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कितने बागी थे, ठाकुर!

भाजपा के लिए राहत की बात बस इतनी-सी ही है कि उसकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को घोर गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है

मोर्चे पर खुद मोदी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अक्तूबर को कुल्लू में सीएम जयराम ठाकुर के साथ
मोर्चे पर खुद मोदी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अक्तूबर को कुल्लू में सीएम जयराम ठाकुर के साथ
अपडेटेड 5 नवंबर , 2022

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा दीवाली के ठीक पहले हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में अपने पैतृक गांव विजयपुर पहुंचे जरूर लेकिन धूमधाम से त्योहार मनाना उनकी पहली प्राथमिकता बिल्कुल नहीं रह गया था. 12 नवंबर को विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में उनके सामने सबसे जरूरी काम था टिकट वितरण से असंतुष्ट नेताओं को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ बैठकर कोई रास्ता निकालना. हिमाचल में 1985 के बाद से कोई भी मुख्यमंत्री वापस सत्ता में नहीं लौटा. इस तथ्य के मद्देनजर सत्ताविरोधी लहर को मात देने की रणनीति के तहत भाजपा ने दो मंत्रियों सहित 11 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए. कुल 23 नए चेहरों को मैदान में उतारे जाने से पार्टी के कुछ नेताओं ने बागी तेवर अपना लिए. बागियों ने 14 सीटों पर पर्चा भरा है और भाजपा का अपना आकलन है कि इस विद्रोह से पांच-छह निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी को नुक्सान हो सकता है.

मसलन, बंजार में भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र शौरी को निर्दलीय प्रत्याशी कुल्लू के पूर्व शाही परिवार के वंशज हितेश्वर सिंह और कांग्रेस उम्मीदवार खिमी राम शर्मा से मुकाबला करना होगा. शर्मा भाजपा की राज्य इकाई के पूर्व प्रमुख हैं. बीती जुलाई में ही वे कांग्रेस में चले गए थे. निर्दलीय हितेश्वर के पिता महेश्वर सिंह को भाजपा ने कुल्लू सीट से उम्मीदवार बनाया है. चुनाव प्रचार में लगने से पहले अपने घर की व्यवस्था ठीक करने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर कुल्लू और आंतरिक असंतोष से सबसे अधिक प्रभावित अपने गृहनगर मंडी के बीच चक्कर लगा रहे हैं. नड्डा को भी अपने करीबियों के बीच मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनके बेहद करीबी और बिलासपुर के विधायक सुरेश ठाकुर को उनके ही एक दूसरे विश्वासपात्र त्रिलोक जामवाल के लिए जगह छोड़नी पड़ी है.

साफ बात है कि ''नया रिवाज बनाएंगे'' के नारे के साथ राज्य की सत्ता में वापसी के लिए प्रचार अभियान शुरू करने के पहले नड्डा और मुख्यमंत्री पार्टी, खासकर अपने-अपने गृह जिलों में बगावत से परेशान हैं. सत्ताविरोधी भावना के अलावा मुख्यमंत्री ठाकुर को कोविड-संबंधी प्रतिबंधों के कारण व्यवसायों में गिरावट और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है. फिर भी जो बातें उनके पक्ष में जाती हैं उनमें केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं की लोकप्रियता के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का बरकरार रहना, राष्ट्रवाद का मुद्दा और उनकी अपेक्षाकृत साफ छवि और सहज सुलभता शामिल हैं.

इस पहाड़ी राज्य में परंपरागत रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है. 2017 में जब भाजपा को कुल 68 में से 43 सीटें मिली थीं, तब भी 20 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का अंतर 3,000 से कम और छह में 1,000 से कम था. भाजपा नेताओं को उम्मीद है कि इस बार आम आदमी पार्टी (आप) को भी अच्छा समर्थन मिलेगा और वह कांग्रेस के वोट काटेगी. हालांकि जमीन पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

भाजपा के लिए सांत्वना की एकमात्र बात यह है कि कांग्रेस भी उसी जैसी या शायद उससे भी गहरी चुनौतियों से जूझ रही है. कांग्रेस के प्रचार अभियान का नेतृत्व प्रियंका गांधी और पार्टी की राज्य इकाई की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह कर रही हैं, जो दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की विधवा हैं. प्रतिभा सिंह के मुख्य रणनीतिकार हर्ष महाजन हाल ही में पाला बदल कर भाजपा में चले गए थे. प्रतिभा सिंह परिवार की एक और वफादार पवन काजल भी भाजपा में चली गई थीं और अब कांगड़ा से भाजपा की उम्मीदवार हैं. कुलदीप सिंह राठौड़, सुखविंदर सिंह सुक्खू, आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री जैसे नेताओं की अगुआई वाले विभिन्न गुटों के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा और वरिष्ठ नेता विद्या स्टोक्स के वफादारों के साथ कांग्रेस की राज्य इकाई भारी गुटबाजी का शिकार है. उत्तराखंड और पंजाब में आंतरिक कलह के कारण मिली चुनावी हार से कुछ सबक लेने के बाद कांग्रेस ने अब तक हिमाचल प्रदेश में प्रतिभा सिंह को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. यहां कांग्रेस को 2014 और 2019 के आम चुनाव के साथ ही 2017 के विधानसभा चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा है. 

चंडीगढ़ में पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक आशुतोष कुमार के अनुसार, चुनाव प्रचार के लिए कांग्रेस को विश्वसनीय चेहरे के पीछे एकजुट होने की जरूरत है, लेकिन बड़े पैमाने पर गुटबाजी इसमें बड़ी बाधा है. राज्य में नेतृत्व संकट के मद्देनजर पार्टी को पांच लाख नौकरियां देने, महिलाओं को 1,500 रुपए मासिक सहायता और 300 यूनिट मुफ्त बिजली प्रदान करने जैसी 10 गारंटियों वाले चुनाव घोषणापत्र के साथ मतदाताओं तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है. पार्टी ने बीते 31 अगस्त को इन 10 गारंटियों की घोषणा की थी.

उधर, भगवा खेमे में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और ससुर गुलाब सिंह ठाकुर को टिकट नहीं दिया गया है. इसके पहले, उनके करीबी विश्वासपात्र रविंदर सिंह रवि का चुनाव क्षेत्र बदला गया था. उन्हें ज्वालामुखी से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया है जबकि ज्वालामुखी के मौजूदा विधायक रमेश धवला अब देहरा सीट से चुनाव लड़ेंगे जहां से रविंदर पिछली बार हार गए थे. अनुराग ने पिछले दिनों दिल्ली में कहा था कि हिमाचल के अगले मुख्यमंत्री के बारे में निर्णय केंद्रीय नेतृत्व करेगा. इस बयान में उनके समर्थकों के लिए संदेश स्पष्ट था. बहरहाल, बाद में 22 अक्तूबर को अनुराग ने यह बयान देकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को कुछ राहत पहुंचाई कि केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी और राज्य में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के होने से हिमाचल को फायदा होगा.

नड्डा ने ऐलान किया था कि पार्टी जयराम ठाकुर के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी, लेकिन भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया है. 2020 में असम विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को बदल दिया गया था, लेकिन पुष्कर सिंह धामी चुनाव हारने के बावजूद उत्तराखंड के सीएम बने रहे. हिमाचल चुनाव जीतने पर भाजपा जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाए या न बनाए, इतना साफ है कि उनका मौजूदा काम बागियों को कैसे भी शांत करना और पार्टी के उम्मीदवारों की जीत तय करना है.

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