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प्रधान संपादक की कलम से

भारतीय मूल के एक शख्स का ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च पद पर विराजमान होने का सीधा-सादा तथ्य अजीबोगरीब किस्म के मॉडर्न ड्रामे की तरह है. ऐसा ड्रामा जिसमें जागीरदार के राजकुमार बन जाने से जुड़ी पुरानी परीकथाओं के स्पष्ट निशान हैं

18 नवंबर, 2020 का आवरण
18 नवंबर, 2020 का आवरण
अपडेटेड 5 नवंबर , 2022

अरुण पुरी

महज 42 वर्षीय ऋषि सुनक ने 200 साल में सबसे कम उम्र का और एशियाई मूल का पहला ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनकर इतिहास के पन्नों में जगह बना ली है. लेकिन आने वाली पीढ़ी का दिल जीतने के लिए उन्हें फौरन युद्धस्तर पर जुटना होगा. उनके सामने हालात विकट हैं. ब्रिटिश अर्थव्यवस्था कोविड की मार के अलावा सुनक के पूर्ववर्तियों और खुद कुछ उनके भी गलत कदमों से तबाह हुई है और उसे तुरंत सुधार के उपायों की जरूरत है. महंगाई 40 साल के सबसे ऊंचे मुकाम 10 फीसद पर है और इससे आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है.

सुनक के बचपन वाले दिनों के बाद से ब्रिटेन ने ऐसे दिन नहीं देखे थे. यूक्रेन युद्ध के चलते ईंधन की आसमान छूती कीमतों ने तकलीफ और बढ़ा दी. हालांकि गैस की कीमतों में कमी के अनुमान ने थोड़ी आस बंधाई है. सबसे बढ़कर तो यह कि ब्रिटिश सियासत और वित्तीय नीति-निर्माता बुरी तरह से दोफाड़ हो चुके हैं. सरकार और जनता की मद में बड़े खर्चों तथा ब्रेग्जिट और उसके सामने आते नतीजों को लेकर भयंकर मतभेद हैं. ऋषि सुनक को क्या करना चाहिए? खासकर जब उनकी पार्टी के भीतर भीषण मतभेद हों और अगले आम चुनाव से पहले आर्थिक दलदल से उबरने के लिए उनके पास महज दो साल का वक्त हो, ऐसे में वे क्या कर सकते हैं? 

दरअसल, उन्हें कुछ फौरी उपायों के साथ ही कुछ दूरदर्शी कदम उठाने होंगे. ये दोनों चीजें गहरे विवेक तथा ठंडे दिमाग की मांग करती हैं. सुनक के पास अनुभव की कमी के बावजूद राजनैतिक चतुराई और आर्थिक अक्लमंदी पर्याप्त है. उनसे पहले आकर चले गए बोरिस जॉनसन और लिज ट्रस के घोर अनाड़ीपन के मुकाबले उनकी क्षमताएं साफ दिखाई देती हैं. जिस शख्स ने उन्हें ब्रिटेन के खजाने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उन्हीं जॉनसन के खिलाफ हमले का सही वक्त चुनकर वे अपनी सियासी फुर्ती का परिचय दे चुके हैं. फरवरी, 2020 से जुलाई, 2022 तक वे वित्त मंत्री रहे और ठीक उन्हीं दिनों उन्हें अप्रत्याशित कोविड का सामना करना पड़ा. सुनक ने ब्रिटेन को उस मुश्किल दौर से बाहर निकालते हुए अपनी क्षमताओं का परिचय दिया, भले ही उन्होंने अल्पकालिक उपाय किए हों. 

10, डाउनिंग स्ट्रीट में रहने के लिए अपना दावा पेश करते हुए ऐन मौके पर उन्हें ट्रस के हाथों हार का सामना करना पड़ा, जिनके करों में भारी कटौती के वादे ने कंजर्वेटिव पार्टी के उदारपंथियों को रिझा लिया. ट्रस ने पुराने राजकोषीय और मौद्रिक नीति प्रतिष्ठान को आमूलचूल बदलने का वादा किया. आर्थिक मामलों में उनसे ज्यादा पढ़े-लिखे सुनक ने ज्यादा संयमित दूरदृष्टि पेश की. ट्रस ज्यों-ज्यों अपने अनियोजित और बेपरवाह रास्ते पर आगे बढ़ीं, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के भीतर खौलते टकराव ऐसे मुहाने पर आ गए जहां फौरन कुछ न कुछ करना जरूरी हो गया. एक तरफ तो उन्होंने फ्रैकिंग यानी चट्टानें तोड़ने पर लगी ब्रिटिश पाबंदी हटा ली. यह तेल और गैस उत्खनन का विवादास्पद तरीका था, जिस पर एक उत्खनन स्थल पर भूकंप दर्ज किए जाने के बाद 2019 में रोक लगा दी गई. उन्होंने हाउस ऑफ कॉमंस में इस नीति को पारित तो करवा लिया, पर 'धौंस-डपट' के आरोपों ने खासी ठेस पहुंचाई. और कहीं बुरा यह हुआ कि उन्होंने जबरदस्त कर कटौतियों के सहारे के लिए कुछ भी नहीं किया. लिहाजा अपशगुन के अंदेशे से बॉन्ड बाजार सहम गए और मॉर्गेज की दरों में बढ़ोतरी के साथ बाजारों के चौतरफा टूटने का खतरा साफ नजर आने लगा.

सुनक खुद को किस्मत वाला मान सकते हैं कि वे जॉनसन के बाद हुए मतदान में हार गए और दूसरी ओर ट्रस ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. लंदन से शफी रहमान ने हमारे लिए लिखा है कि अभी तो सुनक से ब्रिटेन की संस्थाओं में संतुलन कायम करते हुए देश को राजकोषीय रूढ़िवाद के रास्ते पर वापस लाने की उम्मीद की जा रही है. उन्हें वित्तीय बिरादरी और साथ ही मतदाताओं को खुश करने वाली महंगाई की नीति तैयार करनी होगी, जो आसान नहीं है. विडंबना देखिए कि असल समस्या ब्रेग्जिट से शुरू हुई, जिसके वे हिमायती रहे थे. बोरिस जॉनसन की अफरा-तफरी भरी हुकूमत ने इस समस्या के लिए आग में घी का काम किया. अब सुनक यूरोप के साथ ज्यादा सहयोग का वादा कर रहे हैं. गहरे पैठी विचारधारा के बजाए व्यावहारिक नजरिया अब उनकी पहचान मालूम देता है और ब्रिटेन को शायद इसी की जरूरत है. कोविड की उदासी और मायूसी के बीच जॉनसन के ऊंचे रहन-सहन और ट्रस के निहायत उतावलेपन ने जो चिंताजनक तस्वीर पेश की, उसके बाद सुनक तमाम सर्वेक्षणों में लेबर पार्टी से पीछे चल रही कंजर्वेटिव पार्टी की तार-तार छवि में तत्काल कुछ पैबंद लगा सकते हैं.

जहां तक सुनक की पृष्ठभूमि की बात है, वह उनके खिलाफ जाती है या कम से कम उनके काम को ज्यादा मुश्किल बनाती है. आव्रजन के मामले में उनका रुख बहुत उदार दिखाई न देने की बेसब्री से तय होने की ज्यादा संभावना है. उनके विचार वही हैं जो पूर्व गृह मंत्री प्रीति पटेल और उनकी उत्तराधिकारी तमिल-गोअन मूल की सुएला ब्रेवरमैन सरीखे अन्य भारतीय मूल के टोरी सदस्यों के हैं. यही कि खुद अंदर होने के बाद दरवाजा बंद कर लो. सुनक ने प्रधानमंत्री बनने के पहले ही दिन सुएला को बहाल करके और रवांडा आव्रजन नीति का जोरदार समर्थन करके तीखी टिप्पणियों को दावत दे डाली. इस नीति के तहत किसी भी देश के अवैध प्रवासियों को अफ्रीकी देश रवांडा भेज दिया जाता है. यह भारत से साथ संभावनाओं से भरपूर उस मुक्त व्यापार समझौते की बड़ी अड़चनों में से एक है जिसका लक्ष्य दोनों देशों के बीच व्यापार को 2030 तक दोगुना करना है.

एक और मामले में वे कमजोर होंगे. ऋषि सुनक अमीर यानी काफी अमीर हैं. उनकी वेंचर कैपिटलिस्ट पत्नी अक्षता मूर्ति इन्फोसिस के चेयरमैन एमेरिटस एन.आर. नारायणमूर्ति की बेटी हैं, जिनकी निजी दौलत 4.5 अरब डॉलर के आसपास है. अक्षता इन्फोसिस में अपने 0.93 फीसद हिस्सेदारी की बदौलत 71.5 करोड़ डॉलर की मालकिन हैं और इसके साथ दंपति की निजी संपदा करीब 81 करोड़ डॉलर है. यह इंग्लैंड के राजा की दौलत से एक-चौथाई ज्यादा है. ब्रिटिश राजपरिवार के महलों और जेवर-गहनों को छोड़ दें तो चार्ल्स तृतीय की अपनी दौलत महज 50 करोड़ डॉलर है. सुनक अब तक के सबसे अमीर ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैं. इसमें विनचेस्टर कॉलेज की उनकी पढ़ाई-लिखाई, जहां मौजूदा फीस 45,000 पाउंड के आसपास है, और गोल्डमैन सैक्स तथा कुछ अन्य हेज फंड में उनके करियर को जोड़ लें तो कुलीनता में रची-बसी जिंदगी साफ दिखाई देती है. ब्रिटिश प्रेस क्रूर और काफी पक्षपाती है. आम आदमी की तकलीफों से बेखबर होने के लिए उन पर हमले किए जा रहे हैं और आगे भी वे ऐसे हमलों की उम्मीद कर सकते हैं.

उनकी जिंदगी के इन दो पहलुओं की वजह से उनके हर कदम की तीखी से तीखी पड़ताल होगी. भारतीय मूल के एक शख्स का ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च पद पर विराजमान होने का सीधा-सादा तथ्य अजीबोगरीब किस्म के मॉडर्न ड्रामे की तरह है. ऐसा ड्रामा जिसमें जागीरदार के राजकुमार बन जाने से जुड़ी पुरानी परीकथाओं के स्पष्ट निशान हैं. अब इसका क्या ही मतलब है कि वे ब्रिटिश भारतीयों की नुमाइंदगी महज नाममात्र और प्रतीकात्मक ढंग से ही करते हैं. उनका संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रिचमंड, यॉर्क, मुख्य रूप से श्वेतों से आबाद ग्रामीण भूभाग है, जहां एशियाई महज 1 फीसद हैं. ऋषि सुनक को अब परीकथा और क्रूर यथार्थ के बीच अपना इम्तिहान देना होगा. अगर वे नाकाम रहते हैं तो इतिहास उन्हें एक ऐसे नाइटवॉचमैन के रूप में दर्ज करेगा जिसे टोरी सदस्यों ने ढलती रोशनी में टूटती-दरकती पिच पर भेज दिया था.

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