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महफूज पनाह की उड़ान

विपक्षी एनडीए झारखंड में सोरेन के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार गिराने की स्थिति में नहीं है, बशर्ते यूपीए के कुछ विधायक इस्तीफा दे दें या फिर पाला बदल लें

रणनीतिक शरण अपने विधायकों को रायपुर भेजने के बाद हेमंत सोरेन
रणनीतिक शरण अपने विधायकों को रायपुर भेजने के बाद हेमंत सोरेन
अपडेटेड 5 सितंबर , 2022

अमिताभ श्रीवास्तव

सत्तारूढ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के 32 विधायकों को लेकर चार्टर्ड विमान ने जैसे ही रांची से रायपुर के लिए उड़ान भरी, मंगलवार शाम को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उसे ''षड्यंत्रकारियों से निपटने की अपनी जवाबी रणनीति की झलक'' कहा. उन्होंने किसी को कतई संदेह में नहीं डाला कि उनका मतलब क्या है: यह कि उन्हें अपने विधायकों को तोड़ने की साजिश की गंध लग गई और उसी के जवाब में उन्होंने यह कदम उठाया. उन्होंने इसे मास्टरस्ट्रोक बताया, पर उनके विधायकों के राज्य से बाहर जाने से उस खबर को बल मिल गया कि झारखंड में सत्तारूढ़ झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन अनिश्चितता के भंवर में फंस गया है. कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ की उड़ान दिखाती है कि घबराहट कितनी ज्यादा है, जहां विधायकों को विपक्षी भाजपा के दलबदल कराने के ऑपरेशन से सुरक्षित रहने की उम्मीद की जाती है.

यह उम्मीद बेमानी भी नहीं है. 25 अगस्त को जब यह खबर आई कि भारतीय चुनाव आयोग ने सोरेन को बतौर विधायक अयोग्य ठहराने की सिफारिश की है, झारखंड उन राज्यों की फेहरिस्त में शुमार होने के कगार पर पहुंच गया, जहां भाजपा अपने विरोधियों की सरकारों को गिराने में कामयाब हो गई है. सोरेन के लिए बदनसीबी लाने वाला यह मामला बेहद मामूली है. यह 2008 में रांची जिले के अंगारा ब्लॉक में खरीदी गई 0.88 एकड़ गैर-कृषि भूमि है. उनकी सरकार ने मई, 2021 में इस जमीन पर खनन पट्टा आवंटित किया, ग्राम सभा से महीने भर में मंजूरी मिल गई और सितंबर में पर्यावरण मंजूरी भी मिल गई. मुख्यमंत्री के ही जिम्मे खनन और पर्यावरण विभाग भी है, इसलिए संबंधित कार्रवाइयां 1955 के जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन थीं. कानून की धारा 9ए में निर्वाचित प्रतिनिधियों को सरकार से 'माल की आपूर्ति' के करार या 'उसके तहत कोई काम करने' की मनाही है. भाजपा ने यह मामला उठाया तो सोरेन ने इस फरवरी में पट्टा वापस सौंप दिया और दलील दी कि लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण किया गया, ताजा आवंटन नहीं था और जमीन में कभी खदान नहीं खोदी गई. पर मामला प्रतीकात्मक था और सबसे बढ़कर कानूनी और नुक्सान करने वाला था.

राज्य में अनिश्चितता को हवा इससे भी मिली कि आयोग की सिफारिश के मुताबिक फैसला लेने की जिम्मेवारी वाले राज्यपाल रमेश बैस इस मामले में चुप्पी साधे हैं. यूपीए के कुछ विधायकों ने फैसले में जान-बूझकर देरी करने का आरोप मढ़ा, ताकि विधायकों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिल सके. एक मनोनीत एंग्लो-इंडियन सदस्य समेत 82 सदस्यों की विधानसभा में 29 विधायकों (भाजपा के 26, आजसू के दो और एक निर्दलीय) के साथ विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार गिराने की स्थिति में नहीं है, बशर्ते कुछ यूपीए विधायक पाला बदल लें या इस्तीफा दे दें. वैसे, यूपीए के 49 विधायक (झामुमो के 30, कांग्रेस के 18 और राजद का एक) हैं, मगर मुख्यमंत्री कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. उनके सतर्क रहने की वजह भी है, क्योंकि कोलकाता में 49.37 लाख रुपए नकद के साथ पकड़े जाने के बाद कांग्रेस ने अपने तीन विधायकों को निलंबित कर दिया है. संभावना यही है कि सोरेन के अयोग्य ठहराए जाने के बाद वे गठबंधन सरकार को समर्थन देने से मना कर सकते हैं या गैर-हाजिर रह सकते हैं. मुख्यमंत्री के भाई, दुमका के विधायक बसंत सोरेन भी खनन पट्टे के मामले में आयोग की समीक्षा का सामना कर रहे हैं और शायद उन्हें भी यही सब झेलना पड़े.

दूसरी ओर, झामुमो से विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत मामले की सुनवाई कर रहे हैं, वे भी उनके खिलाफ फैसला दे सकते हैं. मरांडी की अगुआई वाले झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का विलय फरवरी 2021 में भाजपा में हो गया था. अगर वह होता है तो भाजपा की संख्या विधानसभा में घट जाएगी.
यह सब उलटफेर फरवरी में झारखंड भाजपा की राज्यपाल बैस को सोरेन को अयोग्य ठहराने की अर्जी से शुरू हुआ. बैस ने मार्च में उसे आयोग को प्रेसित कर दिया. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने इस मामले में कई सुनवाइयां कीं, जो 18 अगस्त को खत्म हुईं. उसके बमुश्किल हफ्ते भर में उसके कथित फैसले की खबर आ गई. 27 अगस्त को सोरेन और उनके गठबंधन के विधायक तीन बसों में बैठकर एक दिन के लिए खूंटी में सैर-सपाटे के लिए गए, और शाम को रांची लौट आए. यह दिखाने की कोशिश थी कि सत्तारूढ़ गठबंधन एकजुट है. वैसे, सोरेन को दो दिन बाद ही विधायकों को झारखंड से बाहर भेजना ही उचित लगा.

सोरेन ने रांची में मीडियावालों से कहा कि उन्हें राज्यपाल के दफ्तर या आयोग से कोई औपचारिक संदेश नहीं मिला है. उन्होंने ट्वीट भी किया, ''हैं तैयार हम.'' पर शायद उन्हें विधानसभा सदस्यता खोने की संभावना का एहसास है. वे अपना मुख्यमंत्री पद बचाने की कोशिश कर रहे हैं, बशर्ते उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य न ठहरा दिया जाए, या हालात मुश्किल हो जाए तो अपने परिवार के किसी सदस्य (पत्नी कल्पना संभावित नामों में सबसे ऊपर हैं) के जरिए सरकार बचाई जा सके.

झामुमो के सूत्रों के मुताबिक, सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रमुख नेता भी 'प्लान बी' पर काम कर रहे हैं, जिसमें सोरेन के मुख्यमंत्री बने रहने का विकल्प भी शामिल है. अगर उन्हें विधायकी के अयोग्य ठहरा दिया जाता है तो संविधान किसी गैर-सदस्य को छह महीने तक गद्दी संभालने की मोहलत देता है. फिर, उस दौरान अयोग्यता के खिलाफ अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. मुख्यमंत्री के एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''अगर ऐसे चलाना मुश्किल हो जाता है तो कुछ दिनों के लिए वे अपने परिवार के किसी व्यक्ति को गद्दी सौंप सकते हैं, जैसे उनके पिता शिबू सोरेन, मां रूपी सोरेन या पत्नी कल्पना.''

नवंबर 2000 में बिहार से अलग होकर बने झारखंड में विधायकों के बार-बार पाला बदलने से सरकार बदलती रही है. राज्य में अब तक 11 सरकारें और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा, जो आखिरी बार 2014 में खत्म हुआ. उनमें भाजपा के नेतृत्व में पांच सरकारें बनीं, जिसमें एक बार शिबू सोरेन की झामुमो के नेतृत्व की सरकार शामिल थी, जिसे मई 2010 में उसने समर्थन वापस लेकर गिरा दिया. वहीं, झामुमो की अगुआई में पांच बार सरकार बनीं, इसके अलावा मधु कोड़ा की अगुआई में यूपीए सरकार सितंबर, 2006 से अगस्त, 2008 तक थी. दिसंबर, 2014 में गद्दी संभालने वाले भाजपा के रघुबर दास पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले इकलौते मुख्यमंत्री हैं. दिसंबर, 2019 में हेमंत सोरेन सत्ता में आए. यूं तो सोरेन के गठबंधन के पास अच्छा बहुमत है, पर कुछ विधायक अगर छोड़ दें या पाला बदल लें तो हालात बदल सकते हैं. 

मौजूदा स्थिति में राज्य में झामुमो और भाजपा दो बड़ी सियासी शक्तियां हैं. उनके दबदबे वाले इलाके साफ-साफ बंटे हैं, ऐसे में दोनों पार्टियों को चुनावी बढ़त लेने के लिए एक-दूसरे के इलाके में घुसपैठ करने की दरकार है. अब विधायक छत्तीसगढ़ के रिजॉर्ट में अच्छा वक्त बिता सकते हैं, पर सबकी नजरें फिर से राज्यपाल बैस पर टिकी हैं कि वे आयोग की सिफारिश पर कब फैसला सुनाते हैं और अगला सियासी सर्कस कब शुरू होता है. 

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