पुष्यमित्र
हाल तक सुस्त गति से आगे बढ़ रही बिहार भाजपा की गतिविधियों में जुलाई महीने के आखिर में अचानक तेजी आ गई. अपने सात राष्ट्रीय मोर्चों की कार्यकारिणी की बैठक के बहाने भाजपा ने न सिर्फ राजधानी पटना बल्कि पूरे बिहार में देशभर के अपने 750 से अधिक बड़े नेताओं को उतार दिया. इनमें से 391 नेताओं ने राज्य की 200 विधानसभा क्षेत्रों में 2,164 कार्यक्रम आयोजित किए और साढ़े तीन लाख से अधिक मतदाताओं से संपर्क किया. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह पटना आए और राजधानी के ज्ञान भवन में दो दिनों तक मोर्चे के हजारों कार्यकर्ताओं का जमघट बना रहा. प्रभात फेरियां, झांकियां और रोड शो आयोजित हुए. ऐसा लगा कि चुनाव से काफी पहले चुनाव आ गया है. हालांकि पार्टी के दोनों बड़े नेताओं ने स्पष्ट किया कि चुनाव 2025 में ही होंगे और वह चुनाव एनडीए एकजुट होकर लड़ेगा, मगर राजनैतिक हलकों में इस बात की चर्चाएं तेज हो गईं कि भाजपा एक बार फिर से बिहार में आत्मनिर्भर होने और अपने दम पर अकेले चुनाव लड़कर अपने मुख्यमंत्री के नेतृत्व में अपनी सरकार बनाने में जुट गई है.
आयोजन की शुरुआत से ही यह सवाल उठने लगे थे कि क्या भाजपा और जद-यू अलग होने जा रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि भाजपा ने बिहार मोर्चा प्रवास योजना के नाम से अपने नेताओं को 200 विधानसभा सीटों पर 28 और 29 जुलाई को दो दिन के लिए प्रवास करने भेजा. इस बीच सवाल उठा कि बिहार में जब विधानसभा सीटों की कुल संख्या 243 है, तो फिर पार्टी ने सिर्फ 200 क्षेत्रों में ही अपने नेता क्यों भेजे? कोई भाजपा नेता इस सवाल का साफ जवाब नहीं दे पाया. आयोजन की समाप्ति के बाद इंडिया टुडे ने जब यह सवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल से पूछा तो उन्होंने कहा, ''हमने इस कार्यक्रम के लिए अलग-अलग मोर्चों के 418 नेताओं को आमंत्रित किया था, मगर उनमें से 391 ही क्षेत्र में प्रवास करने के लिए आ पाए. इसी वजह से हमें सीटों की संख्या 243 से घटाकर 200 करनी पड़ी.'' मगर उन्होंने यह साफ नहीं किया कि नेताओं की संख्या तो 27 ही घटी थी, फिर सीटें क्यों 43 घट गईं.
इस बात को लेकर जब पत्रकारों ने जद-यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह से सवाल किया तो उनका कहना था, ''यह भाजपा का मामला है, वह चाहे तो 243 सीटों पर तैयारी करे. हम भी सभी सीटों पर अपनी तैयारी कर रहे हैं.'' यह बात कहते हुए ललन सिंह में एक झुंझलाहट भी साफ दिखी. वहीं जद-यू प्रवक्ता नीरज कुमार ने इंडिया टुडे को बताया, ''मुझे नहीं लगता कि भाजपा बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की बात सोचेगी. वह 2015 में ऐसा करके देख चुकी है. जहां तक 200 सीटों पर तैयारी करने की बात है, वह उनकी पार्टी का अंदरूनी फैसला है. हम तो बस यह जानते हैं कि यह गठबंधन गवर्नेंस के मुद्दे पर चल रहा है. नीतीश कुमार इस चुनाव के बाद मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे, मगर सीटें कम आने के बावजूद भाजपा के बड़े नेताओं के आग्रह पर वे मुख्यमंत्री बने हैं.''
इस आयोजन के बाद अमित शाह का एक बयान भी भ्रम की वजह बन रहा है. 31 जुलाई को उनके हवाले से भाजपा के प्रवक्ता ने कहा कि 2024 का लोकसभा चुनाव और 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. गौरतलब है कि तकरीबन एक माह पहले जब भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान बिहार आए थे तो उन्होंने कहा था कि एनडीए 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा.
इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह दोनों ने यह भी कहा कि एनडीए एकजुट है, सरकार अभी चलती रहेगी और अगले दोनों चुनाव भी एनडीए साथ मिलकर लड़ेगा. इससे ऐसा जरूर लगता है कि फिलहाल कोई बड़ा संकट नहीं आने वाला. मगर इस आयोजन में भाजपा ने जिस तरह के तेवर दिखाए, उससे लगता है कि वह अपने विरोधियों ही नहीं, बल्कि सरकार में अपने सहयोगी जद-यू को भी संदेश दे रही है.
लंबे समय तक बीबीसी से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि भाजपा ने इन चार दिनों में एक तरह से धुआंधार गोलाबारी की है और उसका निशाना अपने विरोधियों से अधिक अपने सहयोगी की तरफ है. उनके मुताबिक, ''गठबंधन की शुरुआत से ही भाजपा जद-यू और नीतीश कुमार के पीछे चलती रही है. जब भी राज्य के भाजपा नेताओं ने नीतीश कुमार और जद-यू को लेकर सवाल खड़े किए, केंद्रीय नेताओं ने उन्हें गठबंधन धर्म की याद दिलाकर चुप करा दिया. कई बार ऐसा लगा कि गठबंधन के दोनों बड़े दलों के बीच तालमेल नहीं है. मगर इस आयोजन ने परोक्ष रूप से नीतीश कुमार को एहसास दिला दिया कि अब ज्यादा दिनों तक उनकी मर्जी नहीं चलेगी. अब एक तरह से गेंद नीतीश कुमार के पाले में है, वे अब इसे बर्दाश्त कर पांच साल तक किसी तरह सरकार खींच लें या सत्ता से बाहर हो जाएं.''
ठाकुर की बातें कुछ हद तक इसलिए भी सही लगती हैं कि पिछले दिनों कई बार ऐसे मौके आए जब भाजपा और जद-यू के बीच टकराव की स्थिति बनते-बनते रह गई. पिछले दिनों भाजपा कोटे से राज्य सरकार के मंत्री रामसूरत राय ने जब अपने विभाग के अधिकारियों का तबादला किया तो इस तबादले को नीतीश कुमार ने रद्द करा दिया. इस बात से मंत्री बहुत नाराज हुए, मगर भाजपा के केद्रीय नेतृत्व ने उन्हें शांत रहने को कहा.
इससे पहले भी भाजपा के नेता और बिहार विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा सार्वजनिक रूप से यह शिकायत करते नजर आए थे कि राज्य के अधिकारी उनकी बातें नहीं सुनते. ऐसी भी खबरें आईं कि विधानसभा अध्यक्ष के मसले पर भाजपा और जद-यू में ठन गई है. जद-यू विधानसभा अध्यक्ष बदलवाना चाहता है.
एक बात यह भी है कि खुद नीतीश कुमार मौके-बेमौके केंद्र सरकार के फैसलों से अलग राय जाहिर करते रहे हैं. चाहे वह सीएए-एनआरसी का मुद्दा हो, अग्निवीर योजना का मसला या जाति जनगणना का सवाल. जाति जनगणना के मुद्दे पर तो नीतीश ने राज्य की तरफ से इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है. यह जानते हुए कि मोदी सरकार जाति जनगणना के पक्ष में नहीं है. ऐसे में ये खबरें हर जगह आम हैं कि बिहार में भाजपा और जद-यू के बीच रिश्ते सामान्य नहीं हैं. कई दफा नीतीश कुमार का झुकाव भाजपा के बदले राजद के पक्ष में अधिक दिखता है, ऐसे में इस बात के कयास भी लगते हैं कि शायद जद-यू भाजपा से अलग होकर राजद के साथ सरकार बना ले.
इस पूरे मसले पर अपनी राय जाहिर करते हुए राजनैतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ''भाजपा के तेवर साफ हैं. इस आयोजन को देखकर किसी को भी लग सकता है कि यह चुनाव का शंखनाद है. उसने जो शिवसेना के साथ किया, वह जद-यू के साथ दोहराना चाह रही है. भाजपा 2009 ही से बिहार में जद-यू को धीरे-धीरे अप्रासांगिक बनाने की कोशिश कर रही है. वह धीरे-धीरे जद-यू के आधार को अपने में समाहित कर रही है और इसमें उसे सफलता भी मिली है. हालांकि भाजपा हड़बड़ी में नहीं है, मगर उसका मकसद यही है. वैसे, उसे यह डर भी है कि कहीं राजद और जद-यू मिल न जाएं. हालांकि नीतीश में अब इतनी ताकत नहीं है कि वे 2015 के इतिहास को दोहरा पाएं.'' सुमन के मुताबिक, 200 सीटों पर तैयारी करने की बात में कोई भ्रम नहीं है. यह साफ है कि 43 सीटें जद-यू के लिए छोड़ दी गई हैं. अब जद-यू इसे जैसे स्वीकार करे.

