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सत्ता में आते ही शुरू हुई नौकरी की मांग

बिहार में अगर दस लाख नई नौकरियां देनी हैं तो सरकार को अपनी आय करीब दोगुनी करनी होगी

राजनैतिक बयान या वादा : बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के आवास पर नौकरी मांगने पहुंचे युवा
राजनैतिक बयान या वादा : बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के आवास पर नौकरी मांगने पहुंचे युवा
अपडेटेड 6 सितंबर , 2022

पुष्यमित्र

बिहार के नए उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के आवास पर इन दिनों लगभग रोज ही राज्य के अलग-अलग इलाकों से युवा नौकरी की मांग को लेकर जुट जाते हैं. ये युवा उनसे मांग करते हैं कि वे 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में किए अपने उस वादे पर जल्द से जल्द अमल करें जिसमें उन्होंने सरकार बनने पर पहली कैबिनेट बैठकों में दस लाख सरकारी नौकरियों की बहाली का ऐलान करने का वादा किया था. युवा सिर्फ उनके आवास पर ही नहीं जुट रहे, पिछले हफ्ते बीटीईटी (बिहार शिक्षक पात्रता परीक्षा) पास अभ्यर्थियों ने पटना में आकर प्रदर्शन किया. वे तत्काल सातवें चरण की शिक्षक नियुक्ति की विज्ञप्ति जारी कराने की मांग कर रहे थे. मगर उनकी मांग को सुनने के बदले पटना के एडीएम केके सिंह ने इन युवाओं पर लाठी चला दी. नौकरी को लेकर युवाओं की सक्रियता न सिर्फ तेजस्वी यादव बल्कि पूरी बिहार सरकार पर दबाव बढ़ा रही है. जानकार मानते हैं कि पहले से ही खस्ता आर्थिक स्थिति वाले प्रदेश में इस मांग को पूरा करना लगभग असंभव है. मगर वादा करके सरकार इस दांव में फंस गई है.

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, इस बढ़ते दबाव के बीच बीते स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह घोषणा कर दी कि वे न सिर्फ तेजस्वी यादव के किए वादे को पूरा करेंगे बल्कि दस लाख के बदले राज्य के बीस लाख युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था करेंगे. इस घोषणा ने सुर्खियां तो खूब बटोरीं मगर युवाओं की सक्रियता कम नहीं हुई. ऐसे में फिर इस शनिवार को तेजस्वी यादव ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से कहा कि वे जल्द से जल्द विभाग के 20,000 खाली पदों पर नियुक्तियों का ऐलान करें. मगर तेजस्वी के वादे और नीतीश कुमार की घोषणा के बावजूद बिहार के युवाओं के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि राज्य सरकार सचमुच दस लाख नई नौकरियों समेत बीस लाख रोजगार का इंतजाम करवा पाएगी? 

इन दिनों बिहार के अलग-अलग जिलों की यात्रा पर निकले युवा हल्ला बोल संगठन के संस्थापक अनुपम कहते हैं, ''जब तक सरकार इन नौकरियों को लेकर अपने एक्शन प्लान की घोषणा नहीं करेगी, यह नहीं बताएगी कि किन-किन विभागों में कितने पदों के लिए नियुक्ति निकाली जाएगी और आवेदन से नियुक्ति तक के बीच वह कितना वक्त लेगी, तब तक युवाओं को इन वादों पर भरोसा नहीं होगा.''

पिछले हफ्ते एडीएम की लाठी से घायल हुए शिक्षक अभ्यर्थी अनीसुर रहमान कहते हैं, ''लगता है, तेजस्वी यादव का कलमे (कलम) हेरा(खो) गया है. वे पहले ही कैबिनेट बैठक में नौकरी की घोषणा करने वाले थे.'' इन युवाओं के आक्रोश में सुर मिलाते हुए भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कहते हैं, ''अब तक तो कैबिनेट की पांच बैठक हो चुकी हैं. दस लाख नौकरियों के सवाल पर तो कोई फैसला सरकार ने नहीं लिया है. इन्होंने सिर्फ घोषणा कर दी है, कर कुछ नहीं पाएंगे.''

हालांकि ऐसा नहीं है कि इस मसले पर राज्य सरकार कुछ कर नहीं रही. सरकार ने सभी विभागों से रिक्तियों का ब्योरा मांगा है. ऐसा कहा जा रहा है कि रिक्तियों का ब्योरा मिल जाने पर इस साल के अंत तक तीन से चार लाख नौकरियों के लिए नियुक्तियों की घोषणा की जाएगी. अब तक मिली जानकारी के मुताबिक ऐसे संकेत हैं कि राज्य में सवा दो से ढाई लाख पद रिक्त हैं. ऐसे में अगर सरकार दस लाख नौकरियां देना चाहती है तो उसे शेष साढ़े सात लाख पद सृजित करने होंगे. सवाल यह भी है कि क्या पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर सरकार यह फैसला कर पाएगी?

फैसला आसान नहीं है

अर्थशास्त्री प्रो. नवल किशोर चौधरी के मुताबिक राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह फैसला बिल्कुल व्यावहारिक नहीं लगता. वे कहते हैं, ''अगर सरकार दस लाख नई नौकरियां देती है तो नए कर्मचारियों के वेतन के लिए उसे हर साल 50,000-60,000 करोड़ रुपए की अलग से व्यवस्था करनी होगी. जिस राज्य का कुल बजट ही सवा दो लाख करोड़ रु. का है और इसका बड़ा हिस्सा केंद्र से मिलता है, वह राज्य 50,000-60,000 करोड़ रुपए अलग से कहां से जुटा पाएगा?''  

प्रो. नवल की बात इसलिए सही लगती है क्योंकि बिहार में इस वक्त राज्य के 7.6 लाख सरकारी कर्मचारियों के वेतन और 3.8 लाख रिटायर कर्मियों की पेंशन के लिए सरकार को 41.4 हजार करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं. इस राशि की व्यवस्था ही मुश्किल से होती है. बिहार में सरकारी कर्मियों का औसतन सालाना वेतन 5.40 लाख रुपए है. अगर सरकार दस लाख नई सरकारी नौकरियां देती है तो उसे सालाना कम से कम 54,000 करोड़ रुपए की व्यवस्था करनी होगी.

इतने पैसों का इंतजाम करना बिहार जैसे राज्य सरकार के लिए एक तरह से असंभव कार्य है, क्योंकि अभी वह तमाम कोशिश करने के बावजूद अपने संसाधनों से बमुश्किल 40,000-50,000 करोड़ रु. ही जुटा पाती है. अगर सरकार को नौकरियों का वादा पूरा करना है तो उसे अपनी आय को कम से कम दोगुना करना पड़ेगा. प्रो नवल कहते हैं, ''यह कैसे करेंगे? जीएसटी लागू होने से राज्य की आमदनी पहले ही कम हो चुकी है, शराबबंदी की वजह से एक्साइज का पैसा भी नहीं आ रहा. राज्य में उद्योग हैं नहीं, सरकारी उद्योग पहले से घाटे में चल रहे हैं. इसलिए मुझे यह महज राजनीतिक बयान लगता है, इसे पूरा करना असंभव है.'' 

ऐसा सिर्फ नवल किशोर चौधरी ही नहीं कह रहे. जाने-माने चुनावी रणनीतिकार और इन दिनों बिहार में जन सुराज अभियान चला रहे प्रशांत किशोर भी कहते हैं कि सरकार नियोजित शिक्षकों को तो समय से तनख्वाह दे नहीं पाती, नई नौकरियां कहां से देगी? दिलचस्प है कि 2020 के चुनाव में जब तेजस्वी यादव ने दस लाख नौकरियों की घोषणा की थी, तब एनडीए का हिस्सा रहे सीएम नीतीश कुमार ने भी यही दलीलें दी थीं.

क्या हवा-हवाई हैं ये वादे

कई लोगों का यह आरोप भी है कि ये वादे हवा-हवाई हैं. सरकार अगर भर्तियां निकालती भी है तो उसे पूरा करने में तीन से चार साल का वक्त ले लेगी. तब तक 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव बीत जाएंगे. आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं. बिहार तकनीकी सेवा आयोग ने पिछले दो साल में 2019-21 के दौरान 21,725 पदों पर भर्तियां निकाली थीं, इनमें से 12,379 पदों पर ही नियुक्तियां हो पाई हैं. 2017-21 के दौरान पिछले चार साल में बिहार लोक सेवा आयोग ने 11,269 पदों के लिए विज्ञापन निकाला, मगर इनमें से कितनी नियुक्तियां हो पाई हैं, उसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है.

अनुपम कहते हैं, ''अगर सरकार सचमुच गंभीर है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि ये नौकरियां कब तक पूरी होंगी, लोगों को ज्वाइनिंग लेटर कब तक मिलेगा. हमारा मानना है कि कोई भी सरकारी नौकरी हो, आवेदन से नियुक्ति तक के बीच नौ महीने से अधिक का वक्त नहीं लिया जाना चाहिए.''
 
सवाल रोजगार का

सीएम नीतीश कुमार ने 15 अगस्त को अपनी घोषणा में नौकरियों के साथ-साथ रोजगार का भी वादा किया है. उनके बीस लाख नौकरियों के वादे में रोजगार भी शामिल हैं. हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इनमें कितनी नौकरियां और कितने रोजगार हैं. मगर ऐसा माना जा रहा है कि तेजस्वी के दस लाख सरकारी नौकरियों के साथ-साथ सरकार दस लाख युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था भी करेगी. 

मगर सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा नहीं है कि वह दस लाख युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था करा सके. राज्य सरकार के जारी बिहार आर्थिक सर्वेक्षण, 2021-22 के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच साल में राज्य में कौशल विकास योजना के तहत सिर्फ 1.53 लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सका है, इनमें भी सिर्फ 1.18 लाख युवाओं को रोजगार मिला है. यही रफ्तार रही तो दस लाख युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में राज्य सरकार को 50 साल का वक्त लग सकता है.

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