वामपंथी राजनीति ने देश को कई दिग्गज दिए और उनमें एक, इस 23 अक्तूबर को 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं. केरल के पूर्व मुख्यमंत्री तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या माकपा के 32 संस्थापकों में अकेले जीवित सदस्य वेलिक्काकथु शंकरन (वीएस) अच्युतानंदन ने इस जश्न को चुपचाप राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में अपने परिवार के सदस्यों के साथ मनाया. अक्तूबर 2019 में लकवे ने इस दिग्गज कम्युनिस्ट की आवाज और चलने-फिरने की ताकत छीन ली और संक्रमण के डर से आगंतुकों का आना भी सीमित हो गया.
मगर चाहने वाले शुभचिंतक हर सुबह अपने नेता की एक झलक पाने के लिए बाहर इंतजार करते हैं, जब वे अपने बेटे के घर के बरामदे में आकर बैठते हैं. अलपुझा जिले में उनके गृहनगर पुन्नपरा में जन्मदिन पर अभिनंदन के लिए उनके कसीदे पढ़े गए और खीर बांटी गई. राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने शुभकामनाएं भेजीं, तो मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने भी, जिनके साथ उनके रिश्ते बीते कुछ साल के दौरान मुश्किल रहे हैं.
वीएस में मुश्किलों से जूझने की ताकत हमेशा से रही है. चार वर्ष की उम्र में मां अचम्मा और सात बरस बाद पिता शंकरन को खोने के बाद अपनी जिंदगी की कमान उन्होंने खुद संभाली. स्कूल की पढ़ाई अधबीच छोड़कर वे अपने बड़े भाई की टेलरिंग की इकाई से सहायक के तौर पर जुड़े और फिर उसे छोड़कर जूट की जालियां बनाने का काम करने लगे. 1938 में कांग्रेस से जुड़े और दो साल बाद क्रांतिकारी पी. कृष्ण पिल्लै से प्रेरित होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए. 1958 में जब वे अलपुझा जिला सचिव थे, उन्हें देविकुलम उपचुनाव के लिए प्रचार अभियान का संयोजक बनाया गया. पार्टी उपचुनाव जीती और पार्टी में उनकी प्रतिष्ठा और भी पुख्ता हो गई. तब त्रावणकोर के दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर से टकराने की वजह से उन्हें साढ़े पांच साल जेल में भी बिताने पड़े. पार्टी के आम कार्यकर्ता से बड़ा नेता बनने का उनका सफर खालिस पक्के इरादे और गहरे राजनैतिक सरोकार का गवाह है.
दस साल उनके निजी सचिव रहे ए.जी. शशिधरन याद करते हैं, ''वीएस ने केरल को पर्यावरण अनुकूल राजनीति, उपभोक्तावाद और कम्युनिस्ट आंदोलन में आए 'भटकावों' से लड़ने, स्त्री-पुरष समता की राजनीति के बारे में लोगों को संवेदनशील बनाने और महिलाओं तथा बच्चों के उत्पीड़कों का मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया.'' एडिशनल सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त 78 वर्षीय शशिधरन आगे कहते हैं, ''2001 में वे नेता विपक्ष के नाते लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गए.
तब वे 78 बरस के थे और फिर भी उन्होंने यूडीएफ के ए.के. एंटनी और ओमन चांडी की अगुआई वाले मंत्रालयों में भ्रष्टाचार सरीखे ज्वलंत मुद्दे उठाते हुए राज्य भर के दौरे किए. इससे तमाम पार्टियों और तमाम आयु वर्ग के लोगों में उनके प्रशंसकों का आधार बना और लड़ाई का मैदान तैयार हुआ जिसके बूते एलडीएफ 2006 में सत्ता में आया.'' शशिधरन के लिए उनके मार्गदर्शक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि बहुतेरे उकसावों और कद छोटा करने की तमाम साजिशों के बावजूद वे पार्टी के सदस्य बने रहे. माकपा के एक युवा नेता कहते हैं, ''केरल में उनकी काबिलियत का दूसरा नेता हमारे पास नहीं होगा. वे जुझारू हैं और उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. उन्होंने वे मुद्दे उठाए जो केरल में किसी और नेता ने नहीं उठाए.''
माकपा में लंबा वक्त गुजारने के बाद पार्टी में वीएस को अनूठी हैसियत हासिल थी. 1957 में वे अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के सेक्रेटरिएट के सदस्य बने और 1980 से 1992 तक माकपा के राज्य सचिव रहे. 1967, 1970, 2001, 2006, 2011 और 2016 में राज्य विधानसभा में चुनकर आए और 1992-95 और 2001-06 में नेता विपक्ष रहे. 2006 से 2011 तक उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री का दायित्व निभाया और 2016 से 2021 तक केरल प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष थे.
माकपा के एक बड़े नेता कहते हैं, ''2016 में जब पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी देने से इनकार कर दिया, उन्हें प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष पद स्वीकार नहीं करना चाहिए था. उन्होंने कैबिनेट रैंक का पद हासिल करने के लिए पिनरई और पार्टी के साथ समझौता किया. दुर्भाग्य से उसके बाद उन्होंने लोगों के साथ संवाद भी नहीं किया. राजनीति में अपनी बाकी पारी के लिए उन्हें खामोश करने की खातिर उनके परिवार के सदस्यों और पार्टी ने मिलकर साजिश की.'' मगर वीएस पहले ही काफी कुछ हासिल कर चुके थे.

