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अभी और बढ़ेगा शी का जलवा?

जी20 और एससीओ सम्मेलनों के लिहाज में थोड़े-बहुत कूटनीतिक बदलाव के बावजूद भारत के प्रति चीन का रवैया ज्यादा आक्रामक ही रहने वाला है

मजबूत होती पकड़ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
मजबूत होती पकड़ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
अपडेटेड 18 अक्टूबर , 2022

श्याम सरन

अक्तूबर की 16 तारीख को बीजिंग में आयोजित हो रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस पर दुनिया भर की नजरें टिकी होंगी. इसमें होने वाले विचार-विमर्श से चीन की घरेलू और विदेश नीतियों के बारे में अहम संकेत मिलेंगे, खास तौर पर ऐसे वक्त में जब भूराजनैतिक परिदृश्य में आमूलचूल बदलाव आ रहे हैं और चीन में राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिति ज्यादा चुनौतियों से भरी है. दुनिया भर में हर मुल्क बढ़ती अनिश्चितता और बेरहम किस्म के तेज बदलावों से जूझ रहा है. चीन भी अपवाद नहीं है. वह ज्यादा चुनौतीपूर्ण माहौल के लिए उपयुक्त रणनीति का निर्माण और उसे लागू करने की तैयारी कैसे कर रहा है?

चीन में पार्टी और सरकार के शीर्ष नेता शी जिनपिंग को इन पदों पर कम से कम और पांच साल बने रहने के लिए कांग्रेस की मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है. वे माओ त्से तुंग के बाद चीन के सबसे ताकतवर नेता तो बन ही गए हैं, कांग्रेस से पहले चल रही चर्चाओं से यह भी संकेत मिलता है कि वे और ज्यादा सत्ता तथा अधिकार हासिल करने में जुटे हैं. प्रतिष्ठा और सत्ता में उन्हें माओ के बराबर रखने की कोशिशों से इसकी झलक मिलती है. मसलन, खबरें आईं कि शी को पार्टी चेयरमैन बनाया जा सकता है, यानी वह पद जिसे कि 1982 में देंग श्याओ पिंग के अधीन तिलांजलि दे दी गई थी. वे माओ के नेतृत्व में सबसे ऊंची पहचान बन चुके एक नेता के इर्द-गिर्द विकसित पर्सनैलिटी कल्ट को खारिज करके ज्यादा सामूहिक नेतृत्व चाहते थे. पार्टी का संविधान पहले ही शी को पार्टी के असाधारण विचारक की मान्यता देता है. उनके विचारों को ''नए युग में चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर शी जिनपिंग के विचार'' के तौर पर संविधान में प्रतिष्ठापित किया गया है.

इस मुहावरे को ज्यादा सारगर्भित ''शी जिनपिंग के विचार'' से बदला जा सकता है. ऐसा करना उन्हें माओ के समकक्ष रखना होगा, जिनके विचार ''माओ त्से तुंग के विचार'' के तौर पर पिरोकर रखे गए हैं. पार्टी मीडिया शी का जिक्र उन्हें ''कर्णधार'' या ''खेवनहार'' कहकर करने लगा है, जो माओ को कहा जाता था. साफ है कि पार्टी कांग्रेस के बाद हमें चीन के ज्यादा ताकतवर, विचारधारा की तरफ ज्यादा झुके और ज्यादा हठधर्मी नेता की उम्मीद करनी चाहिए.

आर्थिक मोर्चे पर चीन अभूतपूर्व स्थिति से दो-चार है, जिसे कि संकटपूर्ण स्थिति कहें तो गलत न होगा. ढांचागत वजहों से चीन के लिए पिछले चार दशकों से ज्यादा वक्त की ऊंची जीडीपी वृद्धि दर को कायम रख पाना संभव नहीं है. अन्य परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं की तरह चीन भी घटती उत्पादकता का सामना कर रहा है. उसकी आबादी घटने लगी है और तेजी से बूढ़ी हो रही है. वह बाहरी आर्थिक माहौल खत्म हो चुका है, जो खुले बाजारों और कारगर सप्लाइ चेन को लेकर ''वाशिंगटन सर्वानुमति'' के इन सालों के दौरान चीन के लिए बहुत अनुकूल था.

ये ढांचागत कारक फिलहाल ज्यादा चक्रीय और अल्पकालिक कारकों की वजह से और ज्यादा धारदार हो गए हैं. इनमें ऋणग्रस्तता की ऊंची दर, शून्य-कोविड नीति पर कायम रहने की वजह से सप्लाइ चेन में व्यवधान और बहुत ज्यादा कर्ज से दबे संपत्ति बाजार का टूटना शामिल है, जो बीते सात साल से चीनी वृद्धि के असल पहिए रहे हैं. जीडीपी के 5.5 फीसद के मौजूदा लक्ष्य के मुकाबले इसके 3 फीसद या उससे भी कम के आसपास रहने का अंदेशा है. इस प्रतिकूल स्थिति से पार्टी कांग्रेस कैसे निबट सकती है?

चीनी मीडिया पर नजर डालने से पता चलता है कि आर्थिक झटकों की गंभीरता को स्वीकार करते हुए भी पार्टी नेतृत्व के शून्य-कोविड नीति को छोड़ने की संभावना नहीं है और इसलिए बार-बार लॉकडाउन और आर्थिक व्यवधान बने रह सकते हैं. शून्य-कोविड नीति निजी तौर पर शी जिनपिंग से जुड़ी है और महामारी की शुरुआती लहर के दौरान इसे महान कामयाबी के रूप में देखा गया था. इसे समाजवादी व्यवस्था की श्रेष्ठता और शी जिनपिंग के नेतृत्व की श्रेष्ठतर बुद्धिमता का प्रदर्शन कहकर पेश किया गया था. अब यह कैसे कहा या स्वीकार किया जा सकता है कि कहीं वे गलत तो नहीं थे?

चीनी निजी क्षेत्र की अलीबाबा और वीबो सरीखी सबसे कामयाब और ऊर्जावान संस्थाओं पर रेगुलेटरी हमले को रोकने या उलटने की भी कोई संभावना नहीं है. चीनी अर्थव्यवस्था के आर्थिक और प्रौद्योगिकीय कायाकल्प के अग्रिम रखवालों के रूप में सरकार की मिल्कियत वाले उद्यमों (एसओई) की तस्दीक की जाएगी. संपत्ति के संकट से निबटने में भी ये एसओई ही वित्तीय मुश्किलों से घिरी निजी कंपनियों के कायापलट की अगुआई कर रहे हैं. आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर अब भी ''डुअल सर्कुलेशन'' नीति के तहत ही दिया जा रहा है, जो साफ तौर पर आयात प्रतिस्थापन और बनिस्बतन प्रौद्योगिकीय स्वायत्तता को प्रमुखता देती है.

महज व्यावहारिकता के बजाए विचारधारा से जुड़े कारक आर्थिक फैसलों को प्रभावित करेंगे. संभावना यही है कि हम टेक्नोलॉजी के मामले में आत्मनिर्भरता पर जोर दिए जाते देखेंगे और यह नई पीढ़ी के ज्यादा ऊंचे पढ़े-लिखे और टेक्नोक्रेट नेताओं के उभार में दिखाई दे सकता है. शी जिनपिंग मानते हैं कि टेक्नोलॉजी भविष्य का निर्णायक रणक्षेत्र और आधुनिक देशों में सत्ता का स्रोत होगी. उम्मीद करनी चाहिए कि हाइ टेक्नोलॉजी की क्षमताएं हासिल करने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा और निवेश किया जाएगा.

पार्टी नेतृत्व को बखूबी पता है कि उसका मुकाबला ज्यादा प्रतिकूल और ऐसे वातावरण से है, जिसके बारे में अनुमान लगा पाना मुश्किल है. ज्यादा कोशिशों और यहां तक कि ज्यादा त्याग की अपील के साथ चीनी राष्ट्र के ''बड़े कायाकल्प'' की आसन्न उपलब्धि में नए सिरे से भरोसे पर जोर दिया गया है. पार्टी की पत्रिका चू शि में हाल ही प्रकाशित एक लेख में शी जिनपिंग ने लिखा: ''हमारी पार्टी को बड़ी चुनौतियों का असरदार ढंग से सामना करने, बड़े जोखिमों से बचाव करने, बड़े अवरोधों को पार करने और बड़े अंतर्विरोधों को हल करने में लोगों की अगुआई करने के लिए एकजुट होना चाहिए. नई ऐतिहासिक विशेषताओं के तहत हमें महान संघर्षों पर बल देना चाहिए.''

'बड़े' शब्द के बारंबार इस्तेमाल से इन चुनौतियों की गंभीरता की झलक मिलती है. शी दावा करते हैं कि देश ''अपना महान कायाकल्प हासिल करने के इतने करीब पहले कभी नहीं था, पर आखिरी मील का सफर खतरों और चुनौतियों से भरा होगा.'' विचार के तौर पर चीनी कायाकल्प की अनिवार्यता में अब अप्रत्याशितता की खुराक ने सेंध लगा दी है.

कांग्रेस के बाद चीनी विदेश नीति क्या होगी, इस बारे में क्या कह सकते हैं? अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की सोच यह मालूम देती है कि कांग्रेस में अपने नेतृत्व को मजबूत करने के बाद संभावना है कि शी जिनपिंग अमेरिका के साथ कुछ सुलह के कदम उठाएंगे, यह स्वीकार करते हुए कि रूस के पुतिन पर उनका दांव लगाना गलत निकला. चीन रूस से तो खुद को कुछ हद तक दूर कर सकता है, पर अमेरिका की तरफ बड़े बदलाव की संभावना नहीं है. शी की विचारधारात्मक वरीयताएं इस राह का रोड़ा हैं. यह अमेरिका-प्रेरित उन ''रंग क्रांतियों'' के खतरे के लगातार जिक्र से साफ है जो विचाराधारा को दूषित करके समाजवादी देशों की जड़ें खोदने और तख्ते पलटने की कोशिश करती हैं. हुकूमत की हिफाजत हमेशा अधिनायकवादी देशों की प्राथमिकता रही है.

इस पृष्ठभूमि में चीन की भारत नीति में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. कांग्रेस के बाद भारत के प्रति चीन के अधिक जोरदार, यहां तक कि अड़ियल रुख की ही संभावना है. भारत की अध्यक्षता में जी-20 और एससीओ की आने वाली बैठकों के मद्देनजर कुछ रणनीतिक बदलाव भले हों.

(श्याम सरन पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो हैं)

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