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शिमला की मुश्किल राह

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर विधानसभा चुनावों में पार्टी का चेहरा बने रहेंगे, हालांकि उन्हें एक नौसिखुआ प्रशासक के रूप में देखा जाता है

बड़ी जंग : मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ही चुनाव में भाजपा का चेहरा होंगे; पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह कांग्रेस की राज्य इकाई की प्रमुख हैं
बड़ी जंग : मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ही चुनाव में भाजपा का चेहरा होंगे; पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह कांग्रेस की राज्य इकाई की प्रमुख हैं
अपडेटेड 5 सितंबर , 2022

कांग्रेस की राज्यव्यापी युवा रोजगार यात्रा जुलाई के आखिर में हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन राजधानी धर्मशाला से शुरू हुई. इसे एक तरह से नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के प्रचार अभियान की शुरुआत माना जा रहा है. इससे पहले पार्टी सूत्रों ने दावा किया कि नेताओं में चल रही आपसी किचकिच को दूर कर लिया गया है. हालांकि पार्टी में एकजुटता कायम कर पाना इतना आसान भी नहीं है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य इकाई की संचालन समिति की अध्यक्षता जी-23 समूह के नाम से बागी गुट के सदस्य के रूप में जाने जाते रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा कर रहे हों. शर्मा ने पार्टी की ओर से ''निरंतर उपेक्षा और अपमान'' का आरोप लगाते हुए 21 अगस्त को विरोध में वह पद ही छोड़ दिया. छह दिन बाद उन्होंने पार्टी छोड़ने वाले पुराने दिग्गजों की सूची में सबसे नए नाम—गुलाम नबी आजाद से मुलाकात की तो स्थानीय इकाई के लिए बड़ी ऊहापोह वाली स्थिति पैदा हो गई. इसके चलते हिमाचल प्रदेश के प्रभारी और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआइसीसी) के सचिव राजीव शुक्ला अब कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गए हैं. 

स्थानीय राजनीति उन्हें चैन की सांस नहीं लेने दे रही. दिवंगत वीरभद्र सिंह की 60 साल पुरानी विरासत को जारी रखने के साथ-साथ अन्य गुटों के साथ भी बढ़िया तालमेल बनाए रखते हुए हिमाचल कांग्रेस में सबको साथ लेकर चलना, इतना आसान काम तो है नहीं. छह बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र मंडी, कुल्लू, कांगड़ा, शिमला, सोलन और सिरमौर जैसे हिमाचल के पुराने क्षेत्रों पर अपनी मजबूत पकड़ के साथ गुटबाजी को खत्म करने में कामयाब रहे. साल 2017 में, पार्टी के 21 में से 13 विधायक इन जिलों से आए थे. नवंबर 2021 में, उनकी मृत्यु के बाद कांग्रेस को सहानुभूति लहर का लाभ मिला और उपचुनावों में उसने तीन विधानसभा सीटों के साथ-साथ मंडी लोकसभा सीट पर जीत हासिल की थी. उस लय को बनाए रखने के लिए वीरभद्र की विधवा प्रतिभा सिंह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है. इसलिए, इस साल अप्रैल में कांग्रेस ने उनके कट्टर विरोधियों मुकेश अग्निहोत्री और सुखविंदर सुक्खू को भी प्रमुख पद (वर्तमान में विपक्ष के नेता और अभियान समिति के प्रमुख) देकर शांत रखने का प्रयास करते हुए, प्रतिभा को राज्य इकाई का प्रमुख बनाया.

लेकिन बात तब बिगड़ गई जब प्रतिभा ने अपने बेटे और शिमला ग्रामीण क्षेत्र से विधायक विक्रमादित्य सिंह को यात्रा का प्रभारी बना दिया, जो पार्टी का मुख्य प्रचार कार्यक्रम है. इसलिए दिल्ली में पार्टी आलाकमान तुरंत चौकन्ना हुआ और उन्होंने हस्तक्षेप किया तथा विक्रमादित्य को हटाकर रथ की बागडोर उनकी मां को सौंपी गई. अग्निहोत्री और सुक्खू को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं. कांग्रेस ने इस बार मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से परहेज करते हुए पार्टी में सबके लिए बराबर मौके होने का एक सूक्ष्म संकेत देने की कोशिश की है.

हालांकि, अन्य राज्यों की तरह यहां कोई हारने जैसा भय नहीं है. दशकों से हिमाचल प्रदेश में कोई भी पार्टी लगातार दूसरी बार नहीं जीती है. न ही यहां की हार से महासचिव प्रियंका गांधी की छवि को कोई नुकसान होगा जो उत्तर प्रदेश और पंजाब में हार के बाद हुआ. प्रियंका पार्टी के प्रचार अभियान की अगुआई कर रही हैं. पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले आशुतोष कुमार कहते हैं, ''साल 2017 में कांग्रेस के वोट में महज 1.1 फीसद की गिरावट आई थी; भाजपा छोटे दलों के वोटों की मदद से जीती. यह मुश्किल होने वाला है.'' 

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर विधानसभा चुनावों में पार्टी का चेहरा बने रहेंगे, हालांकि उन्हें एक नौसिखुआ प्रशासक के रूप में देखा जाता है. इससे पूर्व मुख्यमंत्रियों प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के नेतृत्व वाले गुटों में कुछ नाराजगी भी है. धूमल के वफादार और राज्य भाजपा के पूर्व अध्यक्ष खिमी राम शर्मा कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. हिमाचल, भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का गृह प्रदेश भी है, इसलिए यह उनके लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई है. 

धूमल लॉबी यह चाहती थी कि केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर जयराम की जगह लें, लेकिन नड्डा ने इसे रोक दिया और उन्हें इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन भी हासिल है. कांग्रेस कुछ तेज-तर्रार नेताओं को पार्टी में लाकर भाजपा के इस असंतोष को भुनाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस ऐसी कोशिशों का जवाब भाजपा भी उसी अंदाज में दे रही है; 17 अगस्त को भाजपा ने कांग्रेस के प्रमुख ओबीसी चेहरे और प्रतिभा की टीम के एक अहम व्यक्ति कांगड़ा से विधायक पवन काजल जो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं, को शामिल करा लिया. 

वहीं, आम आदमी पार्टी (आप) जिसे मार्च में पंजाब में अपनी शानदार जीत के बाद हिमाचल प्रदेश से भी बड़ी उम्मीदें थीं, उसकी शुरुआत बहुत खराब रही. अप्रैल में इसकी पूरी राज्य इकाई को भंग करना पड़ा, क्योंकि इसके राज्य प्रमुख सहित कई नेता, भाजपा में शामिल हो गए. आप के लिए हिमाचल जीतना अभी दूर की कौड़ी है.

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