अरुणाचल प्रदेश का सबसे पश्चिमी हिस्सा तिब्बत और भूटान के बीच छोटी-सी नाक की तरह निकलता है. इसके सिरे के पास पांगचेन घाटी में जमीथांग गांव है. लहराते-बलखाते न्यामजंग चू दरिया के किनारे-किनारे फैला एक विशाल हरा-भरा मैदान. हम पहाड़ी सड़कों पर तवांग से लगभग 90 किमी की दूरी तय करते हैं—खूबसूरत संगेतसर झील पर चाय-पान के लिए रुकते हैं.
उसके प्रेयर फ्लैग्स तथा सुनहरी बत्तखों को निहारते हैं और 66 हेयरपिन-बेंड (बेहद तीखे मोड़) पर गाड़ी को साधते हुए इस चरागाह तक पहुंचते हैं. गांव ने लंच के लिए भोज का आयोजन किया है, जिसमें पोर्क (सूअर का मांस) भी शामिल है. ऐसा लजीज पोर्क मैंने अब तक नहीं खाया था. मुझे उम्मीद है कि 1958 में दलाई लामा को यही व्यंजन परोसा गया होगा, जब वे आजीवन निर्वासन के लिए पलायन के दौरान यहां आराम करने रुके थे.
आठ हजार फुट की ऊंचाई पर सूरज बहुत तेज चमकता है पर हवा ताजा है, पेय पदार्थ ठंडे हैं, और खाने के तो कहने ही क्या. गांव के बड़े-बूढ़ों के पैरों के बीच से लाल-लाल गाल वाले नन्हें-मुन्ने हमें झांक रहे हैं. आप चाहें तो घास पर थोड़ी देर झपकी ले सकते हैं या चीनी सीमा पर कथित कामोद्दीपक झील चामलिंग त्सो की सैर कर लें.
लेकिन हमारे 'ट्रांस-अरुणाचल ड्राइव 2022’ काफिले के तवांग में एकदम ठीक समय पर वापस आने की उम्मीद है, जिसे समय के पाबंद मुख्यमंत्री झंडी दिखाकर रवाना करेंगे. इस समारोह के साथ ही दो सप्ताह पहले राज्य के सुदूर पूरब में शुरू 2,400 किमी लंबी सड़क यात्रा यहां सबसे पश्चिमी छोर पर समाप्त हो जाएगी.
पर काफिला अधूरा है. तीसेक शक्तिशाली महिंद्रा 4X4 प्रतीक्षारत हैं, हूंहूं करती, गुस्से में भन्नाती-सी. रेडियो मैसेज गूंजता है, ''कौन बेवकूफ लंच के वक्त अपनी चाभी खो देता है!’’ डीपेस्ट रिमोट्सविले में मेरे सिवाय वह कौन होगा. खोजने के लिए हड़बड़ी में मैं दस मिनट इधर-उधर दौड़भाग करती हूं. मैं फिर काफिले से 13वीं सदी के स्तूप गोरसम चोर्टेन में जुड़ती हूं. आधुनिक 10-मंजिला इमारत की ऊंचाई के बराबर, 100 फुट लंबा चोर्टेन शांत और अप्रत्याशित-सा यह जंगल के बीच खोए हुए सामान-सा पड़ा है.
लेकिन यह सालाना गोरजम कोरा उत्सव के दौरान हजारों सैलानियों को आकर्षित करता है. ऐसा कहा जाता है कि मोनपा भिक्षु लामा प्रधर ने काठमांडू में एक मूली में बौद्ध स्तूप का मॉडल उकेरा और बुरी बलाओं से बचने के लिए उसी के आधार पर जमीथांग में स्तूप बनवा दिया.
अरुणाचल प्रदेश की 26 मुख्य जनजातियों में से एक मोनपा लोग जातीय और सांस्कृतिक दृष्टि से तिब्बत के करीब हैं; उनमें 100 से अधिक उप-जनजातियां हैं. इस राज्य के लोग—भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों के सबसे उत्तरी और पूर्वी भाग—घने जंगलों वाले पहाड़ों और बड़ी नदी घाटियों की तलहटी में बसे हैं. उनका इलाका उष्णकटिबंधीय मैदानों से लेकर पहाड़ों तक फैला है. इन जनजातियों में भारी विविधता है, हरेक की अपनी पोशाक, बोली, नृत्य और दूसरी जनजातियों के बारे में अलग राय. पर वे मेहमानों के लिए दिल खोलकर रख देते हैं.
अब जरा 1,370 किमी पीछे लौटते हैं, राज्य के बीचोबीच, पश्चिम सियांग जिले की ओर (मैं चार दिन बाद काफिले में शामिल हुई हूं, रीमा और मियाओ गांवों की याद आ रही है. वैसे, मैं 2021 में पहले ट्रांस-अरुणाचल ड्राइव में भी शामिल थी. लिहाजा, मैंने पूरब की दूसरी जगहों को देख रखा है जिसमें डोंग भी शामिल है, जहां उगते सूरज की सबसे पहली किरण भारत की भूमि पर पड़ती है).
कंबू गांव के लोग हमें अपने फूस के घरों में ले जाते हैं, जो हाल ही में सियोम नदी पर एक स्टील फुटब्रिज के जरिए दुनिया से जुड़ा है. पुल से एक किलोमीटर ऊपर की ओर बढ़ने पर हरियाली से लकदक पहाड़ियों और काली मिट्टी पर उतरी गोधूलि की कल्पना कीजिए.
अपनी गालो सजधज में पुरुष और महिलाएं स्वागत नृत्य के साथ हमें फिर से जीवंत करते हैं, फिर पहाड़ी की चोटी पर सामुदायिक केंद्र में एक ऊर्जावान सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान हम अपने बांस के कपों में स्थानीय वाइन अपांग बार-बार भरते हैं. हम सेल फोन की फ्लैशलाइट और हेडलैंप की मदद से संबंधित मेजबानों के साथ घरों में लौटते हैं.
रेयाम इते के घर का चूल्हा बड़ा है. घर में व्यस्त किचन-कम-लिविंग-कम-डाइनिंग रूम है. दो चूल्हों पर लोहे की जाली से लटका मांस सूख रहा है. उनका परिवार हमारे लिए रात का भरपूर भोजन तैयार करता है—चिकन, हरी पत्तेदार सब्जियां, ढेर सारा चावल, बीयर और अपांग.
मेहमानों के हाथ में गिलास खाली दिखे, यह अरुणाचलियों के लिए बरदाश्त के बाहर लगता है. एक बुजुर्गवार लडख़ड़ाते हुए आते हैं और आग के पास बैठकर कुछ बुदबुदाते रहते हैं. ''पड़ोसी हैं,’’ रेयाम बताते हैं. क्या ये अक्सर आते हैं? वे थोड़ा मुस्कराते हुए कहते हैं, ''रोज.’’ मैं उनके किशोर बेटे के प्रेम प्रसंग सुनती हूं और देर तक महिलाओं के साथ पीते हुए हंसी-ठठ्ठा करती हूं. कई अरुणाचली हिंदी या अंग्रेजी, या दोनों बोलते हैं, जिससे न केवल बाहरी लोगों से बल्कि उन जनजातियों के बीच भी संवाद में आसानी होती है जिनकी कोई समान बोली नहीं.
सुबह के समय धान के खेत तांबई रंग में चमकते हैं और सूरज की रोशनी से पहाडिय़ां नहाई हुई होती हैं. हमें नाश्ते के तौर पर सब्जी, चावल और साथ में चाय मिलती है. रेयाम हमें एक 'हर्गेन’ उपहार में देता है. शादी में इस्तेमाल की जाने वाली इस धातु की घंटी को यहीं के एक प्रतिष्ठित लोहार ने बनाया है. मैं पुल से पीछे मुड़कर देखता हूं, काश! हम वहां और ज्यादा वक्त बिता पते.
अरुणाचल प्रदेश की ज्यादातर सड़कें क्वालिटी के मामले में दिल्ली को भी नीचा दिखाती हैं. खासकर राज्य के पश्चिमी हिस्से में विश्व स्तरीय राजमार्ग और कोलतार वाली सड़कों पर गाड़ी चलाने में बहुत मजा आता है. पूर्व में कंबू से मेचुका तक की सड़क ऊबड़-खाबड़ है. मेचुका कभी इतना कटा हुआ था कि वहां पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर की सवारी करनी होती थी या एक हफ्ते तक पैदल चलना पड़ता था.
लिहाजा, कोई भी यहां तक कि खराब सड़क भी अपने आप में कामयाबी है. हम धुंधले पहाड़ों पर चढ़ते हैं जहां फूल खिल रहे हैं, हवा चल रही है, चिड़ियों का कलरव है. हम मेचुका में लंच के लिए पहुंचते हैं. सभी ने बारिश में पांच घंटे इंतजार किया है. लेकिन चिढ़ने की बजाए वे छंग, डांस और गर्मागर्म डिनर के साथ हमारा स्वागत करते हैं.
सुबह की रोशनी हमें यारग्याप चू नदी (सियोम) के तट पर 6,000 फुट की ऊंचाई पर एक बेदाग शहर दिखाती है, जो पहाड़ियों के बीच एक कटोरीनुमा इलाके में बसा हुआ है. 'मेचुका’, या 'मेनचुका’ नाम का अर्थ है ऐसा पानी जिसमें औषधियां घुली-मिली हों. हम फिर से भारत-चीन सीमा के नजदीक हैं, और कोई फोन कनेक्टिविटी नहीं है (हालांकि बीएसएनएल की एक या दो खूंटी हैं). ठीक ही है क्योंकि वहां फोन का सबसे अच्छा इस्तेमाल फोटो लेने के लिए होता है.
मेचुका के हरेभरे मैदानों में जंगली घोड़े चर रहे हैं, प्रेयर फ्लैग्स हवा में लहरा रहे हैं; कम ऊंचाई पर पानी से लदे बादल फिलहाल बर्फ से ढके पहाड़ों को छिपा रहे हैं. मेम्बा जनजाति के हमारे उदार होमस्टे मेजबान गेबू हमें इधर-उधर घुमा रहे हैं और वक्त कम है.
मुझे दलाई लामा के लिए भी अहमियत रखने वाले 400 साल पुराने समतेन योंगचा मठ या फिर क्षेत्र की सबसे लंबी जिप-लाइन के बीच एक का चुनाव करना होगा. इसमें ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं—मैंने कभी जिप-लाइन का सफर नहीं किया. यह 800 मीटर लंबा है, नदी के ठीक उस पार, घाटी के विहंगम दृश्य के साथ. वाह!
मेचुका सामरिक महत्व वाला इलाका है. हमें 13 ग्रेनेडियर्स के साथ डिनर पर न्यौता गया है. सेना शिष्टाचार और समारोह से पीछे नहीं हटती, भले मूसलाधार बारिश हो रही हो. हम उन पुरुषों और महिलाओं से मिलते हैं जो घर से दूर दृढ़ता और मुस्कान के साथ सेवा करते हैं; मैं झारखंड के एक अधिकारी से बात करती हूं जिनके पास स्पेनिश की डिग्री है. दोनों में कोई मेल नहीं है, लेकिन यह असंगति सही लगती है.
मेचुका के आसपास देखने और करने के लिए बहुत कुछ है, जिसमें धार्मिक चीजें शामिल हैं—मठ, एक गुफा के पास बना गुरुद्वारा जहां गुरु नानक (या गुरु रिम्पोचे पद्मसंभव, यह इस पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं) ने कथित तौर पर ध्यान लगाया था, और एक प्राकृतिक चट्टान, जिसे अगर आप थोड़ा आंख भींचकर देखें तो हनुमान जैसी लगती है. कई घरों पर डोनी पोलो धर्म (शाब्दिक रूप से सूरज चांद) के झंडे फहरा रहे हैं.
अरुणाचल प्रदेश में पांव पसारते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का अनुमान है कि देशज, एनिमिस्ट डोनी पोलो हिंदू धर्म का ही हिस्सा है, और राज्य सरकार हिंदू धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहन दे रही है. मुझे उम्मीद है कि जेंडर इक्वलिटी, गोमांस खाने वाले इस प्राचीन राज्य पर्यटन को उन सभी के साथ संतुलित किया जा सकता है जो अरुणाचल को खूबसूरत बनाते हैं.
पासीघाट में सियांग नदी के तट पर ओकेन तायेंग के अद्भुत एबोरकंट्री रिवर कैंप रिजॉर्ट में रात भर बारिश की बूंदें मेरी झोपड़ी पर गिरती हैं. इसकी प्राकृतिक सुंदरता मैंने चार साल पहले एक राफ्टिंग अभियान के दौरान देखी थी. सुबह का मौसम साफ है, और पक्के-केसांग का रास्ता सुहाना है.
पक्के-केसांग में पिछले साल एक यादगार पड़ाव डाला था—हरी-भरी पहाड़ियों के बीच विशाल घाटी में टिमटिमाते तारों के नीचे टेंटों का घेरा—लेकिन सड़क के पास नए फोर सिस्टर्स रिजॉर्ट में मुझे एक असली बाथरूम मिल जाता है. इस रिजॉर्ट को पारंपरिक हॉर्नबिल हेडगियर पहने एक न्यीशी शख्स चलाते हैं.
दिरांग गांव पहुंचने में सात घंटे लगने चाहिए लेकिन भूस्खलन की वजह से सड़क के उस पार एक पेड़ आ गिरा है. बुलडोजर अपना काम कर रहे हैं जबकि हम लोग धुंध, बूंदाबांदी में कॉफी की चुस्की ले रहे हैं, हमारा सफर एक बार फिर थम गया है. अरुणाचल आम तौर पर भव्य है, लेकिन रूपा और शेरगांव के आसपास यह खासतौर पर शानदार है, जिसमें पीली-लाल और कटी-फटी धाराएं बारिश और हवा से टकराती हैं. इस इलाके के शेरदुकपेन लोग तिब्बती और असमिया दोनों विरासत का दावा करते हैं और फलों की खेती करते हैं.
दिरांग जश्न मनाने की जगह है—सचमुच हम इस सफर के प्रमुख लखपा त्सेरिंग के घर पर पार्टी करते हैं. सबसे पहले, एक सांस्कृतिक स्वागत—पूरी रात रामायण जैसी कहानी का संक्षिप्त मंचन, जिसे पेश करते हैं नकाबपोश सूफी किस्म के नर्तक—उसके बाद कराओके और डांस की बारी आती है, क्योंकि अरुणाचलियों को संगीत के साथ बढ़िया शराब पसंद है.
मेरे पास लखपा की पत्नी की ओर से दी गई घर में बनी ऐसी शराब है, जिसके दो घूंट से ही होश फख्ता हो जाते हैं और मैं जानबूझकर गिलास रख देती हूं. लेकिन वे मुझे खाली हाथ देखकर दूसरा गिलास थमा देती हैं. मुझे नीट व्हिस्की जैसे हल्के ड्रिंझक की तलाश है.
मैं इस जलसे में बेहोश होने से अप्रत्याशित रूप से बच गई, और 13,700-फुट सेला दर्रे तक धुंध भरी सड़क पर ड्राइव के लिए तैयार हूं; हम धूप वाले इलाके में पहुंच जाते हैं और हमें नीचे की ओर बादल नजर आते हैं, जैसे मदहोश फरिश्ते मंडरा रहे हों. पिछले साल इस दर्रे में बर्फ जमी हुई थी और सेला झील जम गई थी; अभी चारों ओर जंगली फूल खिले हुए हैं और पानी बिल्कुल साफ है लेकिन हवा अब भी उतनी ही तेजी से बह रही है. हम तवांग जिले में नीचे उतरते हैं और शानदार जंग फॉल्स या नूरनंग फॉल्स पर रुकते हैं—यहां जलप्रपात झरझर गिरता है और पानी से उठे धुंध में इंद्रधनुष अपनी छटा बिखेर रहा है.
शाम ढलते ही हम तवांग शहर के 400 साल पुराने गादेन नामग्याल ल्हात्से मठ या तवांग मठ के गेस्टहाउस में अपने बैग रख देते हैं. इसे या 1962 के युद्ध स्मारक को देखना न भूलें जिसे चीनियों से लड़ते हुए शहीदों की याद में बनाया गया है. मैंने पिछले साल राज्य के दूसरे छोर पर वालोंग में युद्ध का मैदान देखा, जहां 1962 में काफी लोग मारे गए थे. यह विडंबना है कि अरुणाचलवासी, जिन्हें अक्सर स्वदेशी भारतीय नस्ली फब्तियों का शिकार बनाते हैं, खास तौर पर देशभक्त हैं.
मैं अपने दो ट्रांस-अरुणाचल ड्राइव्ज के अनुभवों से बता सकती हूं कि अरुणाचल शानदार है. इसके लोग दिलचस्प और नरमदिल हैं. यह विश्व जैव विविधता विरासत स्थल है. यह सोलो ट्रैवलर्स यहां तक कि महिलाओं के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित है. इसका आनंद लीजिए, इसे गंदा मत कीजिए, इसके मेहमाननवाज स्वभाव का बेजा फायदा मत उठाइए, न ही इसे ऐसी जगह में तब्दील करके रख दें जिसके कि हम आदी रहे हैं. ठ्ठ
—मिताली सरन

