अनुसार) की कमी भी कीमतों में गिरावट के लिए जिम्मेदार है. उनका यह भी दावा है कि कोल्ड स्टोरेज में जगह की कमी के कारण भी किसान अपनी उपज को खराब होने से पहले औने-पौने दाम पर ही बेचने को मजबूर हैं. कश्मीर हर साल 19 लाख मीट्रिक टन सेब पैदा करता है जिसमें से पिछले हफ्ते तक 9.60 लाख मीट्रिक टन सेब बाजारों में भेजा जा चुका था.

मीर का कहना है कि सरकार खरीदारों और किसानों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लाई है. लेकिन किसान पिछले अनुभवों को ध्यान में रखकर अंदेशे में हैं. अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद के महीनों में सरकार ने सेब की मजबूरन बिक्री को रोकने के लिए बाजार मूल्य हस्तक्षेप योजना शुरू की थी. इसमें किसानों से 12 लाख मीट्रिक टन सेब की सीधी खरीद शामिल थी. इसका उद्देश्य किसानों के मुनाफे को 2,000 करोड़ रुपए तक बढ़ाना था. मीर कहते हैं, ''उन्हें हरेक सेंटर पर 20-25 कर्मचारियों और विशेषज्ञों की प्रतिनियुक्ति करनी पड़ती थी. इस पर भारी लागत आई.'' मीर के अनुसार, पांच संग्रह केंद्रों से केवल 15,800 मीट्रिक टन सेब ही उठाए गए, जिससे यह योजना बंद हो गई. फिलहाल, घाटी के सेब बड़ी मुसीबत में हैं.

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